Today's Bible Reading In Hindi - मत्ती 5:11

अभिवादन और प्रस्तुति 

मसीह में मेरे प्रिय भाइयों और बहनों तुम जो हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता के नाम में अपमानित और तिरस्कृत किए जाते हो, तो तुम अच्छे और सच्चे प्रभु के अनुयायी होने का प्रमाण देते हो। तुम्हें मसीह की शांति और अनुग्रह मिलती रहे। और इस प्रकार तुम अपने प्रभु के पथ पर चलते रहो और कुल मिलाकर उसकी यानी पिता की इच्छा पूरी करते हुए मसीह में बने रहो क्योंकि मसीह भी इन मार्गों से होकर गुजरा है और हमारे लिए उसने एक उदाहरण रख छोड़ा है। उसी की स्तुति और बढ़ाई युगानुयुग होती रहे।

हमारा आज का Today's Bible Reading In Hindi वचन में हमने मत्ती 5:11,12 से लिया है जो हमें याद दिलाता है कि मसीही जीवन हमेशा सरल नहीं होता। जब हम मसीह का अनुसरण करते हैं, तो संसार हमें तिरस्कार से देख सकता है, हमारे बारे में झूठ बोल सकता है और हमें सताने तक से नहीं हिचकता। परंतु येशु हमें यही बताकर धन्य ठहराते हैं। वे कहते हैं कि " धन्य हो तुम, जब मनुष्य मेरे कारण तुम्हारी निन्दा करें, और सताएं और झूठ बोल बोलकर तुम्हरो विरोध में सब प्रकार की बुरी बात कहें। आनन्दित और मगन होना क्योंकि तुम्हारे लिये स्वर्ग में बड़ा फल है इसलिये कि उन्होंने उन भविष्यद्वक्ताओं को जो तुम से पहिले थे इसी रीति से सताया था॥ मत्ती 5:11,12"

तो चलिए अधिक समय न गवाते हुए हम इस वचन को थोड़ी गहराए से देखते हैं और इस पर मनन करते हैं।

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Today's Bible Reading In Hindi - मत्ती 5:11

शीर्षक: धन्य हो तुम जब सताए जाओगे

पुस्तक : मत्ती 

लेखक : मत्ती 

अध्याय : 5

वचन : 11,12

धन्य हो तुम, जब मनुष्य मेरे कारण तुम्हारी निन्दा करें, और सताएं और झूठ बोल बोलकर तुम्हरो विरोध में सब प्रकार की बुरी बात कहें। आनन्दित और मगन होना क्योंकि तुम्हारे लिये स्वर्ग में बड़ा फल है इसलिये कि उन्होंने उन भविष्यद्वक्ताओं को जो तुम से पहिले थे इसी रीति से सताया था मत्ती 5:11,12

 मत्ती 5:11,12 - संदर्भ, Context 

पहाड़ी उपदेश मत्ती के सुसमाचार के अध्याय 5, 6 और 7 में उल्लेखित है। इस उपदेश में येशु ने अपने शिष्यों और बड़ी भीड़ को परमेश्वर के राज्य के मूल्यों और एक धर्मी जीवन जीने के बारे में सिखाया है। यह उपदेश मूसा को दी गई पुरानी व्यवस्था के विपरीत एक नई व्यवस्था की शुरुआत को चिह्नित करता है, जो बाहरी कार्यों के बजाय विशेष मनुष्य के हृदय की स्थिति पर केंद्रित है।

इस उपदेश की शुरुआत "धन्य हैं" (Beatitudes) नामक शिक्षाओं की एक श्रृंखला से होती है, जिसमें येशु उन लोगों को धन्य कहते हैं जो नैतिक और आध्यात्मिक रूप से परमेश्वर के राज्य के योग्य हैं।

"धन्य हैं वे..."

जो आत्मा में दीन हैं (मत्ती 5:3)।

जो शोक करते हैं (मत्ती 5:4)।

जो नम्र हैं (मत्ती 5:5)।

जो धर्म के भूखे और प्यासे हैं (मत्ती 5:6)।

जो दयालु हैं (मत्ती 5:7)।

जिनके मन शुद्ध हैं (मत्ती 5:8)।

जो मेल कराने वाले हैं (मत्ती 5:9)।

जो धर्म के कारण सताए जाते हैं (मत्ती 5:10)।

मत्ती 5:11-12 इसी श्रृंखला की अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा है।

मत्ती 5:11 में यीशु अपने शिष्यों से सीधे बात करते हैं, जो मत्ती 5:10 में दिए गए सामान्य कथन को व्यक्तिगत बनाते हैं।

मत्ती 5:10 कहता है, “धन्य हैं वे जो धर्म के कारण सताए जाते हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है।”

मत्ती 5:11 में यह और स्पष्ट होता है, “धन्य हो तुम, जब मनुष्य मेरे कारण तुम्हारी निन्दा करें, और सताएं और झूठ बोल-बोलकर तुम्हारे विरोध में सब प्रकार की बुरी बात कहें।”

इस व्यक्तिगत संबोधन और विस्तार के माध्यम से येशु यह स्पष्ट करते हैं कि उत्पीड़न का कारण केवल “धर्म” नहीं, बल्कि “मेरे कारण” होना चाहिए। लेकिन यह भी ध्यान दिया जाए कि उपर प्रभु यीशु धार्मिकता को स्वयं के साथ ही जोड़ते हैं। मतलब धार्मिकता और येशु एक ही प्रतीत होते है। क्योंकि धर्म और धार्मिकता में अंतर है और हम सब मसीह की धार्मिकता के कारण ही परमेश्वर के सामने धर्मी ठहराए जाते हैं ना कि धर्म के कारण। यह विश्वास और निष्ठा की एक गहरी पहचान स्थापित करता है। जब कोई अपने जीवन को येशु के प्रति समर्पित करता है, तो यह स्वाभाविक है कि उसे केवल विश्वास के लिए ही विरोध और अस्वीकार का सामना करना पड़ेगा।

येशु यह भी बताते हैं कि उत्पीड़न का स्वरूप केवल शारीरिक नहीं होगा, बल्कि इसमें निंदा, सताव और झूठी बातें फैलाना भी शामिल होगा। इस प्रकार के उत्पीड़न का सामना मानसिक और भावनात्मक स्तर पर भी करना पड़ेगा। यही कारण है कि शिष्य को हर प्रकार के विरोध के लिए तैयार रहना होगा, चाहे वह प्रत्यक्ष अपमान हो या फिर गुप्त झूठी अफवाहें।

परंतु येशु का संदेश यहाँ समाप्त नहीं होता। वे अपने शिष्यों को यह नहीं कहते कि इस उत्पीड़न से डरना चाहिए या इससे बचने का प्रयत्न करना चाहिए। बल्कि वे कहते हैं कि जब ऐसा हो तो आनन्दित और मगन होना चाहिए, क्योंकि स्वर्ग में उनके लिए बड़ा प्रतिफल रखा गया है। यह प्रतिफल सांसारिक दुःखों और अन्याय से कहीं अधिक महान है। यही प्रतिफल विश्वासियों को यह आश्वासन देता है कि उनके कष्ट व्यर्थ नहीं हैं।

संक्षेप में, मत्ती 5:11,12 का संदर्भ “धन्य हैं” की श्रृंखला को पूरा करता है। इसमें येशु बताते हैं कि उनका अनुसरण करने वाले लोग इस संसार में न केवल शांति और आशीष पाएंगे, बल्कि विरोध और उत्पीड़न का भी सामना करेंगे। परंतु इस उत्पीड़न को सहना ही उन्हें सच्चे शिष्यत्व की राह पर स्थापित करता है। इस पीड़ा के बावजूद वे धन्य हैं, क्योंकि उनका प्रतिफल स्वर्ग में सुरक्षित है। यह संदेश तब भी उतना ही शक्तिशाली था जितना आज है, कि विश्वासियों को अपनी पीड़ा को परमेश्वर के लिए खुशी के साथ स्वीकार करना चाहिए।

मत्ती 5:11,12 - टिप्पणी

धन्य हो तुम - यहाँ प्रभु येशु का स्वर पहले से कहीं अधिक सीधा हो जाता है। पहले वे सामान्य रूप से कहते रहे कि कौन-कौन से लोग धन्य हैं, लेकिन अब वे सीधे अपने शिष्यों को संबोधित करते हैं। “तुम धन्य हो” कहकर वे यह बताते हैं कि यह केवल एक सामान्य नियम नहीं है, बल्कि उनके सामने बैठे शिष्यों का हिस्सा बनने वाला अनुभव है। यह शब्द केवल भविष्य की बात नहीं बताते, बल्कि उनके जीवन की वास्तविकता की ओर इशारा करते हैं।

जब मनुष्य मेरे कारण - यहाँ सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन आता है। पहले कहा गया था “धार्मिकता के कारण,” लेकिन अब येशु कहते हैं “मेरे कारण।” वे खुद को धार्मिकता के साथ जोड़ते हैं और बताते हैं कि धार्मिकता और उनका नाम अलग-अलग नहीं हैं। मूसा या यशायाह कभी यह नहीं कह सकते थे कि सब मेरे कारण हो रहा है, लेकिन प्रभु येशु यह कह सकते हैं क्योंकि वे स्वयं जीवित धार्मिकता हैं। इसका मतलब है कि जब कोई उनके लिए सताया जाता है, तो वास्तव में वह धार्मिकता के लिए ही सताया जाता है।

तुम्हारी निन्दा करें - यह सबसे पहले उस हल्के लेकिन दर्दनाक तिरस्कार या निन्दा की ओर इशारा है, जब लोग व्यंग्य करेंगे, उपनाम देंगे, ताने मारेंगे और हँसी उड़ाएँगे। प्रभु येशु खुद भी इस अपमान से गुज़रे थे। उन्हें सामरी कहा गया, उन पर दुष्टात्मा का आरोप लगाया गया, उन्हें पागल कहा गया और यहां तक कि क्रूस पर लटकते समय भी उनका मज़ाक उड़ाया गया। परंतु उन्होंने बदले में अपमान का उत्तर अपमान से नहीं दिया। इसी मार्ग पर शिष्यों को भी चलना था। इसलिए यह चेतावनी के साथ-साथ सांत्वना भी थी कि अगर यह सब तुम्हारे साथ हो तो समझो तुम उसी मार्ग पर हो जिस पर स्वयं मैं (प्रभु येशु) चले।

और सताएं - यह केवल तानों और व्यंग्यों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि शारीरिक और सामाजिक उत्पीड़न तक पहुँचता है। जगह-जगह खदेड़ा जाना, कैद किया जाना, कलीसिया से बाहर निकाला जाना, संपत्ति छीनी जाना, ये सब सताए जाने की व्यापक तस्वीर है। शुरुआती मसीहियों ने रोमी साम्राज्य में यही सब अनुभव किया। उन्हें देशद्रोही कहा गया, समाज-विरोधी करार दिया गया और कई बार हत्या और व्यभिचार जैसे झूठे आरोप लगाए गए।

और झूठ बोल बोलकर तुम्हरो विरोध में सब प्रकार की बुरी बात कहें - यहाँ ज़ोर शब्द “झूठे” पर है। प्रभु येशु यह साफ़ कर देते हैं कि अगर किसी पर सचमुच अपराध का आरोप है, तो उस पर दुख झेलना कोई आशीर्वाद नहीं है। धन्यता उस समय है जब आरोप पूरी तरह निराधार और गढ़े हुए हों। शिष्य जानते थे कि उनका अपना विवेक उन्हें दोषी नहीं ठहराता। इसलिए इन बातों को भारी बोझ मानने के बजाय वे समझ सकते थे कि यह केवल विरोधियों की दुर्भावना है। यही उनके लिए आत्मबल का स्रोत था।

आनन्दित और मगन होना - यहाँ प्रभु येशु एक उल्टी बात सिखाते हैं। अपमान और उत्पीड़न आम तौर पर दुख और निराशा का कारण होते हैं। परंतु प्रभु येशु कहते हैं कि जब यह सब हो तो शोक न करो, बल्कि हर्षित होओ। असली भाषा में प्रयुक्त शब्द का अर्थ है “उछल-उछल कर प्रसन्न होना।” यह कोई बनावटी प्रसन्नता नहीं, बल्कि गहरे विश्वास से निकला उत्साह है कि इस दुःख का एक बड़ा प्रतिफल है।

क्योंकि तुम्हारे लिये स्वर्ग में बड़ा फल है - यह प्रतिफल कोई ऋण चुकाने जैसा नहीं है, बल्कि परमेश्वर की कृपा का परिणाम है। थोड़े समय की पीड़ा, अनंत महिमा के सामने कुछ भी नहीं है। यही विश्वास मसीहियों को धैर्य देता है। उन्होंने देखा कि शहीदों का लहू कलीसिया का बीज बन गया। जितना अधिक वे सताए गए, उतना ही विश्वास फैला। यह स्वर्गीय प्रतिफल केवल भविष्य की महिमा नहीं, बल्कि वर्तमान में भी आत्मिक बल और शांति के रूप में झलकता है।

इसलिये कि उन्होंने उन भविष्यद्वक्ताओं को जो तुम से पहिले थे इसी रीति से सताया था - प्रभु येशु अपने शिष्यों को याद दिलाते हैं कि यह अनुभव कोई नया नहीं है। उनके पहले के भविष्यवक्ता भी इसी तरह अपमान और सताव का शिकार हुए थे। राजा दाऊद ने कहा कि झूठे गवाह मेरे खिलाफ उठ खड़े हुए। यशायाह, यिर्मयाह और कई भविष्यवक्ताओं को अपने ही लोगों से विरोध सहना पड़ा था। इसलिए जब शिष्य यह सब अनुभव करेंगे तो वे समझें कि वे उसी धारा में खड़े हैं जिसमें परमेश्वर के सबसे धर्मी सेवक खड़े रहे थे।

संक्षेप में, यह पूरा आशीर्वचन केवल दुख की चेतावनी नहीं, बल्कि आशा का स्रोत है। इसमें यह शिक्षा है कि अपमान, उत्पीड़न और झूठे आरोप मसीही जीवन का हिस्सा हैं। लेकिन जब ये बातें “प्रभु येशु के कारण” होती हैं, तो वे आशीर्वाद बन जाती हैं। यह न केवल हमें उनके समान बनाती हैं, बल्कि हमें भविष्य की महिमा के लिए तैयार भी करती हैं। इस शिक्षा का व्यावहारिक अर्थ है कि हमें अपमान का बदला अपमान से नहीं देना है, उत्पीड़न का उत्तर हिंसा से नहीं देना है, बल्कि नम्रता, धैर्य और प्रेम से देना और सहना है। यही तरीका है जिससे विरोधी भी सुसमाचार की शक्ति को पहचान सकते हैं। अंततः धन्य वही हैं जो सताए जाने पर भी आनंदित रहते हैं, क्योंकि उनका प्रतिफल स्वर्ग में सुनिश्चित है।

मत्ती 5:11,12 - भक्ति संदेश 

जब मसीह कहते हैं, “धन्य हो तुम,” तो यह केवल भविष्य के किसी स्वर्गीय प्रतिफल का वादा नहीं है, बल्कि आज के जीवन के लिए भी सांत्वना है। यह हमें सिखाता है कि दुनिया के ताने, उपहास और झूठे आरोप हमारी पहचान को नहीं मिटा सकते, क्योंकि हमारी सच्ची पहचान मसीह में छिपी हुई है। जब लोग हमें नीचा दिखाते हैं, तो उस घड़ी हमें यह स्मरण करना चाहिए कि स्वयं हमारे उद्धारकर्ता ने इसी मार्ग पर चलकर अपने अनुयायियों के लिए उदाहरण छोड़ा है।

मसीही जीवन में सबसे कठिन क्षण वह होता है जब हमें हमारे विश्वास के कारण ठुकराया जाता है। उस समय यह सोचना स्वाभाविक है कि क्या हम सचमुच सही रास्ते पर हैं। लेकिन यही वह क्षण है जिसमें वचन हमें बल देता है। यदि अपमान और सताव केवल मसीह के कारण है, तो यह इस बात का प्रमाण है कि हम उनके मार्ग पर हैं। यह हमें न तो भयभीत करने के लिए है और न ही निराश करने के लिए, बल्कि हमारे आत्मिक विश्वास को और मजबूत करने के लिए है।

संसार अपमान और अत्याचार को शर्मिंदगी और हार मानता है, परंतु स्वर्ग की दृष्टि में यही सम्मान और विजय का मार्ग है। जब विश्वासियों को झूठे आरोपों और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, तब वे एक गहरे रहस्य का अनुभव करते हैं। यह संसार उन्हें अस्वीकार करता है, परंतु स्वर्ग उन्हें स्वीकार करता है। यही कारण है कि वे शांति से, यहाँ तक कि आनन्द के साथ, इन सब को सहन कर सकते हैं।

धन्य वे हैं जो अपमान सहकर भी पलटकर अपमान नहीं करते। धन्य वे हैं जो चोट खाकर भी प्रतिशोध की ज्वाला में नहीं जलते। यही आत्मा का सच्चा फल है, और यही मसीह की शिक्षाओं का वास्तविक अनुप्रयोग है। जब हम अपने सताने वालों के लिए प्रार्थना करते हैं और उन्हें आशीष देते हैं, तब हम वास्तव में अपने प्रभु की तरह आचरण करते हैं। यही आचरण संसार को दिखाता है कि मसीह का आत्मा हमारे भीतर जीवित है।

इस वचन का अनुप्रयोग यह है कि हमें कभी भी अपने विश्वास को छुपाना नहीं चाहिए, चाहे उसका परिणाम कुछ भी हो। यदि हमारे कारण झूठे आरोप उठते हैं, तो हमें धैर्य के साथ सहना है। यदि हमें अपमानित किया जाता है, तो हमें यह स्मरण रखना है कि मसीह ने पहले ही यह सब सहा है। यदि हमारे साथ अन्याय होता है, तो हमें यह मानना है कि परमेश्वर एक दिन सब न्याय करेगा और सब कुछ प्रकट होगा।

मसीही जीवन का रहस्य यही है कि पीड़ा भी आशीष बन सकती है। क्रूस का मार्ग कठिन अवश्य है, परंतु वही महिमा की ओर ले जाता है। जब शिष्य इस सच्चाई को समझकर आनन्दित होते हैं, तब उनका जीवन एक जीवित गवाही बन जाता है। उनके धैर्य और नम्रता को देखकर लोग पहचानते हैं कि मसीह का आत्मा ही उन्हें यह शक्ति देता है। इस प्रकार, उनके कष्ट भी सुसमाचार के प्रचार का साधन बन जाते हैं।

जीवन में इस वचन को लागू करने का अर्थ यही है कि हर परिस्थिति में मसीह को सर्वोच्च मानते हुए जीना। अपमान में भी विश्वास बनाए रखना, उत्पीड़न में भी प्रेम बनाए रखना, झूठे आरोपों में भी सत्य पर अटल बने रहना यही सच्चा शिष्यत्व है। जो इस मार्ग पर चलता है, वह वास्तव में मसीह का सहभागी बनता है और स्वर्ग की धन्यता का अनुभव करता है, न केवल भविष्य में, बल्कि इसी जीवन में भी।

मत्ती 5:11,12 - प्रार्थना

हे स्वर्ग में विराजमान मेरे दयालु स्वर्गीय पिता,

आपकी कृपा से मुझे आज एक नई सुबह का उपहार मिला है। आपकी दया हर सुबह मेरे लिए नई होती है, और उसी दया में मैं अपनी आँखें खोलता हूँ। तेरा धन्यवाद पिता कि आज भी जीवन, श्वास और विश्वास की ज्योति तूने मुझे दी। धन्यवाद कि अंधकार और निराशा के बीच भी आपका प्रकाश मुझे संभाले रहता है।

पिता आज मैं प्रार्थना करता हूँ कि जब लोग मुझे तिरस्कार से देखें, या मेरे विश्वास का मज़ाक उड़ाएँ, तो मुझे अपने वचन की याद दिला। जब अपमान और झूठे आरोप मुझे सहने पड़ें, तो मुझे शिकायत करने वाला नहीं, बल्कि आपके शिष्यों की तरह आनन्दित होने वाला बना। जानता हूं कि मैं दुर्बल हूँ, लेकिन तू मेरी सामर्थ्य और बड़ा प्रतिफल है। जब संसार मुझे नीचा दिखाए, तब मुझे यह देखने दे कि तेरी दृष्टि में मैं धन्य हूँ।

हे दयालु पिता, अपने साथ मैं, अपने परिवार और प्रियजनों को तेरे हाथों में सौंपता हूँ। उनके स्वास्थ्य, उनकी सुरक्षा और उनके जीवन पर भी तेरी छाया बनी रहे। अगर वे भी कभी उपहास या विरोध का सामना करें, तो तू उन्हें गिरने न देना। उन्हें वह शांति दे जो सारी समझ से परे है। उन्हें यह भरोसा दे कि हर कठिनाई में तू उनके साथ है, और हर आँसू एक दिन आपकी उपस्थिति में आनन्द में बदल जाएगा।

हे पिता, यह वचन मेरे घर और मेरे जीवन का बल बने। हमें ऐसा विश्वास दे कि हर अपमान और हर पीड़ा में भी हम आपके प्रेम को और गहराई से अनुभव करें। हमें यह भरोसा दे कि स्वर्ग में रखा गया प्रतिफल अनंत और अटल है। आज का दिन तेरे हाथों में सौंपता हूँ, पिता। मेरी प्रार्थना सुन और मेरे जीवन को अपने नाम की महिमा के लिए प्रयोग कर। येशु मसीह के नाम में 

आमीन।

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