अभिवादन और प्रस्तुति
मसीह में मेरे प्रिय भाइयों और बहनों,
प्रभु यीशु मसीह के मधुर और पवित्र नाम में आप सबको नमस्कार। वह जिसने हमें जीवन का मुकुट पहनाने का वादा किया है उसी की बढ़ाई और स्तुति युगानुयुग होती रहे। आज का दिन हमारे लिए फ़िर एक अनुग्रह का अवसर है कि हम परमेश्वर के जीवित वचन के साथ एक नई सुबह में प्रवेश कर रहे हैं। यह समय केवल पढ़ने या सुनने का नहीं, बल्कि अपने हृदय को जाँचने, सँवारने और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार ढालने का है। प्रभु की दया हर सुबह नई होती है, और आज का दिन भी उसी दया का एक उपहार है।
Bible Vachan में आज हम जिस वचन पर मनन करने जा रहे हैं, उसे हमने याकूब 1:2 से लिया है जो हमें जीवन की वास्तविकताओं से जोड़ता है। यह वचन हमें यह नहीं सिखाता कि कठिनाइयाँ नहीं आएँगी, बल्कि यह सिखाता है कि जब कठिनाइयाँ आएँ, तब हमारा हृदय कहाँ टिका हो। इसमें न केवल आशा है, बल्कि दिशा भी है। यह हमें सिखाता है कि स्थिर रहना कमजोरी नहीं, बल्कि विश्वास की गहराई है। यह हमें याद दिलाता है कि परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ समय से परे हैं, पर कभी असफल नहीं होतीं।
तो आइए, इसी के साथ इस वचन को केवल पढ़े नहीं, बल्कि अपने जीवन में उतरने दें। इसे अपने निर्णयों, अपनी प्रतिक्रियाओं और अपने संबंधों में स्थान दें। जब हम ऐसा करेंगे, तब यह वचन केवल पन्नों पर लिखा हुआ नहीं रहेगा, बल्कि हमारे जीवन में जीवित और प्रभावी बन जाएगा। प्रभु हमें यह अनुग्रह दे कि हम इस वचन को समझें ही नहीं, बल्कि उसे जी सकें।
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शीर्षक : परीक्षा में स्थिरता
पुस्तक : याकूब
लेखक : याकूब
अध्याय : 1
वचन : 12
धन्य है वह मनुष्य, जो परीक्षा में स्थिर रहता है; क्योंकि वह खरा निकल कर जीवन का वह मुकुट पाएगा, जिस की प्रतिज्ञा प्रभु ने अपने प्रेम करने वालों को दी है। याकूब 1:12
याकूब 1:12 - संदर्भ
याकूब 1:12 को सही रूप से समझने के लिए पूरे पहले अध्याय के प्रवाह को ध्यान में रखना आवश्यक है। याकूब का पत्र व्यवहारिक मसीही जीवन का एक स्पष्ट और सीधा मार्गदर्शन है। वह विश्वास को केवल मान्यता या स्वीकारोक्ति तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे जीवन की वास्तविक परिस्थितियों, विशेषकर परीक्षाओं और व्यवहार में परखा हुआ दिखाना चाहता है। इस पत्र में विश्वास सैद्धांतिक नहीं, बल्कि जीवन में जिया जाने वाला सत्य है।
अध्याय की शुरुआत में याकूब उन विश्वासियों को संबोधित करता है जो तितर-बितर होकर रहते हैं। यह केवल भौगोलिक बिखराव नहीं, बल्कि एक ऐसी स्थिति को दर्शाता है जहाँ मसीही लोग सतावट, आर्थिक कठिनाइयों और सामाजिक बहिष्कार का सामना कर रहे थे। वे ऐसे वातावरण में जी रहे थे जहाँ विश्वास रखना आसान नहीं था। इसी पृष्ठभूमि में याकूब बार-बार स्थिरता, धीरज और परख की बात करता है। यह संदर्भ दिखाता है कि उसकी शिक्षा किसी सुरक्षित और शांत जीवन के लिए नहीं, बल्कि संघर्षरत विश्वासियों के लिए है। याकूब अध्याय की शुरुआत में ही यह कहकर पाठक को चौंका देता है कि जब वे नाना प्रकार की परीक्षाओं में पड़ें, तो उसे पूरे आनंद की बात समझें। यहाँ आनंद का आधार कष्ट नहीं, बल्कि उसका उद्देश्य है। याकूब स्पष्ट करता है कि विश्वास की परख से धीरज उत्पन्न होता है, और जब यह धीरज अपना पूरा काम करता है, तब विश्वास परिपक्व होता है। यही धीरज आगे चलकर वचन 12 की “स्थिरता” का आधार बनता है। इसलिए वचन 12 कोई नई शिक्षा नहीं, बल्कि पहले से कही गई बात का निष्कर्ष है।
परीक्षाओं के बीच याकूब बुद्धि की आवश्यकता पर जोर देता है। वह जानता है कि कठिन परिस्थितियाँ मनुष्य को भ्रमित और अस्थिर बना सकती हैं। यहाँ बुद्धि का अर्थ परिस्थितियों से बचने का उपाय नहीं, बल्कि यह समझ है कि परमेश्वर इन परिस्थितियों के द्वारा क्या काम कर रहा है। जो मनुष्य भीतर से दुविधा में है, वह कभी स्थिर नहीं रह सकता। इसलिए याकूब के लिए स्थिरता केवल बाहरी सहनशीलता नहीं, बल्कि एकाग्र और अविभाजित विश्वास का परिणाम है। वचन 12 से ठीक पहले याकूब सामाजिक और आर्थिक स्थितियों की अस्थिरता की ओर ध्यान दिलाता है। वह दिखाता है कि धन और पद दोनों क्षणिक हैं, और उन पर टिके रहना आत्मिक अस्थिरता को जन्म देता है। जैसे घास और फूल मुरझा जाते हैं, वैसे ही संसार की प्रतिष्ठा भी नष्ट हो जाती है। यह संदर्भ बताता है कि परीक्षा में स्थिर रहना संसार की ऊँच-नीच से ऊपर उठकर परमेश्वर के सत्य पर टिके रहने का नाम है।
वचन 12 के बाद याकूब एक महत्वपूर्ण स्पष्टता लाता है। वह बताता है कि परमेश्वर किसी को बुराई के लिए प्रलोभित नहीं करता। यहाँ वह बाहरी परीक्षाओं और भीतर की अभिलाषाओं के बीच अंतर करता है। बाहरी परीक्षाएँ विश्वास को मजबूत करने के लिए होती हैं, जबकि भीतर की गलत इच्छाएँ पाप की ओर ले जाती हैं। वचन 12 उस व्यक्ति को दिखाता है जो इन दोनों के बीच विजयी होकर खड़ा रहता है जो न परिस्थितियों से टूटता है, न सांसारिक इच्छाओं से हारता है।
याकूब 1:12 - टिप्पणी
धन्य है वह मनुष्य, जो परीक्षा में स्थिर रहता है - यह वाक्य केवल किसी दुःख में पड़ जाने वाले मनुष्य को धन्य नहीं कहता, बल्कि उस मनुष्य को धन्य ठहराता है जो परीक्षा में स्थिर रहता है। यहाँ ध्यान दुःख या परीक्षा पर नहीं, बल्कि उस मनोस्थिति पर है जिसके साथ मनुष्य उसका सामना करता है। संसार में कष्ट, दबाव और कठिन परिस्थितियाँ सब पर आती हैं, परन्तु हर कोई धन्य नहीं कहलाता। धन्यता वहाँ है जहाँ मनुष्य परीक्षा के बीच डगमगाता नहीं, टूटता नहीं, और अपने विश्वास, मार्ग और निष्ठा को छोड़ता नहीं।
यह “स्थिर रहना” केवल सहन करना नहीं है, बल्कि भीतर से टिके रहना है। ऐसा मनुष्य न तो शिकायत में डूब जाता है, न परमेश्वर पर दोष डालता है, और न ही अपने मार्ग से हटता है। वह परीक्षा को केवल एक बोझ की तरह नहीं देखता, बल्कि एक ऐसी स्थिति के रूप में देखता है जिसमें उसका विश्वास प्रकट और मजबूत होता है। यहाँ परीक्षा का अर्थ केवल भीतर की लालसा नहीं, बल्कि बाहर से आने वाले दुःख, सताव, हानि और दबाव भी हैं, जो मनुष्य की सच्चाई को परखते हैं।
यह वाक्य हमें पहाड़ पर दिए गए धन्य वचनों की याद दिलाता है, जहाँ येशु ने दुःख सहने वालों और सताए जाने वालों को धन्य कहा था। पर वहाँ भी धन्यता दुःख में होने से नहीं, बल्कि परमेश्वर के साथ बने रहने से जुड़ी हुई थी। इसी प्रकार यहाँ भी, परीक्षा अपने आप में आनन्द का कारण नहीं है, पर जब मनुष्य उसमें स्थिर रहता है, तब वह उसके चरित्र को दृढ़ बनाती है। यह स्थिरता इस बात का प्रमाण है कि मनुष्य का विश्वास केवल शब्दों या परिस्थितियों पर आधारित नहीं, बल्कि भीतर गहराई से जड़ा हुआ है। ऐसा मनुष्य वर्तमान में भी धन्य है, क्योंकि उसका जीवन परमेश्वर के हाथ में सुरक्षित है, और वह आने वाले प्रतिफल की आशा में खड़ा रहता है।
क्योंकि वह खरा निकल कर जीवन का वह मुकुट पाएगा - यह वाक्य उस कारण को प्रकट करता है जिसके आधार पर परीक्षा में स्थिर रहने वाला मनुष्य धन्य कहलाता है। यहाँ ध्यान परीक्षा की कठिनता पर नहीं, बल्कि उसके परिणाम पर लगाया गया है। जब मनुष्य परीक्षा में स्थिर रहता है, तो वह केवल सहन करने वाला नहीं रहता, बल्कि परखा हुआ और स्वीकार किया हुआ ठहरता है। “खरा निकलना” इस बात को दर्शाता है कि परीक्षा ने उसके विश्वास को नष्ट नहीं किया, बल्कि उसे प्रमाणित किया। यह चित्र उस प्रक्रिया की ओर संकेत करता है जिसमें किसी वस्तु को आग में डालकर उसकी सच्चाई प्रकट की जाती है। जैसे सोना आग में तपकर अपनी शुद्धता दिखाता है, वैसे ही मनुष्य का विश्वास कठिन परिस्थितियों में अपनी वास्तविकता प्रकट करता है। परीक्षा का उद्देश्य गिराना नहीं, बल्कि परखना है। जो मनुष्य इसमें बना रहता है, वह यह दिखा देता है कि उसका विश्वास केवल सुविधा का नहीं, बल्कि सच्चे भरोसे का विश्वास है।
इस खरेपन का फल “जीवन का मुकुट” है। यहाँ मुकुट किसी सांसारिक सम्मान या अस्थायी विजय का प्रतीक नहीं है, बल्कि उस जीवन का चिन्ह है जो परमेश्वर से मिलता है और कभी समाप्त नहीं होता। यह मुकुट किसी प्रतियोगिता की जीत का पुरस्कार नहीं, बल्कि विश्वास में स्थिर रहने वालों के लिए दिया गया सम्मान है। यह जीवन स्वयं वह मुकुट है, जो हर उस व्यक्ति को पहनाया जाता है जिसने अंत तक अपने विश्वास को थामे रखा। यह वाक्य यह स्पष्ट करता है कि परीक्षा व्यर्थ नहीं होती। जो व्यक्ति उसमें खरा निकलता है, उसके लिए परमेश्वर ने ऐसा प्रतिफल रखा है जो किसी भी वर्तमान पीड़ा से कहीं अधिक महिमामय और स्थायी है।
जिस की प्रतिज्ञा प्रभु ने अपने प्रेम करने वालों को दी है - यह उस आश्वासन की नींव को प्रकट करता है जिस पर जीवन के मुकुट की सारी आशा टिकी हुई है। यहाँ प्रतिफल को मनुष्य के धीरज या सहनशीलता से अलग करके सीधे प्रभु की प्रतिज्ञा से जोड़ा गया है। इसका अर्थ यह है कि जीवन का मुकुट किसी मानवीय योग्यता, परिश्रम या दुःख-सहन का भुगतान नहीं है, बल्कि वह परमेश्वर की विश्वासयोग्य प्रतिज्ञा का परिणाम है। मनुष्य का स्थिर रहना उसकी सच्चाई को दिखाता है, पर मुकुट देने वाला प्रभु स्वयं है। “प्रभु” शब्द यहाँ केवल किसी दूरस्थ सत्ता की ओर संकेत नहीं करता, बल्कि उस विश्वासयोग्य परमेश्वर की ओर है जो, जो वो कहता है उसे पूरा करता है। उसकी प्रतिज्ञाएँ अस्थिर नहीं होतीं और न परिस्थितियों के अनुसार बदलती हैं। जिस प्रतिज्ञा की यहाँ बात हो रही है, वह हाल की या अस्थायी नहीं, बल्कि परमेश्वर की स्थायी योजना का भाग है, जो आरम्भ से ही उसके लोगों के लिए ठहराई गई है। इसलिए इस मुकुट की आशा अनिश्चित नहीं, बल्कि पूरी तरह भरोसे योग्य है।
यह प्रतिज्ञा “अपने प्रेम करने वालों” के लिए कही गई है। यहाँ प्रेम को किसी सौदे या कारण की तरह नहीं रखा गया, बल्कि पहचान के रूप में बताया गया है। जो लोग प्रभु से प्रेम करते हैं, वही परीक्षा में स्थिर रहते हैं। उनका प्रेम ही उन्हें धीरज देता है, और उनका धीरज उनके प्रेम की सच्चाई को प्रकट करता है। वे केवल लाभ के लिए प्रभु के साथ नहीं रहते, बल्कि कठिन समय में भी उससे जुड़े रहते हैं। यह वाक्य यह स्पष्ट करता है कि जीवन का मुकुट उन लोगों के लिए सुरक्षित है जिनका जीवन प्रभु के साथ प्रेम के संबंध में बँधा हुआ है, एक ऐसा संबंध जो परीक्षा में टूटता नहीं, बल्कि और गहरा होता जाता है।
याकूब 1:12 - धार्मिक संदेश
यह वचन हमें एक ऐसे मार्ग पर ले जाता है जहाँ विश्वास केवल शब्दों में नहीं, बल्कि जीवन की आग में परखा हुआ दिखाई देता है। संसार में हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में कठिनाइयों से गुजरता है। दुःख, हानि, अपमान, बीमारी, असफलता पर ये सब मानवीय जीवन का हिस्सा हैं। परन्तु यह वचन हमें यह नहीं कहता कि जो कष्ट में है वही धन्य है, बल्कि यह सिखाता है कि धन्यता वहाँ है जहाँ मनुष्य कष्ट के बीच स्थिर रहता है। स्थिर रहना केवल सहना नहीं है, बल्कि परमेश्वर पर भरोसा बनाए रखना है, तब भी जब परिस्थितियाँ उसके विपरीत बोलती दिखाई दें।
पवित्र शास्त्र में अय्यूब का जीवन इसका एक सशक्त उदाहरण है। उसने एक ही समय में धन, संतान, स्वास्थ्य और समाज में सम्मान सब कुछ खो दिया। उसकी पत्नी ने उसे परमेश्वर को छोड़ देने की सलाह दी, मित्रों ने उसे दोषी ठहराया, और उसका शरीर पीड़ा से भर गया। फिर भी अय्यूब का हृदय परमेश्वर से अलग नहीं हुआ। उसने प्रश्न पूछे, उसने दुःख व्यक्त किया, पर उसने परमेश्वर को त्यागा नहीं। यही स्थिरता थी। इसी कारण उसका जीवन केवल दुःख की कहानी नहीं बना, बल्कि परमेश्वर की महिमा का प्रमाण बन गया।
जब एक मनुष्य परीक्षा में स्थिर रहता है, तब वह खरा निकलता है। यह खरा निकलना किसी बाहरी प्रमाण-पत्र जैसा नहीं, बल्कि भीतर की सच्चाई का प्रकट होना है। जैसे सोना आग से बचने की कोशिश नहीं करता, बल्कि आग में रहकर अपनी शुद्धता दिखाता है, वैसे ही विश्वास कठिन परिस्थितियों से भागकर नहीं, बल्कि उनमें टिककर प्रकट होता है। आग सोने को नष्ट नहीं करती, बल्कि उसकी मिलावट को जलाती है। उसी प्रकार परीक्षाएँ सच्चे विश्वास को नष्ट नहीं करतीं, बल्कि उसे और उज्ज्वल बना देती हैं। राजा दाऊद का जीवन भी यही सिखाता है। उसे परमेश्वर द्वारा राजा चुना गया, परन्तु ताज पहनने से पहले उसे वर्षों तक जंगलों में भटकना पड़ा। शाऊल से भागना, विश्वासघात सहना, गुफाओं में छिपना, ये सब उसकी तैयारी का भाग थे। यदि दाऊद उस समय अपने बुलावे पर संदेह करता, या परमेश्वर को दोष देता, तो उसका अंत अलग होता। पर उसने प्रतीक्षा की, उसने स्थिरता दिखाई, और समय आने पर वह खरा निकलकर सामने आया। और इस तरह परमेश्वर की प्रतिज्ञा अपने समय पर उसमें पूरी हुई।
यह वचन हमें यह भी सिखाता है कि परमेश्वर की ओर से मिलने वाला प्रतिफल संसार के प्रतिफलों जैसा नहीं होता। संसार के मुकुट अस्थायी होते हैं, वे समय के साथ मुरझा जाते हैं, टूट जाते हैं, या किसी और के सिर पर चले जाते हैं। परन्तु यहाँ जिस मुकुट की बात है, वह जीवन का मुकुट है। यह जीवन केवल साँस लेने का नाम नहीं, बल्कि परमेश्वर के साथ अनंत संगति का जीवन है। यह मुकुट बाहरी सम्मान नहीं, बल्कि भीतर की पूर्णता है। यह वह जीवन है जिसमें कोई भय नहीं, कोई क्षय नहीं और कोई अंत नहीं। प्रेरित पौलुस ने भी अपने जीवन के अंत में यही कहा कि उसने अच्छी कुश्ती लड़ी, दौड़ पूरी की और विश्वास को थामे रखा। उसके जीवन में जेलें थीं, कोड़े थे, भूख थी, तिरस्कार था। फिर भी उसने कभी यह नहीं कहा कि उसकी पीड़ा व्यर्थ है। वह जानता था कि एक ऐसा मुकुट है जो समय से परे है। यही आशा उसे हर परिस्थिति में खड़ा रखती थी। यह आशा ही वह शक्ति है जो मनुष्य को टूटने से बचाती है।
यह प्रतिज्ञा उन लोगों के लिए है जो प्रभु से प्रेम रखते हैं। यहाँ प्रेम किसी भावना तक सीमित नहीं है, बल्कि एक संबंध है। प्रेम वह डोर है जो मनुष्य को कठिन समय में भी परमेश्वर से जोड़े रखती है। जब सब कुछ समझ में आता है तब विश्वास करना सरल होता है, पर जब कुछ भी समझ में नहीं आता, तब भी प्रभु से जुड़े रहना, यही प्रेम है। यही प्रेम मनुष्य को शिकायत से बचाता है और उसे धीरज देता है। पतरस ने जब येशु को अस्वीकार किया, तो वह गिरा, पर उसका प्रेम समाप्त नहीं हुआ। आँसुओं में उसका पश्चाताप इस बात का प्रमाण था कि उसका हृदय अब भी प्रभु से जुड़ा था। वही पतरस आगे चलकर कलीसिया का एक मजबूत स्तंभ बना। उसका गिरना अंतिम नहीं था, क्योंकि उसका प्रेम सच्चा था। परमेश्वर ऐसे ही लोगों को उठाता है, जो परिपूर्ण नहीं, पर प्रेम में सच्चे होते हैं।
प्रकृति भी हमें यही शिक्षा देती है। बीज जब मिट्टी में डाला जाता है, तो वह अँधेरे, दबाव और टूटने की प्रक्रिया से गुजरता है। यदि वह उस प्रक्रिया से भाग सके, तो कभी वृक्ष नहीं बन पाएगा। पर वही दबाव, वही अँधेरा, उसी बीज को जीवन देता है। उसी प्रकार परमेश्वर हमारे जीवन में कई बार ऐसी परिस्थितियाँ आने देता है जो हमें भीतर से तोड़ती हुई लगती हैं, पर वास्तव में वही हमें नया जीवन देने की तैयारी होती हैं। यह वचन हमें झूठी शिक्षाओं से भी सावधान करता है कि हम अपने दुःखों का दोष परमेश्वर पर न डालें। परमेश्वर परीक्षा में हमारी सच्चाई को प्रकट करता है, पर पाप का स्रोत वह नहीं है। वह हमें गिराने नहीं, बल्कि सँवारने के लिए काम करता है। जब हम यह समझ लेते हैं, तब हमारी दृष्टि बदल जाती है। हम परिस्थितियों को शत्रु नहीं, बल्कि शिक्षक के रूप में देखने लगते हैं।
अंत में, इतना ही बताना चाहता हूं कि यह वचन हमें एक गहरी आशा देता है। जो आज आँसुओं के साथ बो रहा है, वह व्यर्थ नहीं है। जो आज चुपचाप स्थिर बना हुआ है, उसे अनदेखा नहीं किया गया है। परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ समय से बँधी नहीं होतीं, पर वे कभी असफल भी नहीं होतीं। जीवन का मुकुट उन हाथों में सुरक्षित है जो प्रेम के साथ परमेश्वर की ओर बढ़े हुए हैं।इसलिए जब परीक्षा आए, तो घबराने के बजाय याद रखें कि स्थिरता ही आपकी गवाही है। आग आपकी कहानी का अंत नहीं, बल्कि उसकी सच्चाई का प्रमाण है। और अंत में, वह प्रभु जो देखता है, जो जानता है, और जो विश्वासयोग्य है, वह अपने प्रेम करने वालों को जीवन का मुकुट अवश्य देगा।
याकूब 1:12 - जीवन में प्रयोग
यह वचन जीवन की हर परिस्थिति में हमारे दृष्टिकोण को आकार देता है। जब समस्याएँ आती हैं और मार्ग कठिन हो जाता है, तब यह हमें सिखाता है कि विश्वास को छोड़ना समाधान नहीं है। जीवन में प्रयोग का अर्थ है कि हम कठिन समय में अपने निर्णय डर या हताशा से नहीं, बल्कि भरोसे और स्थिरता से लें। जब हम दबाव में भी सही बात को थामे रहते हैं, तब हम इस वचन को अपने आचरण में उतारते हैं।
यह वचन हमें यह समझने में सहायता करता है कि कठिनाइयाँ हमारे विरुद्ध नहीं, बल्कि हमारे भीतर काम कर रही होती हैं। जब हम उन्हें केवल बाधा न मानकर सीखने का अवसर मानते हैं, तब हमारा मन शांत रहता है। ऐसा करने से हम शिकायत करने के बजाय आत्ममंथन करना सीखते हैं और परमेश्वर पर दोष डालने के बजाय उसकी इच्छा को समझने का प्रयास करते हैं। वहीं यह वचन हमें धैर्य और आशा के साथ आगे बढ़ने की सामर्थ्य देता है। जब परिणाम तुरंत न दिखें, तब भी सही मार्ग पर बने रहना आसान नहीं होता। फिर भी, जब हम प्रेम में स्थिर रहते हैं और अपने विश्वास को व्यवहार में जीते हैं, तब हमारा जीवन स्वयं एक गवाही बन जाता है। ऐसा जीवन न केवल हमें भीतर से मजबूत करता है, बल्कि दूसरों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बनता है।
याकूब 1:12 - जीवन में लागू करना
यह वचन हमें रोज़मर्रा के जीवन में एक स्थिर दृष्टि अपनाने के लिए बुलाता है। जब परिस्थितियाँ हमारे विरुद्ध जाती हैं और मन घबराने लगता है, तब यह वचन हमें सिखाता है कि तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय भीतर से स्थिर रहना आवश्यक है। जीवन में आने वाली कठिनाइयाँ हमारे विश्वास की कसौटी होती हैं। यदि हम इन क्षणों में अपने मन और निर्णयों को परमेश्वर के भरोसे में टिकाए रखते हैं, तो हम इस वचन को व्यवहार में ला रहे होते हैं।
यह वचन हमें वर्तमान से आगे देखने की दृष्टि देता है। जब लाभ तुरंत न दिखाई दे और परिश्रम व्यर्थ लगता हो, तब यह स्मरण हमें निराश होने से बचाता है। हम सीखते हैं कि हर सही कदम का फल तुरंत नहीं, पर निश्चित रूप से मिलता है। इस आशा के साथ जीवन जीना हमें अधीरता और कड़वाहट से दूर रखता है। इस वचन को जीवन में लागू करना प्रेम में स्थिर रहने का अभ्यास भी है। जब लोग हमें समझ न सकें, या हमारी भलाई का उत्तर न दें, तब भी प्रेम में बने रहना आसान नहीं होता। फिर भी, प्रभु के प्रति प्रेम हमें उस मार्ग पर टिकाए रखता है जो अंततः जीवन और शांति की ओर ले जाता है। यही स्थिर जीवन इस वचन का सजीव प्रयोग है।
याकूब 1:12 - कुछ सवाल खुद से पूछे
1) जब मेरे जीवन में कठिनाइयाँ आती हैं, तो क्या मैं उनसे भागने की कोशिश करता हूँ या परमेश्वर पर भरोसा रखते हुए उनमें स्थिर रहता हूँ?
2) क्या मेरी वर्तमान परिस्थितियाँ मेरे विश्वास को कमजोर कर रही हैं या उसे खरा और मजबूत बना रही हैं?
3) परीक्षा के समय मेरी पहली प्रतिक्रिया शिकायत और निराशा होती है, या धैर्य और भरोसे की?
4) क्या मेरा परमेश्वर से प्रेम केवल तब तक है जब सब कुछ ठीक चलता है, या मैं कठिन समय में भी उससे जुड़ा रहता हूँ?
5) क्या मैं अपने जीवन के निर्णय केवल वर्तमान लाभ को देखकर लेता हूँ, या परमेश्वर की प्रतिज्ञा और अनंत जीवन की आशा को सामने रखकर चलता हूँ?
याकूब 1:12 - प्रार्थना
हे मेरे दयालु स्वर्गीय पिता,
आज इस नई सुबह के लिए मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ। पिता, मैं धन्यवाद करता हूँ कि तूने मुझे आज फिर अवसर दिया कि मैं तुझ पर भरोसा करते हुए इस नए दिन की शुरुआत करूं। चाहे आने वाला दिन मेरे लिए सरल हो या कठिन, मैं मानता और विश्वास करता हूँ कि तू मेरे साथ है, और यही मेरे लिए पर्याप्त है।
पिता, मैं अपने जीवन को तेरे सामने रखता हूँ। तू जानता है पिता, कि मैं किन परिस्थितियों से गुजर रहा हूँ, किन परीक्षाओं का सामना कर रहा हूँ, और किन दबावों के बीच खड़ा हूँ। तू यह भी जानता है कि कई बार मेरा मन डगमगाने लगता है, भय और निराशा मुझे घेर लेते हैं। पर मेरी विनती इतनी ही है ऐसे समय में तू मुझे स्थिर रहना सिखा। मुझे वह धैर्य दे कि मैं परीक्षा से भागूँ नहीं, बल्कि उसमें टिके रहूँ। मेरे विश्वास को इतना मजबूत कर कि कठिनाई मुझे तोड़े नहीं, बल्कि मुझे खरा बनाए। जब उत्तर देर से मिले, तब भी मैं तुझ पर भरोसा करना न छोड़ूँ। मुझे शिकायत करने वाला नहीं, बल्कि स्थिर रहने वाला बना। और मेरे हृदय को उस प्रेम से भर दे जो मुझे हर परिस्थिति में तुझसे जोड़े रखे।
पिता, मैं प्रार्थना करता हूँ कि मेरे निर्णय भय से नहीं, बल्कि विश्वास से निकलें। जब सही मार्ग मुझे कठिन लगे और आसान रास्ता लुभाने लगे, तब मुझे सही को चुनने की सामर्थ्य दे। मुझे ऐसा जीवन जीने दे जो तुझे प्रसन्न करे, न कि केवल परिस्थितियों से बचने वाला हो। मैं जानता हूँ कि जीवन का मुकुट मेरी योग्यता से नहीं, बल्कि तेरी प्रतिज्ञा से जुड़ा है। इसी आशा में मैं आज स्थिर रहना चाहता हूँ।
पिता , मैं अपने परिवार और अपने प्रियजनों को तेरे हाथों में सौंपता हूँ। तू उनके जीवन, उनके स्वास्थ्य, उनकी सुरक्षा और उनके मन की स्थिति को भली-भाँति जानता है। उनके जीवन में तेरी उपस्थिति बनी रहे। यदि उनके जीवन कोई बीमारी है, तो उन्हें चंगाई दे। कोई चिंता है, तो वहाँ उन्हें शांति दे। जहाँ असुरक्षा है, वहाँ अपनी रक्षा की छाया फैला। उन्हें हर बुराई, हर दुर्घटना और हर भय से सुरक्षित रख। जब वे भी अपने-अपने जीवन की परीक्षाओं से गुजरें, तब उन्हें भी स्थिर बने रहने की सामर्थ्य देना। उनके विश्वास को मजबूत कर और उनके हृदयों को अपने प्रेम से भर दे। पिता, हमारे घरों में तेरा शांति का वास हो। हमारे संबंधों में समझ, धैर्य और क्षमा बनी रहे। हमें एक-दूसरे के लिए सहारा बनने की बुद्धि दे। और ऐसा हो कि हम सब मिलकर तेरी प्रतिज्ञाओं पर भरोसा करना सीखें, चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों।
इसके साथ पिता, मैं यह दिन, यह जीवन और अपना भविष्य तेरे हाथों में सौंपता हूँ। मुझे हर परीक्षा में स्थिर रहने वाला, हर परिस्थिति में विश्वास रखने वाला और हर दिन तेरे प्रेम में बने रहने वाला बना। मैं जानता हूँ कि तू विश्वासयोग्य है और तेरी कही हुई हर बात पूरी होगी। यीशु के नाम में,
आमीन।

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