Today's Bible Reading in Hindi - यूहन्ना 14:6

अभिवादन और प्रस्तुति

मसीह में मेरे प्रिय भाईयों और बहनों, मसीह के नाम में आप सभी को अनुग्रह और शांति मिले। आज के इस शांत समय में, हम परमेश्वर के वचन के सामने अपने हृदय को खोलकर आये हैं, वो इसलिए क्योंकि प्रभु हमें फिर से अपनी उपस्थिति और सच्चाई में ठहरने के लिए बुलाते हैं।

Today's bible reading in Hindi में आज का हमारा बाइबल पाठ हमें जीवन के उस मूल प्रश्न से सामना कराता है, जो हर मनुष्य के मन में कभी न कभी उठता है, मैं कहाँ जा रहा हूँ और मुझे किस दिशा में चलना चाहिए। इस संसार की भीड़, विकल्पों और उलझनों के बीच यह वचन हमें ठहरकर देखने और समझने का अवसर देता है कि जीवन की सही दिशा किसी बाहरी मार्गदर्शक में नहीं, बल्कि एक जीवित संबंध में पाई जाती है।

आज का वचन हमें यह याद दिलाता है कि परमेश्वर ने हमें अंधकार में भटकने के लिए नहीं छोड़ा है, बल्कि स्वयं हमारे पास आकर हमें सही दिशा, सच्चाई और जीवन का अर्थ दिखाया है। यह पाठ हमें केवल सुनने के लिए नहीं, बल्कि अपने हृदय और जीवन में उतारने के लिए दिया गया है, ताकि हमारे विचार, हमारे निर्णय और हमारी चाल एक नए प्रकाश में ढल सकें। तो आइए, आज के इस बाइबल पाठ को पढ़ते समय अपने मन को शांत करें, अपने बोझ और प्रश्न परमेश्वर के सामने रखें, और खुले हृदय से उस संदेश को ग्रहण करें जो प्रभु येशु हमें देना चाहते हैं। हो सकता है यह वचन हमें हमारी वर्तमान स्थिति में नया मार्ग दिखाए, हमें सच्चाई में स्थिर करे, और हमारे जीवन में नई आशा और नई ताजगी भर दे।

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Today's Bible Reading in Hindi - यूहन्ना 14:6

शीर्षक : प्रभु यीशु में जीवन की सही दिशा

पुस्तक : यूहन्ना 

लेखक : यूहन्ना 

अध्याय : 14

वचन : 6

यीशु ने उस से कहा, मार्ग और सच्चाई और जीवन मैं ही हूं; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुंच सकता। यूहन्ना 14:6

यूहन्ना 14:6 - संदर्भ

यूहन्ना रचित सुसमाचार का चौदहवाँ अध्याय उस समय की पृष्ठभूमि में रखा गया है जिसे सामान्यतः “अंतिम भोज” के रूप में जाना जाता है। यह वह गंभीर और भावनात्मक घड़ी थी जब येशु जानते थे कि उनका पृथ्वी पर सार्वजनिक सेवाकाल समाप्त होने वाला है और बहुत शीघ्र उन्हें पकड़वाया जाएगा, न्यायालयों में प्रस्तुत किया जाएगा और क्रूस पर चढ़ाया जाएगा। इसी कारण यह अध्याय विदाई के उपदेश के रूप में सामने आता है, जहाँ येशु अपने शिष्यों को आने वाले संकट, विछोह और परीक्षा के लिए आत्मिक रूप से तैयार कर रहे थे।

इस अध्याय की शुरुआत में शिष्यों की मनःस्थिति अत्यंत व्याकुल और भयभीत दिखाई देती है। येशु द्वारा अपने जाने की घोषणा ने उनके हृदयों को अशांत कर दिया था, क्योंकि उन्होंने अपना सब कुछ छोड़कर उनका अनुसरण किया था। अब उनका जाना शिष्यों के लिए अनिश्चितता, अकेलेपन और भविष्य के भय का कारण बन गया था। इसी पृष्ठभूमि में येशु उनके हृदयों को शांति देने के लिए यह आश्वासन देते हैं कि पिता के घर में उनके लिए स्थान है और उनका जाना त्याग नहीं, बल्कि तैयारी का कार्य है। वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि उनका जाना अंतिम नहीं है, क्योंकि वे फिर लौटेंगे और अपने लोगों को अपने साथ ले जाएंगे।

इसी संवाद के बीच येशु यह कहते हैं कि जहाँ वे जा रहे हैं, वहाँ का मार्ग शिष्य जानते हैं। यह कथन थोमा के मन में उलझन उत्पन्न करता है। थोमा, जो अपने स्वभाव में ईमानदार और व्यावहारिक प्रश्न पूछने वाला शिष्य था, खुलकर यह स्वीकार करता है कि वे यह नहीं जानते कि येशु कहाँ जा रहे हैं, इसलिए मार्ग को जानने का प्रश्न उसके लिए अस्पष्ट है। थोमा का यह प्रश्न कोई विद्रोह नहीं, बल्कि मानवीय सीमाओं की स्वीकारोक्ति है। वह भौतिक दृष्टिकोण से सोच रहा था, जबकि येशु आत्मिक वास्तविकता की ओर संकेत कर रहे थे।

थोमा के इसी प्रश्न के उत्तर में येशु वह गहन और निर्णायक सत्य प्रकट करते हैं, जो केवल उस समय के शिष्यों के लिए नहीं, बल्कि सभी युगों के विश्वासियों के लिए केंद्रीय महत्व रखता है। यहाँ येशु यह स्पष्ट करते हैं कि परमेश्वर तक पहुँचने का मार्ग कोई भौगोलिक दिशा, कोई धार्मिक प्रक्रिया या नियमों की सूची नहीं है। परमेश्वर तक पहुँच एक जीवित संबंध के द्वारा होती है, और वह संबंध स्वयं येशु के माध्यम से स्थापित होता है।

जब येशु “मैं ही हूँ” कहते हैं, तो यह केवल आत्म-परिचय नहीं, बल्कि दिव्य अधिकार की घोषणा है। यह भाषा पुराने नियम में परमेश्वर के आत्म-प्रकाशन की प्रतिध्वनि है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि येशु स्वयं को केवल एक शिक्षक या भविष्यवक्ता के रूप में प्रस्तुत नहीं कर रहे, बल्कि उस दिव्य पहचान के साथ खड़े हैं जो मनुष्य को परमेश्वर से जोड़ने का कार्य करती है। यहाँ मार्ग का अर्थ उस सेतु से है जो पापी मनुष्य और पवित्र परमेश्वर के बीच की दूरी को समाप्त करता है। येशु स्वयं वह सेतु हैं, न कि केवल उसका संकेत।

इसी प्रकार, सत्य का अर्थ केवल सही शिक्षाओं का संग्रह नहीं है। संसार में अनेक मत, विचार और दर्शन हैं, परंतु येशु यह दिखाते हैं कि परमेश्वर की वास्तविकता का पूर्ण और स्पष्ट प्रकटीकरण उन्हीं में पाया जाता है। वे परमेश्वर के स्वभाव, करुणा, पवित्रता और प्रेम को मानव रूप में प्रकट करते हैं। इसीलिए वे भ्रम और झूठ से भरी दुनिया में परमेश्वर की सच्चाई का मानक हैं।

जीवन की बात करते हुए येशु केवल जैविक अस्तित्व की चर्चा नहीं करते। यहाँ जीवन उस आत्मिक और अनन्त अवस्था को दर्शाता है जो परमेश्वर के साथ संगति में प्रवेश करने से प्राप्त होती है। मनुष्य अपने पाप के कारण आत्मिक रूप से मृत अवस्था में होता है, और वही जीवन येशु के द्वारा पुनः स्थापित होता है। यह जीवन केवल भविष्य की आशा नहीं, बल्कि वर्तमान में अनुभव की जाने वाली वास्तविकता है।

इस वचन का सबसे चुनौतीपूर्ण और निर्णायक भाग यह स्पष्ट करता है कि परमेश्वर तक पहुँचने का कोई वैकल्पिक मार्ग नहीं है। यह कथन किसी धार्मिक घमंड से उत्पन्न नहीं, बल्कि उस सच्चाई की घोषणा है कि मनुष्य अपने प्रयासों, व्यवस्था पालन या नैतिक श्रेष्ठता के द्वारा परमेश्वर से मेल नहीं कर सकता। मूसा की व्यवस्था पाप को प्रकट कर सकती थी, पर उसे दूर नहीं कर सकती थी। यही कारण है कि उद्धार का आधार केवल येशु का कार्य और उन पर विश्वास है।

इस प्रकार यह वचन मसीही जीवन को एक धार्मिक प्रणाली के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवित संबंध के रूप में प्रस्तुत करता है। यह डर और अनिश्चितता के बीच आश्वासन देता है, और अज्ञानता के बीच स्पष्ट दिशा प्रदान करता है। यह शिष्यों के लिए भी था और आज के विश्वासियों के लिए भी है—कि परमेश्वर तक पहुँच कोई अमूर्त खोज नहीं, बल्कि एक जीवित व्यक्ति के साथ चलने का अनुभव है।

यूहन्ना 14:6 - टिप्पणी 

मार्ग - यह कथन थोमस के संदेह का सीधा उत्तर है, लेकिन साथ ही यह शिष्यों की सोच को और गहराई में ले जाने के लिए भी कहा गया है। येशु यह स्पष्ट करते हैं कि पिता के पास पहुँचने का मार्ग कोई स्थान, कोई विधि या कोई नियम नहीं है, बल्कि एक जीवित व्यक्ति है जो वह स्वयं है। मसीह केवल इस अर्थ में मार्ग नहीं हैं कि वे अपने लोगों से आगे चलकर एक उदाहरण बनते हैं, बल्कि वे अपने आज्ञापालन, अपने बलिदान और अपने पूरे जीवन के द्वारा स्वयं उद्धार का मार्ग हैं। उन्होंने जो शिक्षा दी, जो जीवन जिया और जो मृत्यु सही, वह सब मिलकर वही मार्ग बनता है जिससे होकर मनुष्य परमेश्वर तक पहुँच सकता है। वे भटके हुओं के लिए मार्गदर्शक हैं, अज्ञानी के लिए शिक्षक हैं और पापियों के लिए आगे चलने वाला अगुआ और उद्घारकर्ता हैं। वे न केवल रास्ता दिखाते हैं, बल्कि स्वयं वही रास्ता हैं।

यह मार्ग परमेश्वर की इच्छा के अनुसार ठहराया गया है और उसकी पवित्रता, न्याय और दया के पूर्णतः अनुकूल है। यह पापियों की वास्तविक स्थिति के भी अनुकूल है, क्योंकि मनुष्य न तो स्वयं रास्ता खोज सकता है और न ही अपनी सामर्थ्य से उस पर चल सकता है। इसलिए मसीह वह मार्ग हैं जिसमें परमेश्वर की ओर से अनुग्रह भी है और मनुष्य के लिए आशा भी।

सत्य - येशु स्वयं को केवल सत्य का शिक्षक नहीं कहते, बल्कि कहते हैं कि वे स्वयं सत्य हैं। सत्य का अर्थ यहाँ केवल सही बातें कहना नहीं है, बल्कि वास्तविकता को वैसा ही प्रकट करना जैसा वह वास्तव में है। परमेश्वर के विषय में, स्वर्ग के विषय में, मनुष्य की स्थिति के विषय में और उद्धार के विषय में जो कुछ भी सत्य है, वह सब मसीह में पूर्ण रूप से दिखाई देता है। पुराने समय में जो प्रतिज्ञाएँ, प्रतीक और भविष्यवाणियाँ दी गई थीं, वे सब मसीह में आकर पूरी होती हैं। वे केवल शब्द या छाया नहीं रह जातीं, बल्कि जीवित और वास्तविक सत्य बन जाती हैं। यहूदियों की धार्मिक विधियाँ केवल संकेत थीं, परन्तु मसीह का जीवन स्वयं वास्तविकता है। जहाँ व्यवस्था ने परमेश्वर की इच्छा को शब्दों में बताया, वहीं मसीह ने उसे जीवन में दिखाया।

येशु भविष्यवक्ता के रूप में सत्य सिखाते हैं, याजक के रूप में सत्यता और विश्वासयोग्यता से सेवा करते हैं, और राजा के रूप में उनका शासन पूरी तरह न्याय और सत्य पर आधारित है। सुसमाचार की सारी शिक्षाएँ उन्हीं में केन्द्रित हैं और उन्हीं से अर्थ पाती हैं। मनुष्यों की कल्पनाएँ और धारणाएँ बदल सकती हैं, परन्तु मसीह में प्रकट हुआ सत्य स्थिर और शाश्वत है। यह कथन उस धारणा के भी विरोध में है जिसमें सत्य को केवल व्यवस्था या नियम तक सीमित कर दिया गया था। मसीह यह स्पष्ट करते हैं कि सत्य कोई पुस्तक या व्यवस्था मात्र नहीं, बल्कि स्वयं जीवित परमेश्वर का प्रकट होना है, और वही सत्य मसीह में देहधारण करके मनुष्य के सामने आया है।

और जीवन - जब येशु कहते हैं कि वे जीवन हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वे केवल जीवन की बात करते हैं, बल्कि यह कि जीवन का स्रोत वही हैं। प्राकृतिक जीवन, आत्मिक जीवन और अनन्त जीवन इन तीनों का मूल केवल वही हैं। पाप में मरे हुए मनुष्य को जीवन देने वाला कोई नियम, कोई कर्म या कोई व्यवस्था नहीं, बल्कि केवल मसीह की जीवन देने वाली सामर्थ्य है। व्यवस्था जीवन नहीं दे सकी; उसने केवल यह दिखाया कि मनुष्य जीवन से कितना दूर है। मसीह वह “जीवित मार्ग” हैं जिसमें प्रवेश करने वाला व्यक्ति मृत्यु से जीवन में प्रवेश करता है। वे अपने आत्मा के द्वारा जीवन की शुरुआत करते हैं, उसे बढ़ाते हैं और अंत में उसे पूर्णता तक पहुँचाते हैं।

जो इस मार्ग में चलते हैं, वे वास्तव में जीवित होते हैं, और यह जीवन केवल इस संसार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अनन्त जीवन की ओर ले जाता है। इसलिए मसीह न केवल जीवन देने वाले हैं, बल्कि वही जीवन हैं जिसमें मनुष्य को परमेश्वर के साथ सच्चा सम्बन्ध मिलता है।

मैं ही हु - जब येशु यह कहते हैं कि “मैं ही हूँ,” तो वे अपने शिष्यों को केवल किसी दिशा या रास्ते या सत्य की जानकारी नहीं दे रहे, बल्कि स्वयं को ही केवल मार्ग, सत्य और जीवन के रूप में प्रकट कर रहे हैं। यहाँ “मैं” शब्द पर विशेष बल है, जिसका अर्थ है एकमात्र "मैं" और मेरे अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं। यह एक बहुत गहरी आत्मिक घोषणा है। यह वाक्य अपने भीतर अधिकार, पूर्णता और एकमात्रता को समेटे हुए है। यहाँ जो “मैं” शब्द हैइसका अर्थ यह है कि जो बात उसके बारे में कही जा रही है, वह किसी और पर लागू नहीं होती। यह कोई साझा दावा नहीं है, न ही कई विकल्पों में से एक विकल्प है, बल्कि यह एक स्पष्ट और निर्णायक कथन है। इस वाक्य में प्रभु येशु स्वयं को किसी सिद्धांत, पद्धति या विचारधारा के समान नहीं रखते, बल्कि स्वयं को समाधान के रूप में प्रस्तुत करते हैं। वे यह नहीं कहते कि “मैं तुम्हें मार्ग दिखाऊँगा” या “मैं तुम्हें सत्य सिखाऊँगा,” बल्कि कहते हैं कि वही एकमात्र वह वास्तविकता हैं जिसे मनुष्य खोज रहा है।

“मैं ही हूँ” का भाव यह भी बताता है कि प्रभु यीशु किसी की जगह लेने वाले नहीं हैं और न ही उनके स्थान पर कोई और खड़ा हो सकता है। यह कथन सभी मानवीय प्रयासों, धार्मिक उपलब्धियों और आत्मनिर्मित रास्तों को चुनौती देता है। यह स्पष्ट करता है कि उद्धार, पहचान और जीवन की पूर्णता किसी और में नहीं, बल्कि केवल उसी में पाई जाती है। इस वाक्य में परमेश्वर की निकटता भी झलकती है। प्रभु येशु यह नहीं कहते कि परमेश्वर कहीं दूर है और वहाँ तक पहुँचने के लिए कठिन सीढ़ियाँ चढ़नी होंगी। इसके विपरीत, वे यह प्रकट करते हैं कि परमेश्वर स्वयं मनुष्य के बीच आकर खड़ा है और कह रहा है देखो मैं यहाँ हूँ। यह कथन भय नहीं, बल्कि भरोसे को जन्म देता है; दूरी नहीं, बल्कि संबंध को बुलावा देता है।

मेरे बिना कोई पिता के पास नहीं आ सकता - यह कथन इस पूरे वचन का निष्कर्ष और स्पष्ट घोषणा है। पिता के पास आना केवल किसी स्थान पर पहुँचना नहीं, बल्कि उसका अनुग्रह पाना, उसके साथ सम्बन्ध में आना और अंततः उसके घर में प्रवेश करना है। यह सब केवल मसीह के द्वारा ही संभव है। मनुष्य अज्ञानी है और उसे मार्गदर्शन चाहिए; पापी है और उसे क्षमा चाहिए; अंधा है और उसे प्रकाश चाहिए। यह सब कुछ केवल मसीह में मिलता है। परमेश्वर ने उन्हें ही मध्यस्थ ठहराया है, और यह ठहराया है कि सारी आशीषें उन्हीं के द्वारा मनुष्य तक पहुँचें।

मसीह अपने लोगों को पिता के सामने प्रस्तुत करते हैं, उनकी प्रार्थनाओं को स्वीकार्य बनाते हैं और उन्हें उस स्थान तक पहुँचाते हैं जिसे वास्तव में “घर” कहा जा सकता है। पिता के साथ होना ही घर होना है, और उस घर तक पहुँचने का एकमात्र मार्ग मसीह स्वयं हैं। इस प्रकार “मार्ग, सत्य और जीवन” कोई अलग-अलग बातें नहीं, बल्कि एक ही वास्तविकता के तीन पहलू हैं जो मसीह स्वयं है और जिनमें परमेश्वर प्रकट होता है और जिनके द्वारा मनुष्य परमेश्वर तक पहुँचता है।

यूहन्ना 14:6 - भक्ति संदेश 

यूहन्ना 14:6 का दिव्य संदेश मानव अस्तित्व की सबसे गहरी खोज का उत्तर प्रस्तुत करता है, जहाँ प्रभु येशु मसीह स्वयं को मार्ग, सत्य और जीवन के रूप में प्रकट करते हैं। यह कोई साधारण धार्मिक घोषणा नहीं, बल्कि एक जीवित और कार्यशील अनुभव है, जो मनुष्य को सीधे पिता परमेश्वर की ओर ले जाता है। जब इस वचन को जीवन में उतारने की बात आती है, तो सबसे पहले यह समझना आवश्यक हो जाता है कि संसार की जटिल भूलभुलैया में मनुष्य अक्सर ऐसे रास्तों की खोज करता है जो ऊपर से आकर्षक और सरल प्रतीत होते हैं, परंतु अंततः वे उसे विनाश और निराशा की ओर ले जाते हैं। येशु मसीह का मार्ग होना यह सिखाता है कि मसीही जीवन किसी कठोर नियम-पुस्तिका का पालन मात्र नहीं, बल्कि एक जीवित व्यक्तित्व के साथ निरंतर चलना है। जैसे कोई भटका हुआ यात्री एक अनुभवी और विश्वसनीय मार्गदर्शक पर अपना भरोसा रखता है, वैसे ही विश्वासियों को अपनी सीमित समझ को त्यागकर मसीह के पदचिन्हों पर चलना होता है, क्योंकि वही एकमात्र ऐसा सेतु है जो पाप की गहरी खाई को पार कराकर अनंतता के तट तक पहुँचाता है।

पवित्रशास्त्र के महान व्यक्तियों के जीवन में इस सत्य का जीवंत प्रमाण स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। प्रेरित पौलुस का जीवन इसका एक प्रमुख उदाहरण है, जो पहले व्यवस्था के मार्ग पर चलते हुए मसीहियों को सताता था और यह मानता था कि वह परमेश्वर की सेवा कर रहा है। परंतु दमिश्क की सड़क पर जब उसका सामना स्वयं उस मार्ग से हुआ, तो उसका संपूर्ण जीवन उलट-पलट हो गया। उसने अपनी धार्मिक योग्यताओं, उपलब्धियों और आत्मधार्मिकता को तुच्छ समझा ताकि वह मसीह को प्राप्त कर सके। पौलुस का यह परिवर्तन दर्शाता है कि जब मनुष्य मसीह को अपने जीवन की दिशा बना लेता है, तब उसकी निजी योजनाएँ पीछे छूट जाती हैं और ईश्वरीय उद्देश्य उसके जीवन में प्रधान हो जाते हैं। इसी प्रकार, पत्रस का अनुभव भी गहरी शिक्षा देता है। जब वह लहरों पर चलते समय अपनी दृष्टि मसीह से हटाकर तूफ़ान पर केंद्रित करता है, तो वह डूबने लगता है। यह घटना बताती है कि जब तक विश्वास की आँखें सही दिशा पर टिकी रहती हैं, तब तक असंभव परिस्थितियाँ भी भय उत्पन्न नहीं कर पातीं, परंतु जैसे ही ध्यान संसार की उथल-पुथल पर जाता है, जीवन अस्थिर हो जाता है।

सत्य के रूप में मसीह को स्वीकार करना मनुष्य के नैतिक और आत्मिक जीवन में एक गहरा परिवर्तन लाता है। आज की दुनिया सापेक्ष सत्य की बात करती है, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति अपनी सुविधा और दृष्टिकोण के अनुसार सत्य को परिभाषित करता है। इसके विपरीत, येशु मसीह स्वयं को ऐसा सत्य प्रकट करते हैं जो परिस्थितियों, समय और विचारधाराओं से परे है। इसे एक प्रकाशस्तंभ के उदाहरण से समझा जा सकता है, जो चाहे समुद्र कितना ही अशांत क्यों न हो, अपनी जगह स्थिर रहता है और जहाजों को सुरक्षित दिशा प्रदान करता है। यदि कोई नाविक उस प्रकाश के स्थान पर लहरों की चाल का अनुसरण करने लगे, तो उसका विनाश निश्चित हो जाता है। इसी प्रकार, जब मनुष्य बदलती हुई विचारधाराओं और सांसारिक दर्शन के पीछे चलता है, तो उसका आत्मिक जीवन भ्रमित और विखंडित हो जाता है। मसीह रूपी सत्य को जीवन में अपनाने का अर्थ है अपने विचारों, इच्छाओं और कार्यों को उस दिव्य प्रकाश के सामने रखना, जहाँ कोई अंधकार छिपा नहीं रह सकता। यही सत्य मनुष्य को स्वतंत्र करता है, क्योंकि यह उसे उसकी वास्तविक स्थिति से अवगत कराकर पश्चाताप और परिवर्तन की ओर ले जाता है।

जीवन का अर्थ केवल शारीरिक अस्तित्व या सांसारिक सुख-सुविधाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि उस अनंत जीवन का अनुभव करना है जिसका स्रोत स्वयं मसीह हैं। लाजर की घटना इस सत्य को अत्यंत सशक्त रूप में प्रकट करती है। वह न केवल शारीरिक रूप से मर चुका था, बल्कि कई दिनों से कब्र में पड़ा था, फिर भी जब जीवन स्वयं उसकी कब्र के सामने खड़ा हुआ, तो मृत्यु को पीछे हटना पड़ा। यह घटना यह आश्वासन देती है कि चाहे जीवन की परिस्थितियाँ कितनी ही निराशाजनक क्यों न हों, चाहे सपने टूट चुके हों, रिश्ते बिखर चुके हों या आत्मा भीतर से मृत प्रतीत हो रही हो, मसीह का स्पर्श नया जीवन उत्पन्न कर सकता है। जैसे कोई डाली यदि मूल वृक्ष से अलग हो जाए तो कुछ समय तक हरी-भरी दिखाई दे सकती है, पर अंततः वह सूख जाती है, वैसे ही मसीह से अलग होकर मनुष्य का जीवन स्थायी फल नहीं ला सकता। मसीह से जुड़े रहने में ही पवित्र आत्मा का फल उत्पन्न होता है और जीवन में सच्ची सार्थकता आती है।

इस वचन का गहरा प्रभाव विश्वासियों के दैनिक निर्णयों में स्पष्ट रूप से दिखाई देना चाहिए। पिता के पास पहुँचने का अर्थ केवल मृत्यु के बाद स्वर्ग में प्रवेश करना नहीं है, बल्कि वर्तमान जीवन में भी परमेश्वर की उपस्थिति में चलना है। यह एक ऐसी विनम्र स्वीकारोक्ति है कि मसीह की मध्यस्थता के बिना कोई भी मनुष्य पवित्र परमेश्वर के सामने खड़े होने के योग्य नहीं है। यह समझ विश्वासियों को घमंड से दूर रखती है और दूसरों के प्रति करुणा से भर देती है, क्योंकि यह स्मरण दिलाती है कि यह मार्ग अनुग्रह के द्वारा प्राप्त हुआ है, न कि मानवीय प्रयासों से। जब मसीह जीवन का केंद्र बन जाते हैं, तब प्रार्थनाएँ, आराधना और व्यवहार सभी एक ही दिशा में प्रवाहित होने लगते हैं। यह परिवर्तन मनुष्य को संसार की क्षणभंगुरता से निकालकर ईश्वरीय अनंतता की ओर ले जाता है, जहाँ शांति, आनंद और सत्य का राज्य सदा बना रहता है।

यूहन्ना 14:6 - कुछ सवाल खुद से पूछे 

1) जब जीवन की दिशा स्पष्ट नहीं होती, तब क्या मैं प्रभु येशु को अपने मार्ग के रूप में चुनता हूँ?

2) क्या मैं अपने जीवन के हर क्षेत्र में प्रभु येशु में प्रकट हुए सत्य को स्वीकार करता हूँ?

3) क्या मेरा आत्मिक जीवन प्रभु येशु से मिलने वाले जीवन से संचालित हो रहा है?

4) कठिन परिस्थितियों में क्या मेरी दृष्टि प्रभु येशु पर स्थिर रहती है, जो मेरा मार्ग हैं?

5) क्या मेरे निर्णय और प्राथमिकताएँ यह दिखाती हैं कि प्रभु येशु ही मेरे जीवन का केंद्र, सत्य और जीवन हैं?

यूहन्ना 14:6 - प्रार्थना

हे मेरे दयालु पिता परमेश्वर, इस नई सुबह के लिए मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ। मैं यह विश्वास करता हूं कि यह दिन, यह उजाला और यह जीवन तेरी ही कृपा से आज मुझे मिला है। जब मेरी आँखें खुलीं, तो मैंने फिर से यह जाना कि मेरा जीवन तेरे अनुग्रह पर टिका है। इस नए दिन की शुरुआत में मैं अपना हृदय तेरे सामने झुकाता हूँ और धन्यवाद के साथ तुझे स्मरण करता हूँ।

हे पिता, आज मैं अपने जीवन का हर मार्ग प्रभु येशु के हाथों में सौंपता हूँ। जब मैं यह नहीं समझ पाता कि किस दिशा में चलूँ और कौन-सा निर्णय सही होगा, तब मुझे उसी मार्ग पर स्थिर रख जो प्रभु येशु स्वयं हैं। जब मेरे कदम डगमगाएँ और मेरा मन भ्रमित हो जाए, तब मुझे अपने हाथ से थामे रखना, ताकि मैं अपने विचारों के पीछे नहीं, बल्कि प्रभु येशु के पीछे चल सकूँ।

पिता, मैं चाहता हूँ कि मेरा जीवन केवल बाहरी रूप से सही न दिखे, बल्कि भीतर से भी उस सत्य से भरा हो जो प्रभु येशु में प्रकट हुआ है और स्वयं ही है। मुझे उसी सत्य में स्थिर रख जो बदलता नहीं, जो मेरे मन को प्रकाश देता है और मेरे हृदय को शुद्ध करता है। जब मैं अपनी सुविधा के अनुसार सत्य को समझने या मोड़ने लगूँ, तब मुझे नम्र कर और फिर से प्रभु येशु के सत्य की ओर लौटा दे। मेरा जीवन ऐसा हो कि लोग मेरे शब्दों से नहीं, बल्कि मेरे आचरण से उस सत्य को पहचान सकें।

हे पिता, जब मैं भीतर से थक जाता हूँ, जब जीवन का बोझ भारी लगने लगता है और मेरी आशा कमज़ोर पड़ने लगती है, तब मुझे उस जीवन से भर दे जो प्रभु येशु से निकलता है। वही जीवन मेरी आत्मा को नया करे, मेरे मन को शांति दे और मेरे भीतर ऐसी सामर्थ्य भरे जिससे मैं हर परिस्थिति में स्थिर रह सकूँ। मेरा जीवन परिस्थितियों पर नहीं, बल्कि प्रभु येशु में पाए जाने वाले जीवन पर आधारित रहे।

पिता, मैं अपने परिवार और अपने प्रियजनों को भी तेरे सामने लाता हूँ। उनके जीवन के मार्गों की रक्षा कर और उन्हें प्रभु येशु के मार्ग में बनाए रख, ताकि वे भटकें नहीं। उन्हें प्रभु येशु के सत्य में स्थिर कर, जिससे वे भ्रम और झूठ से सुरक्षित रहें। उनके जीवन में स्वास्थ्य और सुरक्षा बनाए रख, और उन्हें वह जीवन दे जो प्रभु येशु की शांति और अनुग्रह से भरपूर हो। हे पिता, मेरे घर को ऐसा स्थान बना जहाँ प्रभु येशु की उपस्थिति अनुभव की जाए। हमारे संबंधों में प्रेम, सच्चाई और जीवन की ताज़गी बनी रहे। हमें एक-दूसरे के लिए आशीष का कारण बना, ताकि हमारे जीवन के द्वारा तेरी महिमा प्रकट हो।

अंत में, हे पिता मैं इतना कहकर अपनी प्रार्थना पूरी करना चाहूंगा कि मुझे प्रभु येशु में पाए जाने वाले मार्ग पर चलने की सामर्थ्य दे, मुझे प्रभु येशु में प्रकट हुए सत्य में स्थिर रख, और मुझे प्रभु येशु से मिलने वाले उस जीवन से भर दे जो कभी समाप्त नहीं होता। मेरा पूरा अस्तित्व तेरे अधीन रहे और मेरा जीवन प्रभु येशु की महिमा को प्रकट करे। मैं अपना आज और आने वाला हर दिन तेरे चरणों में सौंपता हूँ। इसके साथ सौंपता हूं। यह प्रार्थना मैं विश्वास, नम्रता और समर्पण के साथ तेरे सामने रखता हूँ। येशु के नाम में 

आमीन।

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