अभिवादन और प्रस्तुति
मसीह में मेरे प्रिय भाइयों और बहनों, आप सभी को हमारे सच्चे शांति के स्रोत और संसार को जीतने वाले प्रभु येशु मसीह के बहुमूल्य और पवित्र नाम में अनुग्रह और आशीष मिले। आज का दिन परमेश्वर की ओर से हमारे लिए एक अनमोल उपहार बनकर आया है, और हम कृतज्ञ हैं कि उसने हमें अपने वचन पर मनन करने के लिए एक और सुबह दी है। प्रार्थना करता हूं कि यह वचन आपके हृदयों में शांति, साहस और आत्मिक सामर्थ लेकर आए।
Bible Vachan में आज का हमारा वचन हमने यूहन्ना 16:33 से लिया है। इस वचन को उस गहरी और भावनात्मक बातचीत से लिया गया है जो प्रभु येशु ने अंतिम भोज के बाद अपने शिष्यों के साथ की थी। जब चारों ओर भय, उलझन और आने वाले दुःख की छाया थी, तब येशु ने अपने शिष्यों को एक ऐसा वचन दिया जो उस समय शिष्यों के साथ हर युग के विश्वासियों के लिए आशा और साहस का स्रोत है।
उन्होंने कहा, “मैं ने ये बातें तुम से इसलिये कही हैं, कि तुम्हें मुझ में शान्ति मिले; संसार में तुम्हें क्लेश होता है, परन्तु ढाढ़स बांधो, मैं ने संसार को जीन लिया है॥” यह वचन केवल उस समय के शिष्यों के लिए ही नहीं था, बल्कि आज के हर उस विश्वासी के लिए भी है जो जीवन की कठिनाइयों और चुनौतियों का सामना करता है।
तो चलिए ज्यादा समय न गवाते हुए आज हम इस पर थोड़ा और गहराई से मनन करें।
शीर्षक : क्लेश के बीच स्थिर मन
पुस्तक : यूहन्ना रचित सुसमाचार
लेखक : यूहन्ना
अध्याय : 16
वचन : 33
मैं ने ये बातें तुम से इसलिये कही हैं, कि तुम्हें मुझ में शान्ति मिले; संसार में तुम्हें क्लेश होता है, परन्तु ढाढ़स बांधो, मैं ने संसार को जीन लिया है॥ यूहन्ना 16:33
यूहन्ना 16:33 - संदर्भ
यूहन्ना 16:33 का संदर्भ उस गहरी आत्मिक बातचीत से जुड़ा है जो अंतिम भोज के बाद येशु और उनके शिष्यों के बीच हुई थी। यह पूरी बातचीत यूहन्ना रचित सुसमाचार के अध्याय 13 से 17 तक विस्तृत है, जिसे “अंतिम उपदेश” कहा जाता है। उस समय येशु जानते थे कि उनकी गिरफ्तारी, क्रूस पर मृत्यु और पुनरुत्थान बहुत निकट हैं। वे यह भी जानते थे कि उनके चले जाने के बाद शिष्यों को अकेलेपन, भय और असुरक्षा का सामना करना पड़ेगा।
शिष्यों का यह विश्वास था कि येशु उनके साथ बने रहेंगे, इस्राएल को स्वतंत्र कराएंगे और परमेश्वर का राज्य स्थापित करेंगे। लेकिन जब येशु ने अपने जाने और दुःख उठाने की बात कही, तो वे गहरे शोक और भ्रम में पड़ गए। उन्हें लगा कि उनकी सारी आशाएँ टूट रही हैं। इसी उलझन और भय के बीच येशु ने यह बातचीत की, ताकि वे पहले से तैयार हो सकें।
येशु ने उन्हें चेतावनी दी कि संसार उन्हें वैसे ही ठुकराएगा जैसे उसने उन्हें ठुकराया था। उन्हें सताया जाएगा, सभागृहों से निकाला जाएगा, और यहाँ तक कि उन्हें मार डालना भी एक धार्मिक सेवा समझा जाएगा। यह सब सुनकर शिष्य और भी अधिक व्याकुल हो गए। लेकिन येशु ने उन्हें यह आश्वासन दिया कि वे अकेले नहीं होंगे, बल्कि पवित्र आत्मा उनके साथ रहेगा। पवित्र आत्मा उन्हें सिखाएगा, मार्गदर्शन करेगा और सच्चाई में स्थिर रखेगा।
येशु ने इस पूरे उपदेश का निष्कर्ष यूहन्ना 16:33 में किया। एक प्रकार से यह अंतिम सार था, जब उन्होंने शिष्यों से कहा कि संसार में उन्हें कठिनाई और सताव का सामना करना पड़ेगा, लेकिन उसी समय वे मसीह में शांति पाएँगे, क्योंकि येशु पहले ही संसार पर विजय पा चुके हैं। इस प्रकार यह पद उस ऐतिहासिक क्षण को प्रकट करता है, जब येशु ने अपने सबसे कठिन समय से पहले शिष्यों को साहस, आशा और शांति देने के लिए यह सामर्थ्यपूर्ण सत्य प्रकट किया।
यूहन्ना 16:33 - टिप्पणी
मैं ने ये बातें तुम से इसलिये कही हैं - इस वाक्य के साथ प्रभु येशु अपने पूरे विदाई-उपदेश को एक उद्देश्यपूर्ण सूत्र में बाँध देते हैं। “ये बातें” केवल अभी-अभी कही गई बातें नहीं हैं, बल्कि वह सब कुछ है जो उन्होंने इस अंतिम समय में अपने चेलों से कहा जिसमें अपने चले जाने की घोषणा, उनके मन में उठने वाले डर, आने वाले अलगाव का दर्द, संसार की शत्रुता, आत्मा की सहायता का वादा, प्रार्थना का भरोसा, और अंत में विजय का आश्वासन दिया। यह वाक्य यह स्पष्ट करता है कि येशु ने कुछ भी यूँ ही नहीं कहा; हर शब्द के पीछे एक गहरा प्रेमपूर्ण उद्देश्य था। वह अपने चेलों को अनजान या असहाय छोड़ना नहीं चाहते थे। वह जानते थे कि उनके जाने के बाद ये लोग टूट सकते हैं, भ्रमित हो सकते हैं, और परिस्थितियों से हार मान सकते हैं। इसलिए उन्होंने पहले ही सब कुछ कह दिया, ताकि जब घटनाएँ घटें, तो वे चौंकें नहीं बल्कि समझें।
यह वाक्य यह भी दिखाता है कि येशु का तरीका हमेशा पहले से तैयार करने का रहा है। वह संकट आने के बाद ढाढ़स नहीं देते, बल्कि संकट से पहले सत्य देकर मन को स्थिर करते हैं। उनके शब्द भविष्य की पीड़ा के लिए आत्मा की तैयारी हैं। यहाँ एक शिक्षक का नहीं, बल्कि एक चरवाहे का हृदय दिखाई देता है, जो जानता है कि भेड़ें किन रास्तों से गुजरेंगी। “मैं ने ये बातें कही हैं” यह भी बताता है कि शांति, साहस और स्थिरता किसी अचानक अनुभव से नहीं, बल्कि मसीह के वचन को भीतर रखने से आती है। येशु अपने चेलों के मन में अपने शब्दों को जमा कर रहे हैं, ताकि अंधकार के समय वही शब्द उनके लिए प्रकाश बनें। इस प्रकार यह वाक्य पूरे अध्याय की कुंजी है जो यह बताता है कि आने वाले कष्टों के बीच भी चेलों के पास स्मरण करने के लिए कुछ होगा, जो स्वयं प्रभु के बोले हुए वचन है।
कि तुम्हें मुझ में शान्ति मिले - यहां प्रभु येशु उस उद्देश्य को खोलते हैं, जिसके लिए उन्होंने सब कुछ कहा था और वह यह है कि शांति कहीं बाहर नहीं, बल्कि “मुझ में” मिले। यहाँ शांति का अर्थ केवल बाहरी हालात का ठीक होना नहीं है, न ही यह केवल परमेश्वर से मेल की कानूनी स्थिति है, और न ही मात्र अंतरात्मा की हल्की तसल्ली। यह एक गहरी, ठहरी हुई, भीतर से उपजी हुई मन की अवस्था है, जो व्यक्ति को टूटने से बचाती है। यह शांति संसार के बदलते हालात पर टिकी नहीं होती, बल्कि मसीह के साथ जीवित संबंध पर आधारित होती है। “मुझ में” कहना यह स्पष्ट करता है कि यह शांति किसी स्थान, विधि, भावना या प्रयास से नहीं मिलती, बल्कि एक व्यक्ति में रहने से मिलती है। जब तक चेले मसीह में बने रहते हैं, उसी अनुपात में वे शांति का अनुभव करते हैं।
यह शांति संसार के विरोध के बावजूद बनी रहती है। यह कष्टों की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि कष्टों के बीच संतुलन है। मसीह अपने चेलों को यह नहीं कहते कि संसार सुधर जाएगा, बल्कि यह बताते हैं कि उनके भीतर कुछ ऐसा होगा जो संसार की शत्रुता से बड़ा होगा। यह शांति आत्मा का विश्राम है, जो तब भी स्थिर रहता है जब मन उलझा हो, भावनाएँ डगमगा रही हों और भविष्य धुँधला लग रहा हो। इस शांति का स्रोत मसीह का स्वभाव, उसका प्रेम, उसकी सामर्थ और उसकी विजय है। वह स्वयं यह शांति जीता है और वही शांति अपने लोगों को बाँटता है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि यह शांति “मुझ में” है, न कि चेलों में स्वयं। इसका अर्थ यह है कि मनुष्य के अपने गुण, उसकी धार्मिकता, उसके काम या उसकी समझ इस शांति का आधार नहीं हैं। जब व्यक्ति स्वयं को देखता है, तो डर बढ़ता है; लेकिन जब वह मसीह में देखता है, तो शांति आती है। यही कारण है कि येशु ने पहले बोलकर यह शांति दी, ताकि बाद में आने वाली घटनाएँ इस शांति को तोड़ न सकें। यह वाक्य सिखाता है कि सच्ची शांति परिस्थितियों से नहीं, बल्कि संगति से आती है और यह मसीह के साथ गहरी और जीवित संगति से आती है।
संसार में तुम्हें क्लेश होता है - यहां प्रभु येशु कोई सांत्वना नहीं, बल्कि एक साफ़ और सच्ची घोषणा करते हैं। वह अपने चेलों को भ्रम में नहीं रखते कि मुझसे जुड़ने के बाद जीवन आसान हो जाएगा। इसके विपरीत, वह पहले ही यह स्पष्ट कर देते हैं कि संसार में रहते हुए क्लेश अनिवार्य है। यहाँ “संसार” से केवल पृथ्वी या मानव समाज का सामान्य ढाँचा नहीं समझना चाहिए, बल्कि वह व्यवस्था समझनी चाहिए जो परमेश्वर से अलग होकर चलती है और मसीह के विरोध में खड़ी रहती है। इसी संसार के साथ संपर्क में रहते हुए चेलों को क्लेश का अनुभव होना है। यह क्लेश अस्थायी या संयोगवश नहीं है, बल्कि मसीही जीवन की एक स्थायी वास्तविकता है।
यह बात चौंकाने वाली नहीं होनी चाहिए, क्योंकि स्वयं येशु का जीवन दुःखों से भरा हुआ था। यदि सिर ने विरोध सहा, तो अंग उससे बच नहीं सकते। संसार स्वभाव से उस प्रकाश को अस्वीकार करता है जो उसकी अंधकारपूर्ण दशा को उजागर करता है। इसलिए मसीह में चलने वाला व्यक्ति संसार के आराम में फिट नहीं बैठता। यहाँ “क्लेश” केवल शारीरिक कष्ट या बाहरी सताव तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें मानसिक दबाव, सामाजिक तिरस्कार, गलत समझे जाने का दर्द, और भीतर की लड़ाइयाँ भी शामिल हैं। यह जीवन के हर स्तर पर अनुभव होने वाला दबाव है।
फिर भी यह क्लेश दण्ड के रूप में नहीं, बल्कि प्रशिक्षण के रूप में आता है। यह परमेश्वर की शत्रुता नहीं, बल्कि उसकी पिता जैसी देखभाल का संकेत है। इन क्लेशों के द्वारा विश्वास परखा जाता है, मन शुद्ध होता है, और आत्मिक दृष्टि गहरी बनती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह क्लेश “संसार में” है, न कि “मसीह में।” स्थान बदलते ही अनुभव बदल जाता है। व्यक्ति संसार में रहते हुए क्लेश झेलता है, लेकिन मसीह में रहते हुए भीतर से स्थिर रहता है। इस वाक्य का उद्देश्य डर पैदा करना नहीं, बल्कि सच्चाई से परिचित कराना है, ताकि जब क्लेश आए, तो चेले उसे असामान्य या विश्वास की हार न समझें, बल्कि मसीही जीवन का हिस्सा मानकर स्थिर बने रहें।
परन्तु ढाढ़स बाँधो, मैं ने संसार को जीत लिया है - यह वाक्य पूरे वचन की चोटी है, जहाँ क्लेश की सच्चाई के ऊपर विजय का प्रकाश चमकता है। “ढाढ़स बाँधो” कोई साधारण दिलासा नहीं है, बल्कि आत्मा को उठ खड़ा होने का आह्वान है। यह डर को नकारने की नहीं, बल्कि उससे ऊपर उठने की पुकार है। येशु यह नहीं कहते कि तुम्हें ढाढ़स इसलिए रखना चाहिए क्योंकि तुम मजबूत हो, या क्योंकि हालात बदल जाएँगे, बल्कि इसलिए कि “मैं ने संसार को जीत लिया है।” ढाढ़स का आधार चेलों की स्थिति नहीं, बल्कि मसीह की विजय है। यहाँ “मैं” शब्द पर विशेष ज़ोर है, यानी यह जीत पूरी तरह उसकी है, और उसी से चेलों को साहस मिलता है।
यह जीत भविष्य की आशा मात्र नहीं, बल्कि ऐसी विजय है जिसे येशु पहले ही पूरा हुआ मानकर बोलते हैं। यद्यपि क्रूस अभी सामने है, फिर भी वह हार नहीं, बल्कि विजय का मार्ग है। संसार की सारी विरोधी शक्तियाँ जैसे पाप, शैतान, भय, मृत्यु, और मानव की शत्रुता ये सब इस विजय के भीतर आ चुकी हैं। इसलिए चेलों का क्लेश अंतिम शब्द नहीं है; अंतिम शब्द विजय का है। मसीह की यह जीत उसकी अकेली नहीं रहती, बल्कि उससे जुड़े सभी लोगों की जीत बन जाती है। जो उसके साथ हैं, वे हार की स्थिति में होकर भी पराजित नहीं होते।
इस वाक्य में एक गहरा संतुलन है जिसमें क्लेश की सच्चाई को नकारा नहीं गया, लेकिन उसे अंतिम अधिकार भी नहीं दिया गया। मसीह की विजय क्लेश को समाप्त नहीं करती, बल्कि उसे निष्फल कर देती है। अब क्लेश डराने वाला नहीं, बल्कि पराजित शत्रु की तरह है। इसलिए ढाढ़स परिस्थिति से नहीं, बल्कि मसीह की पहचान से आता है। जो यह जानता है कि उसका प्रभु जीत चुका है, वह चलते हुए काँप सकता है, रो सकता है, पर टूट नहीं सकता। यही इस वचन की अंतिम और स्थायी शक्ति है जो बताती है कि संसार में क्लेश है, पर मसीह में विजय है, और वही विजय विश्वासियों का स्थायी साहस बन जाती है।
इस पूरे वचन का निष्कर्ष यदि हम समझे तो यह है कि प्रभु येशु अपने चेलों को वास्तविकता से दूर नहीं ले जाते है, बल्कि उन्हें सच्चाई के भीतर स्थिर करते हैं। वह पहले वचन देते हैं, फिर कष्ट बताते हैं, और अंत में अपनी विजय पर टिकाकर साहस देते हैं। शांति संसार में नहीं, बल्कि मसीह में है; क्लेश निश्चित है, पर निर्णायक नहीं; और ढाढ़स का आधार मनुष्य की सामर्थ नहीं, बल्कि मसीह की पूरी हो चुकी जीत है। यह वचन सिखाता है कि मसीही जीवन कष्ट से रहित नहीं, पर आशा से भरा हुआ है। मसीह की विजय ही विश्वासियों की स्थिरता, धैर्य और अंतिम भरोसा है।
यूहन्ना 16:33 - भक्ति संदेश
यूहन्ना 16:33 का दिव्य संदेश मसीही विश्वास की उस महान आधारशिला को प्रकट करता है जहाँ संसार की उथल-पुथल और स्वर्गीय शांति का अनंत मिलन होता है। प्रभु येशु मसीह के इन शब्दों में एक ऐसी ईश्वरीय प्रतिज्ञा समाहित है जो उनके अनुयायिओं क आत्मा को न केवल सांत्वना देती है, बल्कि मनुष्य के भीतर उस अलौकिक साहस को भी जागृत करती है जो मृत्यु और विनाश के मानवीय भय से कहीं ऊपर है। इस नश्वर संसार में क्लेश का होना एक अटल और सार्वभौमिक सत्य है, क्योंकि यह जगत अपने वर्तमान स्वरूप में अपूर्णता और निरंतर संघर्षों से घिरा हुआ है। यहाँ का प्रत्येक प्राणी किसी न किसी स्तर पर युद्धरत है, चाहे वे शारीरिक व्याधियाँ हों, मानसिक द्वंद्व हों या फिर गहन आत्मिक संघर्ष। मसीह का यह आश्वासन कि उन्होंने संसार को जीत लिया है, विश्वासियों के लिए एक ऐसा अभेद्य सुरक्षा कवच बन जाता है जो हर सांसारिक तूफान के बीच आत्मा को अडिग रहने की सामर्थ्य प्रदान करता है। अंधकार पर ज्योति की यह सुनिश्चित विजय ही वह ज्योति स्तंभ है जो घोर निराशा के बीच भी मसीही हृदय को आलोकित रखता है।
परमेश्वर की रचना में प्रकृति और ब्रह्मांड इस विजय के जीवंत गवाह के रूप में खड़े दिखाई देते हैं। स्मरण करें जब एक सूक्ष्म बीज भूमि की अंधकारपूर्ण गहराई में दबता है, तो वह भारी दबाव और अपनी बाहरी खोल के टूटने के क्लेश से गुजरता है। यदि वह बीज उस घोर कष्ट और घुटन को सहन न करे, तो वह कभी एक विशाल और फलदायी वृक्ष का रूप धारण नहीं कर सकता है। उसका अंकुरित होना वास्तव में उस दमनकारी दबाव पर उसकी सृजनात्मक जीत का प्रतीक है। इसी प्रकार, जब हम ब्रह्मांड की अनंत विशालता को देखते हैं, तो पाते हैं कि धधकते हुए तारों का निर्माण भी अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण और प्रचंड दबाव के गर्भ से होता है। मूल्यवान हीरा भी कोयले की उसी काली खान से उत्पन्न होता है जहाँ उसने सदियों तक असहनीय ताप और दबाव को सहा होता है। ये प्राकृतिक सत्य हमें यह संदेश देते हैं कि क्लेश केवल विनाशकारी नहीं होते, बल्कि वे वह ईश्वरीय भट्टी हैं जिनमें आत्मा की परिपक्वता और स्वर्गीय महिमा का स्वरूप गढ़ा जाता है। मसीह की शांति हृदय में उस गहरे महासागर की तरह व्याप्त रहती है जिसकी ऊपरी सतह पर तो लहरों का कोलाहल हो सकता है, परंतु जिसकी गहराई में सदैव पूर्ण स्थिरता और दिव्य मौन बना रहता है।
बाइबल के इतिहास में यूसुफ का जीवन ही देख लो जो इस ईश्वरीय सत्य का एक अद्भुत और प्रखर प्रमाण है। अपने ही भाइयों द्वारा त्याग दिए जाने, दास के रूप में बेचे जाने और झूठे आरोपों के कारण कारागार की कालकोठरी में डाल दिए जाने के बावजूद, उसने वर्षों तक अन्याय और एकाकीपन का क्लेश सहा। उसके भीतर मसीह जैसी शांति इसलिए अटूट रही क्योंकि उसका संपूर्ण भरोसा उस परमेश्वर पर केंद्रित था जो बुराई को भी भलाई में परिवर्तित करने की संप्रभु सामर्थ्य रखता है। यूसुफ ने अपनी विकट परिस्थितियों को अपनी आत्मा पर हावी होने की अनुमति नहीं दी, बल्कि उसने उस विश्वास की 'जय' को थामे रखा जो अंततः उसे मिस्र के सर्वोच्च सिंहासन तक ले गई। इसी प्रकार, प्रेरित पौलुस का जीवन दर्शाता है कि कोड़े खाने, पथराव सहने और समुद्री विपत्तियों के बीच भी मसीही शांति किसी बाहरी सुख-सुविधा की मोहताज नहीं होती। जेल की कोठरी से गाए गए उसके आनंद के गीत इस सत्य की पुष्टि करते हैं कि आत्मा का आंतरिक संबंध जब उस सर्वशक्तिमान से जुड़ जाता है, तो संसार की कोई भी शक्ति उसे पराजित नहीं कर सकती।
इतिहास के विस्तृत पन्नों में ऐसी कई महान आत्माओं का उल्लेख मिलता है जिनका संघर्ष और विजय का भाव इसी ईश्वरीय सिद्धांत की प्रतिध्वनि करता है। जब मनुष्य को पूर्णतः तोड़ देने वाले गहरे अंधेरे की बात आती है, तो उन लोगों का स्मरण होता है जिन्होंने घोर दासता और अमानवीय अत्याचारों के बीच भी अपने आत्मिक गौरव को अक्षुण्ण रखा। उनकी इस शांति का एकमात्र स्रोत वह अटूट विश्वास था कि सत्य और प्रेम की शक्ति अंततः अंधकार की हर जंजीर को छिन्न-भिन्न कर देगी। जिस प्रकार एक नन्हा सा दीपक अपनी पूरी सामर्थ्य के साथ घने अंधकार को चुनौती देता है, उसी प्रकार एक विश्वासी का हृदय भी संसार के क्लेशों के बीच मसीह की ज्योति बनकर प्रज्वलित रहता है। यह ईश्वरीय संदेश इस बोध को गहरा करता है कि वास्तविक विजय समस्याओं की अनुपस्थिति में नहीं, बल्कि उन समस्याओं के मध्य मसीह के स्वरूप में बने रहने में निहित है।
संसार की विजय सदैव अस्थायी, भौतिक और नाशवान होती है, जबकि मसीह द्वारा प्रदान की गई विजय आत्मिक, शाश्वत और अपरिवर्तनीय है। प्रभु का वचन यह नहीं कहता कि वे इस जगत से क्लेश को समूल नष्ट कर देंगे, वरन वे यह प्रतिज्ञा करते हैं कि क्लेश की उपस्थिति के बावजूद उनकी दिव्य शांति हृदय में वास करेगी। यह शांति उस निश्चिंत बालक के समान है जो अपनी माता की सुरक्षित गोद में तब भी सुखद निद्रा का आनंद लेता है जब बाहर प्रचंड बिजली कड़क रही हो और तूफान अपनी चरम सीमा पर हो। जीवन के वित्तीय संकट, पारिवारिक मतभेद या स्वास्थ्य की गिरावट के समय मसीह की यह शांति ही वह चट्टान है जो हमें गिरने नहीं देती। जिसने मृत्यु के डंक को निष्प्रभावी कर दिया, उसकी उपस्थिति हर मानवीय समस्या से कहीं अधिक विशाल और सामर्थ्यवान है।
परमेश्वर का यह वचन हर एक विश्वासी के लिए एक आह्वान है कि हमारी आत्मिक जड़ें इतनी गहराई तक पहुँचनी चाहिए कि संसार की कोई भी आंधी उन्हें विचलित न कर सके। यह विश्वास की यात्रा किसी भय के अधीन नहीं, बल्कि उस जय के उत्सव में सहभागी होने के लिए है जो क्रूस पर पूर्ण की जा चुकी है। प्रभु येशु की वह शांति, जो मानवीय समझ और तर्क से परे है, हमारे विचारों और हृदय की रखवाली उस समय भी करती है जब हम पूर्णतः उन पर समर्पित होते हैं। क्षमा, प्रेम और आशा का दामन थामे रखना ही वास्तव में मसीह की उस जीत का प्रतिबिंब है। हम एक ऐसे पक्ष का हिस्सा हैं जिसकी विजय का जयघोष युगों पूर्व ही हो चुका है। अतः, प्रत्येक नई सुबह एक विजेता के अटूट साहस के साथ जागना और प्रत्येक रात्रि उस स्वर्गीय शांति के आंचल में विश्राम करना ही मसीह की संतान होने का वास्तविक गौरव है, क्योंकि जिसने हमें अपनी महिमा के लिए बुलाया है, वह संसार के हर क्लेश से महान और सामर्थ्यवान है।
यूहन्ना 16:33 - जीवन के लिए उपयोगिता
इस वचन का हमारे जीवन के लिए उपयोगिता इस दिव्य आश्वासन में निहित है कि एक मसीही विश्वासी का अस्तित्व संसार की उथल-पुथल से ऊपर उठकर ईश्वरीय शांति में विश्राम पा सकता है। इस वचन का मूल भाव हमें यह सिखाता है कि क्लेश और संघर्ष जीवन के अनिवार्य अंग हैं, परंतु वे हमारे जीवन का अंत नहीं हैं। जब हम इस सत्य को अपने जीवन के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं, तो हमें यह बोध होता है कि हमारी आत्मिक स्थिरता बाहरी परिस्थितियों की अनुकूलता पर निर्भर नहीं होनी चाहिए। संसार में रहते हुए हमें वित्तीय संकट, शारीरिक दुर्बलता या सामाजिक विरोध का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन मसीह की विजय का अर्थ यह है कि ये समस्याएँ हमें कभी पूर्णतः पराजित नहीं कर सकतीं। यह वचन हमारे दृष्टिकोण को बदल देता है, जिससे हम संकटों को केवल पीड़ा के रूप में नहीं, बल्कि ईश्वरीय महिमा के प्रकटीकरण के अवसर के रूप में देखने लगते हैं।
बाइबल के पन्नों में दानिय्येल का जीवन इस सिद्धांत की अद्भुत उपयोगिता को दर्शाता है। जब उसे शेर की मांद में डाला गया, तो उसके पास कोई मानवीय सुरक्षा नहीं थी, परंतु उसके भीतर मसीह जैसी शांति थी क्योंकि उसका विश्वास संसार को जीतने वाले परमेश्वर पर था। इसी प्रकार, प्रेरितों के कार्य में जब पौलुस और सीलास को जेल की कोठरी में बेड़ियों से जकड़ दिया गया, तब भी वे आधी रात को आनंद के गीत गा रहे थे। उनकी यह शांति इस बात का प्रमाण है कि जब हम मसीह की जय को अपने जीवन का आधार बना लेते हैं, तो कारागार की दीवारें भी हमारी आत्मा को कैद नहीं कर सकतीं। यह वचन हमें सिखाता है कि वास्तविक जीवन का अर्थ समस्याओं से भागना नहीं, बल्कि उन समस्याओं के मध्य खड़े होकर मसीह की ज्योति को चमकने देना है।
यूहन्ना 16:33 - जीवन में लागू करना
इस वचन को जीवन में उतारने का वास्तविक अर्थ मसीही यात्रा के दौरान आने वाले हर एक तूफ़ान में अडिग रहकर येशु की विजय का उत्सव मनाना है। इस वचन को व्यवहार में लाने का अर्थ है कि जब हम व्यक्तिगत हानि, बीमारी या सामाजिक दबाव का सामना करें, तो हम अपनी भावनाओं को परिस्थितियों के अधीन न होने दें। जीवन के उन क्षणों में जहाँ सब कुछ बिखरा हुआ प्रतीत होता है, येशु की शांति को थामे रखना ही इस वचन का सक्रिय पालन है। यह हमें सिखाता है कि हम संसार में रहते हुए भी संसार के प्रभाव से ऊपर उठ सकते हैं क्योंकि हमारी शक्ति का स्रोत वह है जिसने मृत्यु और अंधकार को पहले ही पराजित कर दिया है। जब हम अपने दैनिक जीवन में क्रोध के बदले धैर्य और घृणा के बदले प्रेम को चुनते हैं, तो हम वास्तव में उस स्वर्गीय विजय को जी रहे होते हैं जो येशु ने हमारे लिए प्राप्त की है।
बाइबल में अय्यूब का जीवन इस वचन को लागू करने का एक प्रखर उदाहरण प्रस्तुत करता है, जिसने अपना सब कुछ खो देने के बावजूद भी परमेश्वर के विरुद्ध कोई अपशब्द नहीं कहा। उसकी अडिग शांति और अटूट विश्वास यह दर्शाते हैं कि एक विश्वासी क्लेशों के बीच भी उस आंतरिक जय को बनाए रख सकता है जो ईश्वर की ओर से मिलती है। इसी प्रकार, स्तिफनुस का उदाहरण हमें यह बोध कराता है कि जब उस पर पथराव किया जा रहा था, तब भी वह स्वर्ग की ओर देखकर अपने सताने वालों के लिए क्षमा मांग सका। यह क्रियात्मक रूप से येशु के शब्दों को जीने का शिखर है, जहाँ सांसारिक हिंसा भी आत्मिक शांति को भंग नहीं कर पाती।
मसीही जीवन में इस वचन का अनुप्रयोग केवल संकटों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे हर उस निर्णय में झलकता है जहाँ हम डर के स्थान पर विश्वास को चुनते हैं। जब हम दूसरों को यह संदेश देते हैं कि हमारा परमेश्वर हमारी समस्याओं से बड़ा है, तब हम येशु की जीत का विज्ञापन कर रहे होते हैं। प्रेरित पौलुस ने अपनी दुर्बलताओं और सतावों के बीच भी आनंदित रहने का जो रहस्य सीखा था, वही इस वचन का मूल सार है। अंततः, इस वचन को जीने का अर्थ है एक विजेता की मानसिकता के साथ आगे बढ़ना, यह जानते हुए कि संसार का कोई भी संघर्ष हमें उस प्रेम से अलग नहीं कर सकता जो मसीह येशु में हमें मिला है।
यूहन्ना 16:33 - प्रार्थना
हे शांति,अनुग्रहकारी और विजयी परमेश्वर, मैं इस सुंदर और नई सुबह के लिए तेरा कोटि-कोटि धन्यवाद करता हूँ। मैं यह मानता हूं कि तेरी करुणा हर सुबह मेरे लिए नई होती है और तेरी वफादारी आकाश तक ऊँची है। इस नई सुबह को मेरे जीवन में अतिरिक्त जोड़ने के लिए मैं तेरा आभारी हूँ, क्योंकि यह तेरी ही दया, तेरा ही दान है कि मेरी आँखें आज का सूरज देखने पाई हैं। आज मैं अपने हाथ उठाकर तेरे चरणों में बैठकर मैं इस दिन को तुझे समर्पित करता हूँ और तेरी उपस्थिति की उस शीतल छांव को महसूस करता हूँ जो मेरे हर डर को दूर कर देती है और तेरी असीमित शांति से भर देती है।
हे मेरे प्रभु, मैं तेरे पवित्र वचन को अपने हृदय में थामे हुए तेरे पास आज आता हूँ। तूने स्वयं कहा है कि इस संसार में मुझे क्लेश होगा, और मैं स्वीकार करता हूँ कि कई बार जीवन की चुनौतियां मुझे थका देती हैं और मेरा मन अशांत हो जाता है। हे प्रभु, मुझे वह स्वर्गीय शांति प्रदान कर जो तूने देने की प्रतिज्ञा की है और केवल तुझी में पाई जाती है। और जब मैं बाहरी दुनिया के शोर और अपनी आंतरिक चिंताओं के बीच घिरा रहूँ, तब तेरा वह आश्वासन मेरे कानों में गूंजता रहे कि तूने जगत को जीत लिया है। मुझे यह सामर्थ्य दे कि मैं अपनी समस्याओं को एक विजेता की दृष्टि से देख सकूँ। मेरे अविश्वास को दूर कर और मुझे उस गहरे भरोसे से भर दे कि चाहे परिस्थितियां कैसी भी हों, मेरी जीत तेरे नाम में पहले से ही निश्चित है। मुझे साहस दे कि मैं डगमगाऊं नहीं, बल्कि तेरी जीत के आनंद में मग्न होकर हर दिन का साहस के साथ सामना करूँ।
हे मेरे दयालु पिता, मैं अपने परिवार और अपने प्रियजनों को तेरे सामर्थ्यी हाथों में सौंपता हूँ। इस संसार के क्लेश और बीमारियां उन्हें छूने न पाएं। तू हमारे जीवन की वह चट्टान है जो कभी नहीं हिलती। मेरे परिवार के हर सदस्य के शरीर में तेरा उत्तम स्वास्थ्य और मन में तेरी शांति बनी रहे। उन्हें हर प्रकार की शारीरिक हानि, मानसिक तनाव और आत्मिक भटकाव से सुरक्षित रख और जब उनके जीवन में संघर्ष के बादल छाएं, तब तू अपनी ज्योति से उनका मार्ग प्रशस्त करना। उन्हें यह सांत्वना दिलाना कि वे अकेले नहीं हैं, बल्कि संसार को जीतने वाला महान परमेश्वर उनके साथ खड़ा है। हमारे घर को अपनी सुरक्षा के बाड़े से घेर ले और अपनी शांति को हमारे बीच एक पहरेदार की तरह नियुक्त कर दे, ताकि हमारे बीच प्रेम और एकता हमेशा बनी रहे।
हे पिता, मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ क्योंकि तू मेरी प्रार्थनाओं को सुनने वाला परमेश्वर है। मैं इस पूरे दिन को, अपनी योजनाओं को और अपने भविष्य को पूरी तरह से तेरे अधीन करता हूँ। मेरा जीवन केवल तेरे नाम की महिमा का कारण बने। मैं इस प्रार्थना को उस महान विजेता के नाम में मांगता हूँ जिसने मृत्यु और संसार पर जय पाई है, हमारे उद्धारकर्ता प्रभु यीशु मसीह के पवित्र और सामर्थ्यी नाम में।
आमीन।

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