अभिवादन और प्रस्तुति
मसीह में प्रिय भाइयों और बहनों,
प्रभु के पवित्र और अनुग्रहपूर्ण नाम में आप सभी को प्रेम, शांति, अनुग्रह और आत्मिक आशीषें मिले। वह जो हमें हमारी योग्यता कुल या सामर्थ्य से स्वीकार नहीं करता परन्तु हम जैसे है वैसे ही हमे स्वीकार कर हमें उस अनंतजीवन का वारिस बनाता है, उसी की स्तुति युगानुयुग होती रहे। यह नया दिन परमेश्वर की ओर से दिया गया हमारे जीवन के लिए एक अनमोल अवसर है, जहाँ हमें फिर से उसके वचन के पास आने और उससे सीखने का सौभाग्य मिला है। जहां एक तरफ संसार की आवाज़ें हमें अयोग्यता और सीमाएँ गिनाने में लगी रहती हैं, तब परमेश्वर का यह वचन हमें एक अलग ही सच्चाई की ओर बुलाता है।
आज के हमारे Bible vachan में हम 1 कुरिन्थियों 1:26 पर मनन करेंगे। यह वचन हमें स्मरण कराता है कि परमेश्वर की बुलाहट संसार की समझ से कितनी भिन्न है। यह वचन हमें अपने आप को देखने का एक नया दृष्टिकोण देता है और यह सिखाता है कि हमारा मूल्य हमारी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि परमेश्वर की कृपा में छिपा है। आज के इस पाठ के द्वारा हम अपने जीवन पर दृष्टि डालने के लिए यहां आए हैं तो जरा सोचिए क्या हम अब भी अपने आप को संसार की कसौटी पर तौलते हैं, या हम परमेश्वर के चुनाव में अपनी पहचान खोज रहे हैं? जहां हमारी असल पहेचान छिपी है।
तो आइए, इस वचन को खुले हृदय से पढ़ें, उस पर मनन करें और परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह हमें सिखाए कि हम अपने बुलाए जाने को कैसे समझें और उसी विश्वास के साथ जीवन को आगे बढ़ाएँ। आज का यह बाइबल पाठ हमारे लिए केवल पढ़ने का नहीं, बल्कि जीवन को नया अर्थ देने का निमंत्रण भी बने।
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शीर्षक : कमज़ोरी में प्रकट होती हुई परमेश्वर की योजना
पुस्तक : 1 कुरिन्थियों
लेखक : प्रेरित पौलुस
अध्याय : 1
वचन : 26
हे भाइयो, अपने बुलाए जाने को तो सोचो, कि न शरीर के अनुसार बहुत ज्ञानवान, और न बहुत सामर्थी, और न बहुत कुलीन बुलाए गए। 1 कुरिन्थियों 1:26
1 कुरिन्थियों 1:26 - संदर्भ
कुरिन्थ अपने समय का एक समृद्ध और प्रसिद्ध नगर था, जहाँ व्यापार, संस्कृति और बौद्धिक उन्नति को बहुत महत्व दिया जाता था। लोग अपने ज्ञान, वाक्पटुता, सामाजिक प्रतिष्ठा और ऊँचे खानदान पर गर्व करते थे। इसी वातावरण से आए हुए लोग जब कलीसिया का हिस्सा बने, तो उनके भीतर कहीं न कहीं वही सांसारिक सोच बनी रही। वे अब भी मनुष्य की बुद्धिमत्ता और सामर्थ्य को महत्व देने लगे थे, जबकि सुसमाचार उन्हें इसके विपरीत मार्ग दिखाता है।
इसी कारण कलीसिया के भीतर विभाजन और गुटबंदी उत्पन्न हो गई। लोग अलग-अलग अगुओं के नाम पर अपने आप को पहचानने लगे और अपने विश्वास को एक प्रकार की बौद्धिक या सामाजिक श्रेष्ठता दिखाने का साधन बना लिया। यह सोच उनके भीतर अहंकार को बढ़ा रही थी और उन्हें मसीह के क्रूस से दूर ले जा रही थी, जहाँ नम्रता और आत्म-त्याग का संदेश केंद्र में है।
इन परिस्थितियों में पौलुस विश्वासियों को यह स्मरण दिलाने के लिए लिखता है कि उनका उद्धार उनकी किसी योग्यता के कारण नहीं, बल्कि केवल परमेश्वर के अनुग्रह से हुआ है। वह उन्हें मानव-केंद्रित सोच से हटाकर क्रूस के केंद्र में वापस लाना चाहता है। पौलुस स्पष्ट करता है कि परमेश्वर का राज्य संसार के मापदंडों जैसे ज्ञान, शक्ति और प्रतिष्ठा पर आधारित नहीं है।
इससे पहले वह यह भी समझाता है कि संसार जिस क्रूस को मूर्खता समझता है, वही विश्वास करने वालों के लिए परमेश्वर की सामर्थ्य है। यहूदी चिन्हों की खोज में थे और यूनानी ज्ञान की, लेकिन परमेश्वर ने उद्धार का मार्ग उस क्रूस के द्वारा खोला जिसे संसार ठोकर मानता है। इस प्रकार परमेश्वर की बुद्धिमानी संसार की बुद्धि से पूरी तरह भिन्न दिखाई देती है।
इसी संदर्भ में पौलुस जब विश्वासियों से कहता है कि वे अपनी बुलाहट पर विचार करें, तो वह उन्हें स्वयं को देखने के लिए आमंत्रित करता है। वह उन्हें याद दिलाता है कि कलीसिया में अधिकांश लोग न तो महान बुद्धिजीवी थे, न शक्तिशाली और न ही ऊँचे घरानों से आए थे। परमेश्वर ने जानबूझकर ऐसे लोगों को चुना ताकि कोई भी मनुष्य अपने आप पर घमंड न करे। यह सत्य विश्वासियों को नम्रता की ओर ले जाता है और उन्हें यह सिखाता है कि परमेश्वर अपनी महिमा मनुष्य की कमजोरी के द्वारा प्रकट करता है।
1 कुरिन्थियों 1:26 - टिप्पणी
हे भाइयो, अपने बुलाए जाने को तो सोचो - यह वाक्य प्रेरित पौलुस द्वारा कलीसिया को आत्मिक जागरूकता की ओर बुलाने वाला एक गहरा और मनन योग्य आग्रह है। यहाँ “भाइयो” कहकर वह केवल संबोधन नहीं करता, बल्कि आत्मिक संबंध और सहभागिता को प्रकट करता है। यह शब्द स्मरण दिलाता है कि विश्वासियों की पहचान किसी सामाजिक, धार्मिक या सांसारिक वर्ग से पहले परमेश्वर के परिवार से जुड़ी हुई है। इसके बाद “अपने बुलाए जाने को सोचो” कहना केवल याद करने का आग्रह नहीं, बल्कि गहराई से आत्म-परीक्षण करने का निमंत्रण है।
यह बुलाहट मनुष्य की योग्यता, बुद्धि या सामर्थ से उत्पन्न नहीं हुई, बल्कि परमेश्वर की स्वतंत्र कृपा और योजना का परिणाम है। पौलुस श्रोताओं को यह स्मरण दिला रहा है कि उनका चुना जाना किसी सांसारिक मानदंड पर आधारित नहीं था। वे न तो अपने ज्ञान के कारण, न सामर्थ के कारण, और न ही प्रतिष्ठा के कारण बुलाए गए। यह बुलाहट संसार की सोच को उलट देती है, क्योंकि परमेश्वर अक्सर उन्हें चुनता है जिन्हें संसार महत्वहीन समझता है, ताकि उसकी महिमा प्रकट हो। इस वाक्य में एक प्रकार की नम्रता की शिक्षा भी छिपी है। जब विश्वासी अपने बुलाए जाने पर विचार करता है, तो उसके भीतर घमंड के लिए स्थान नहीं बचता। वह यह समझने लगता है कि उसका विश्वास और स्थान किसी व्यक्तिगत उपलब्धि का फल नहीं, बल्कि परमेश्वर की दया का परिणाम है। इससे कलीसिया में समानता और एकता की भावना जन्म लेती है, क्योंकि सभी एक ही कृपा से बुलाए गए हैं। साथ ही यह वाक्य उत्तरदायित्व भी सौंपता है। बुलाहट केवल सम्मान नहीं, बल्कि एक उद्देश्य है। परमेश्वर ने जिस स्थिति से बुलाया, उसी में रहते हुए उसके नाम को महिमा देने के लिए बुलाया। इसलिए यह वचन विश्वासियों को स्मरण दिलाता है कि वे कौन हैं, कैसे बुलाए गए, और किसके लिए बुलाए गए हैं।
कि न शरीर के अनुसार बहुत ज्ञानवान, और न बहुत सामर्थी, और न बहुत कुलीन बुलाए गए - यह वाक्य प्रेरित पौलुस की उस गहरी आत्मिक शिक्षा को प्रकट करता है जिसमें वह कलीसिया को उनके बुलाए जाने की प्रकृति समझा रहा है। यहाँ “शरीर के अनुसार” कहना विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह मनुष्य के उन सभी बाहरी और सांसारिक मापदंडों की ओर संकेत करता है जिनके द्वारा संसार किसी व्यक्ति का मूल्य आँकता है। ज्ञान, सामर्थ और कुलीनता, ये तीनों ही संसार की दृष्टि में प्रतिष्ठा और श्रेष्ठता के प्रतीक माने जाते थे, विशेषकर कुरिन्थ जैसे नगर में, जहाँ दर्शन, वाक्पटुता, सामाजिक हैसियत और शक्ति को बहुत महत्व दिया जाता था।
“बहुत ज्ञानवान” न बुलाए जाने का अर्थ यह नहीं है कि परमेश्वर ज्ञान का विरोध करता है, बल्कि विद्वानों के अनुसार पौलुस यह स्पष्ट कर रहा है कि उद्धार और बुलाहट मानवीय बुद्धि की उपलब्धि नहीं है। यह संसार अपने तर्क और दर्शन के द्वारा परमेश्वर को समझना चाहता है, परंतु परमेश्वर ने जानबूझकर अपनी योजना को ऐसी रीति से प्रकट किया कि मानवीय घमंड टूट जाए। इसलिए अधिकांश बुलाए गए लोग ऐसे नहीं थे जिनकी पहचान उनकी बौद्धिक श्रेष्ठता से होती हो, ताकि यह स्पष्ट हो जाए कि विश्वास ज्ञान का परिणाम नहीं, बल्कि अनुग्रह का फल है।
“न बहुत सामर्थी” शब्द के द्वारा पौलुस राजनीतिक, सैन्य और सामाजिक शक्ति की ओर संकेत करता है। विद्वानों बताते हैं कि परमेश्वर ने अपने राज्य को स्थापित करने के लिए संसार के प्रभावशाली और शक्तिशाली लोगों पर निर्भर रहना आवश्यक नहीं समझा। इसके विपरीत, उसने निर्बल दिखाई देने वालों को चुना, ताकि यह प्रकट हो कि कार्य की सफलता मानवीय बल से नहीं, बल्कि परमेश्वर की सामर्थ से आती है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि विश्वासियों की स्थिरता और विजय उनकी अपनी शक्ति पर आधारित नहीं है।
न बहुत कुलीन” कहना उस सामाजिक व्यवस्था को चुनौती देता है जहाँ जन्म, वंश और वर्ग के आधार पर व्यक्ति का मूल्य तय होता था। विद्वानों के अनुसार, कुरिन्थ की कलीसिया में अधिकांश लोग साधारण पृष्ठभूमि से थे, और पौलुस उन्हें यह स्मरण दिला रहा है कि परमेश्वर की बुलाहट सामाजिक सीढ़ियों का अनुसरण नहीं करती। उसने जानबूझकर उन लोगों को चुना जिन्हें संसार तुच्छ समझता था, ताकि उसकी कृपा और महिमा और भी स्पष्ट रूप से प्रकट हो। इस प्रकार यह वाक्य विश्वासियों को नम्रता, कृतज्ञता और परमेश्वर पर पूर्ण निर्भरता की शिक्षा देता है। यह उन्हें यह समझाता है कि उनकी बुलाहट संसारिक योग्यताओं का परिणाम नहीं, बल्कि परमेश्वर की स्वतंत्र और उद्देश्यपूर्ण कृपा का कार्य है। (“स्वतंत्र” का अर्थ है कि परमेश्वर किसी दबाव, नियम या मानवीय मापदंड से बंधा हुआ नहीं है। वह जिसे चाहता है, जैसे चाहता है, और जिस समय चाहता है, बुलाता है। इसमें मनुष्य का दावा या अधिकार नहीं होता। “उद्देश्यपूर्ण” का अर्थ है कि यह चुनाव बिना कारण या बिना लक्ष्य के नहीं होता। परमेश्वर जब किसी को बुलाता है, तो उसके पीछे उसकी एक गहरी योजना होती है, जो कई कारणों के लिए हो सकती हे जैसे अपने नाम की महिमा प्रकट करना हो , मनुष्य के घमंड को तोड़ना हो, और यह दिखाना कि उद्धार पूरी तरह अनुग्रह से है, न कि कामों से। “कृपा का कार्य” यह बताता है कि यह सब कुछ परमेश्वर का उपहार है। यह कोई वेतन नहीं है जो मनुष्य ने कमाया हो। यदि परमेश्वर कमजोर, साधारण और तुच्छ समझे जाने वालों को बुलाता है, तो इसलिए कि यह स्पष्ट हो जाए कि सामर्थ मनुष्य से नहीं, बल्कि उससे आती है।)
1 कुरिन्थियों 1:26 - धार्मिक संदेश
१ कुरिन्थियों १:२६ का गहरा सत्य हमें एक ऐसे धरातल पर खड़ा करता है जहाँ सांसारिक मापदंड पूरी तरह विफल हो जाते हैं। जब हम अपने चारों ओर देखते हैं, तो पाते हैं कि ईश्वरीय चयन की प्रक्रिया मानवीय तर्कसंगतता से कोसों दूर है। संसार जिसे प्रभावहीन समझकर त्याग देता है, सृष्टि का रचयिता उसी को अपने महान उद्देश्यों के लिए चुनता है। यह विचार हमें अहंकार से मुक्त कर उस अनुग्रह की ओर ले जाता है जो केवल नम्रता की मिट्टी में पनपता है। बुद्धिजीवियों की सभाओं में जो स्थान नहीं पा सके, या जिन्हें समाज की ऊँची कुर्सियों पर बैठने का अवसर नहीं मिला, वे ही अक्सर परमेश्वर की योजना के केंद्र में होते हैं। इस रहस्य को समझना ही आत्मिक परिपक्वता की पहली सीढ़ी है कि हमारी योग्यता हमारी अपनी क्षमताओं में नहीं, बल्कि हमारी निर्भरता में निहित है।
बाइबल के पन्नों को पलटते ही हमें मूसा का व्यक्तित्व दिखाई देता है, जो अपनी जुबान की हकलाहट के कारण खुद को अयोग्य मान रहा था। वह मिस्र के वैभव से भागा हुआ एक चरवाहा मात्र था, लेकिन वही व्यक्ति एक विशाल राष्ट्र की मुक्ति का माध्यम बना। यहाँ स्पष्ट होता है कि परमेश्वर ने मिस्र के बड़े विद्वानों या सेनापतियों को नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति को चुना जिसके पास अपनी कोई शक्ति नहीं बची थी। इसी तरह, जब हम गिदोन के जीवन पर विचार करते हैं, तो वह खुद को अपने कुल में सबसे छोटा और सबसे कमजोर मानता था। लेकिन उसकी यही कमजोरी वह शून्य बनी जिसमें परमेश्वर ने अपनी अनंत सामर्थ्य भर दी। यह उदाहरण हमें सिखाते हैं कि जब हम अपनी सीमाओं को स्वीकार करते हैं, तभी हम ईश्वरीय असीमितता के लिए द्वार खोलते हैं।
प्रकृति के विशाल साम्राज्य में भी यही सिद्धांत गूंजता है। एक नन्हे से बीज को देखिए, जो मिट्टी के नीचे दबकर अपनी पहचान खो देता है। बाहर से देखने पर वह निर्जीव और अत्यंत छोटा प्रतीत होता है, लेकिन उसी क्षुद्र रूप के भीतर एक विशाल वटवृक्ष बनने की क्षमता छिपी होती है। यदि वह बीज अपनी कठोरता और आकार पर घमंड करता, तो शायद कभी अंकुरित न हो पाता। इसी तरह, रात के घने अंधकार में चमकने वाले जुगनू अपनी छोटी सी रोशनी से यह सिद्ध कर देते हैं कि चमकने के लिए सूर्य जैसा बड़ा होना अनिवार्य नहीं है। ब्रह्मांड की विशालता में पृथ्वी एक धूल के कण के समान है, फिर भी जीवन का स्पंदन और ईश्वर का प्रेम इसी छोटे से ग्रह पर सबसे सघन रूप में अनुभव किया जाता है। यह विशालता और सूक्ष्मता का संतुलन ही ईश्वरीय बुद्धिमानी का प्रमाण है।
इतिहास के गलियारों में भी ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिन्होंने दुनिया की नजरों में अयोग्य होने के बावजूद युगान्तरकारी परिवर्तन किए। उन व्यक्तियों ने कभी अपनी पृष्ठभूमि की सीमाओं को अपने मार्ग की बाधा नहीं बनने दिया। उनकी सफलता का राज उनके भीतर की वह ज्योति थी जिसे संसार की हवाएं बुझा नहीं सकीं क्योंकि वह ज्योति किसी मानवीय तेल से नहीं, बल्कि ईश्वरीय प्रेरणा से जल रही थी। जब लोग उन्हें नकार रहे थे, तब वे अपने भीतर की उस बुलाहट को सुन रहे थे जो उन्हें साधारण से असाधारण की ओर ले जा रही थी। संसार के पैमाने अक्सर बाहरी चमक-धमक और तात्कालिक उपलब्धियों को मापते हैं, जबकि ईश्वरीय पैमाना हृदय की सच्चाई और अटूट विश्वास को देखता है।
दाऊद के जीवन का प्रसंग इस सत्य को और भी अधिक स्पष्ट करता है। जब शमूएल नबी राजा का अभिषेक करने गया, तो उसने दाऊद के बड़े और बलिष्ठ भाइयों को देखा, जो दिखने में राजा बनने के सर्वथा योग्य थे। परंतु परमेश्वर ने उन सबको दरकिनार कर उस छोटे लड़के को चुना जो भेड़ें चरा रहा था। यह घटना प्रमाणित करती है कि मनुष्य केवल बाहरी रूप देखता है, पर परमेश्वर मन को जांचता है। दाऊद की बुलाहट इस बात का जीवंत प्रमाण है कि परमेश्वर को प्रभावित करने के लिए शारीरिक कद या सामाजिक प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती। वह तो बस एक ऐसा हृदय खोजता है जो पूरी तरह उसकी इच्छा के प्रति समर्पित हो।
सृष्टि के रहस्यों पर गौर करें तो पाएंगे कि आकाशगंगाओं के फैलाव में जो आकर्षण है, वही आकर्षण परमाणु के सूक्ष्म संसार में भी विद्यमान है। एक परमाणु के भीतर छिपी ऊर्जा पूरे शहर को प्रकाशित कर सकती है। इसी प्रकार, एक साधारण मनुष्य के भीतर छिपी ईश्वरीय आत्मा उसे वह सामर्थ्य प्रदान करती है जो बड़े-बड़े साम्राज्यों को हिला सकती है। हम अक्सर अपनी कमियों को अपनी कमजोरी मान लेते हैं, जबकि वे वास्तव में वे दरारें होती हैं जिनसे होकर ईश्वरीय प्रकाश हमारे भीतर प्रवेश करता है। यदि हम पूरी तरह पूर्ण और आत्मनिर्भर होते, तो शायद हमें कभी उस ऊंचे स्रोत की आवश्यकता ही महसूस नहीं होती। इस संदेश का मर्म यही है कि हम अपनी बुलाहट को पहचानें। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमें इसलिए नहीं चुना गया कि हम बहुत ज्ञानी या बलवान थे, बल्कि इसलिए चुना गया ताकि हम परमेश्वर की महिमा का दर्पण बन सकें। जब एक मिट्टी का दीया जलता है, तो प्रशंसा दीये की नहीं बल्कि उस अग्नि की होती है जो अंधकार को मिटाती है। हमारा जीवन भी उसी दीये के समान है। हमारी निर्बलता ही वह मंच है जहाँ परमेश्वर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करता है। इस सत्य को आत्मसात करने के बाद, हमारे भीतर का सारा गर्व समाप्त हो जाता है और हम कृतज्ञता से भर जाते हैं।
अंततः, यह बुलाहट एक निमंत्रण है सब साधारण लोगों के माध्यम से असाधारण कार्य करने का। चाहे वह मछुआरे पतरस की बात हो या सताने वाले शाऊल की, परमेश्वर ने हमेशा उन्हें ही रूपांतरित किया जिन्हें समाज ने हाशिए पर रखा था। आज भी वह उन्हीं हृदयों की तलाश में है जो अपनी शून्यता को स्वीकार कर उसकी पूर्णता से भरना चाहते हैं। यह विश्वास का वह मार्ग है जहाँ पाँव की लड़खड़ाहट को भी अनुग्रह का सहारा मिलता है। जब हम इस दृष्टिकोण से अपने जीवन को देखते हैं, तो हर चुनौती एक अवसर बन जाती है और हर कमजोरी एक गवाही।
1 कुरिन्थियों 1:26 - जीवन में प्रयोग
1 कुरिन्थियों 1:26 - जीवन में लागू करना
इस वचन को अपने जीवन में उतारने का सबसे सरल और व्यावहारिक तरीका यह है कि हम अपने आप को संसार की सोच से देखना छोड़ दें। अक्सर हम अपनी कमियों, साधनों की कमी या अपनी साधारण पृष्ठभूमि के कारण खुद को छोटा और अयोग्य मान लेते हैं। ऐसी सोच हमें भीतर से कमजोर कर देती है। लेकिन परमेश्वर की दृष्टि हमें यह सिखाती है कि हमारी कमजोरी ही वह जगह है जहाँ उसकी सामर्थ्य सबसे साफ़ दिखाई देती है। जब हम यह मान लेते हैं कि हम अपनी ताकत से सब कुछ नहीं कर सकते और अपने घमंड को छोड़ देते हैं, तब हम उस असीम स्रोत से जुड़ जाते हैं जो हमें हमारी सोच से भी आगे बढ़ने की सामर्थ्य देता है।
बाइबल में गिदोन का जीवन इस सत्य को बहुत सरलता से समझाता है। जब स्वर्गदूत ने उसे वीर योद्धा कहकर पुकारा, तब वह भय के कारण छिपकर गेहूँ साफ़ कर रहा था और स्वयं को अपने परिवार में सबसे तुच्छ समझता था। वह अपने आप में किसी बड़ी जिम्मेदारी के योग्य नहीं मानता था। फिर भी परमेश्वर ने उसकी उसी नम्रता और स्वयं को छोटा समझने वाली स्थिति में उसे चुना। गिदोन की सामर्थ्य उसकी आत्म-विश्वास से नहीं, बल्कि परमेश्वर पर निर्भरता से आई।
आज भी जब हम अपने जीवन में छिपे हुए डर, असुरक्षा और कमजोरी के स्थानों में खड़े होते हैं, तब हमें यह याद रखने की ज़रूरत है कि परमेश्वर हमें हमारी नज़र से नहीं देखता। वह हमारे भीतर उस संभावना को देखता है जिसे केवल उसका अनुग्रह ही प्रकट कर सकता है। जब हम उस भरोसे के साथ आगे बढ़ते हैं, तब वही साधारण जीवन परमेश्वर के हाथों में असाधारण बन जाता है।
1 कुरिन्थियों 1:26 - प्रार्थना
हे स्वर्गीय पिता,
मैं इस नई सुबह के लिए तेरा धन्यवाद करता हूँ। क्योंकि मैं जानता हूँ कि यह जीवन, यह श्वास, यह प्रकाश और यह अवसर जो आज मुझे फिर मिला है वो तेरी ही अनुग्रहपूर्ण भेंट है। आज ये जो मेरी आँखें खुलीं है यह मेरी अपनी सामर्थ्य या योग्यता के कारण नहीं, बल्कि तेरी कृपा के कारण खोली है और एक और दिन मैंने पपने जीवन में पाया है। पिता मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ कि तू हर सुबह मुझे यह स्मरण कराता है कि मेरा जीवन तेरे हाथों में सुरक्षित है, चाहे संसार की दृष्टि में मैं कितना ही साधारण या अयोग्य क्यों न होऊँ।
पिता, आज मैं स्वयं को तेरे सामने लाता हूँ। मैं जानता हूँ कि कई बार मैं अपने आप को दूसरों से तुलना करता हूँ और अपनी कमज़ोरियों, सीमाओं और अभावों को देखकर निराश हो जाता हूँ। मैं मान लेता हूँ कि मेरे पास न पर्याप्त ज्ञान है, न सामर्थ्य और न ही कोई विशेष पहचान। पर आज मैं तेरे वचन के प्रकाश में यह स्वीकार करता हूँ कि तू संसार की बुद्धि और बल के अनुसार नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्र और उद्देश्यपूर्ण कृपा के अनुसार बुलाता और चुनता है। संसार कि तरह तू मेरी निर्बलता को अस्वीकार नहीं करता, परन्तु उसी के द्वारा अपना कार्य प्रकट करता है। मुझे नम्र हृदय दे कि मैं अपने अहंकार को छोड़कर तेरे अनुग्रह पर निर्भर रह सकूँ। पिता, मेरी दृष्टि को बदल दे।ताकि मैं अपनी पहचान संसार की स्वीकृति, सफलता या मान-सम्मान में न खोजूँ, बल्कि उस बुलाहट में खोजूँ जो तूने मुझे दी है। जब मैं स्वयं को छोटा, अयोग्य या महत्वहीन समझूँ, तब मुझे यह स्मरण कराना कि तेरी दृष्टि में मैं चुना हुआ एक प्रिय पात्र हूँ। मेरे भीतर ऐसा विश्वास उत्पन्न कर कि मैं अपनी कमज़ोरियों से भागूँ नहीं, परन्तु उन्हें तेरे हाथों में सौंप दूँ, ताकि तू उनमें अपनी सामर्थ्य प्रकट कर सके।
अब, हे पिता , मैं अपने परिवार और अपने प्रियजनों को तेरे चरणों में सौंपता हूँ। उनके स्वास्थ्य, सुरक्षा और मानसिक शांति के लिए प्रार्थना करता हूँ। संसार की चिंताओं, रोगों और अनिश्चितताओं के बीच तू उन्हें अपनी शांति से भर दे। यदि वे भी कभी अपने आप को कमजोर या अयोग्य महसूस करें, तो उन्हें भी यह अनुभव करा कि तू उन्हें उनकी योग्यताओं के कारण नहीं, बल्कि अपने प्रेम के कारण थामे हुए है। वहीँ है पिता हमारे घरों में नम्रता, विश्वास और तेरे वचन पर आधारित जीवन बना रहे इसके लिए हमें थामे रह।
अंत में, पिता, मैं तुझे धन्यवाद देता हूँ कि तू ऐसे लोगों को चुनता है जिन्हें संसार तुच्छ समझता है। मेरे जीवन को ऐसा बना कि वह तेरे अनुग्रह की गवाही दे। मैं अपने बल पर नहीं, बल्कि तेरी सामर्थ्य में चलूँ। यह प्रार्थना मैं पूरे भरोसे और कृतज्ञता के साथ तेरे चरणों में येशु के नाम में अर्पित करता हूँ। आमीन ।

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