अभिवादन और प्रस्तुति
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शीर्षक : परमेश्वर का निष्पक्ष न्याय
पुस्तक : रोमियो
लेखक : प्रेरित पौलूस
अध्याय : 2
वचन : 12
इसलिये कि जिन्हों ने बिना व्यवस्था पाए पाप किया, वे बिना व्यवस्था के नाश भी होंगे, और जिन्हों ने व्यवस्था पाकर पाप किया, उन का दण्ड व्यवस्था के अनुसार होगा। रोमियो 2:12
रोमियों 2:12 - संदर्भ
रोमियों 2:12 का संदर्भ समझने के लिए हमें उस समय के रोम के धार्मिक और सामाजिक वातावरण को ध्यान से देखना होगा। प्रेरित पौलुस ने यह पत्र रोम की कलीसिया को उस समय लिखा था, जब वहां यहूदी और गैर-यहूदी विश्वासियों के बीच एक गहरा वैचारिक और आध्यात्मिक तनाव था।
रोम की कलीसिया अन्य कलीसियाओं से इस अर्थ में भिन्न थी कि इसमें यहूदी और गैर-यहूदी दोनों समुदाय शामिल थे। यहूदी विश्वासियों के पास मूसा की व्यवस्था और पुराने नियम की विरासत थी। वे स्वयं को परमेश्वर की चुनी हुई प्रजा मानते थे और अपने गौरव का आधार व्यवस्था के पालन में रखते थे। दूसरी ओर, गैर-यहूदी विश्वासियों के पास ऐसी कोई लिखित व्यवस्था नहीं थी, लेकिन वे मसीह के अनुग्रह द्वारा कलीसिया के हिस्से बने थे। इन दोनों समूहों के बीच बहस रहती थी कि धार्मिक श्रेष्ठता और न्याय का मापदंड क्या है।
उस समय के यहूदी समाज में यह धारणा प्रबल थी कि उनके पास व्यवस्था होने के कारण वे अन्यजातियों की तुलना में सुरक्षित हैं। केवल व्यवस्था का होना ही उनके उद्धार के लिए पर्याप्त है, ऐसा उनके मन में था। पौलुस इस सोच को चुनौती दे रहे थे। वह यह स्पष्ट कर रहे थे कि परमेश्वर किसी का पक्षपात नहीं करता; न्याय का आधार विशेषाधिकार नहीं बल्कि वास्तविक आचरण और जिम्मेदारी है।
रोमियों 1:18 से 2:11 तक के प्रवाह को देखें तो पौलुस पहले अन्यजातियों के पाप और नैतिक पतन का वर्णन करते हैं। यहूदियों के लिए यह संतोषजनक प्रतीत होता क्योंकि उन्हें लगता था कि वे दूसरों से श्रेष्ठ हैं। लेकिन 2:12 में पौलुस ने यहूदियों की ओर दृष्टि मोड़कर कहा कि वे भी वैसा ही करते हैं। वह यह स्थापित करते हैं कि परमेश्वर के यहाँ किसी का पक्षपात नहीं।
इस वचन का तत्काल उद्देश्य यह बताना है कि परमेश्वर का न्याय केवल ज्ञान या विशेष अधिकार पर आधारित नहीं है, बल्कि उपलब्ध प्रकाश और सत्य के अनुसार उत्तरदायित्व पर आधारित है। चाहे किसी के पास लिखित शास्त्र (मूसा की व्यवस्था) हो या न हो, पाप का परिणाम और न्याय की प्रक्रिया परमेश्वर की पवित्रता के अनुसार होगी।
अंततः, पौलुस यहूदियों के झूठे धार्मिक अहंकार को तोड़ते हैं और गैर-यहूदियों को यह समझाते हैं कि वे भी परमेश्वर के प्रति जिम्मेदार हैं। यह वचन एक पुल की तरह काम करता है, जो यह दिखाता है कि सभी जो व्यवस्था पाए है और जो बिना व्यवस्था पाए है, परमेश्वर के न्याय के सामने समान रूप से उत्तरदायी हैं।
रोमियों 2:12 - टिप्पणी
इसलिये कि जिन्हों ने बिना व्यवस्था पाए पाप किया - यह वाक्य इस बात की नींव रखता है कि परमेश्वर का न्याय किसी विशेष जाति, वर्ग या विशेष अधिकार पर आधारित नहीं है, बल्कि मनुष्य के वास्तविक आचरण पर आधारित है। यहाँ “इसलिये कि” शब्द पिछले कथन से जुड़कर यह स्पष्ट करता है कि परमेश्वर के पक्षपात न करने का ठोस कारण क्या है। वह किसी को केवल इस आधार पर नहीं परखता कि उसके पास व्यवस्था थी या नहीं, बल्कि इस आधार पर कि उसने जो प्रकाश उसे मिला था, उसके अनुसार उसने कैसे जीवन बिताया। “जिन्होंने बिना व्यवस्था पाए पाप किया” से अभिप्राय उन लोगों से है जिनके पास परमेश्वर की कोई स्पष्ट, लिखी हुई व्यवस्था नहीं थी। यहाँ “व्यवस्था” का अर्थ मूसा की लिखी हुई व्यवस्था से है, न कि इस बात से कि वे हर प्रकार की व्यवस्था से बिल्कुल खाली थे। वे न तो नैतिक समझ से रहित थे और न ही पूरी तरह अज्ञान में थे। उनके भीतर प्रकृति की दी हुई समझ थी, उनके मन में सही और गलत का बोध था, और उनकी अंतरात्मा उन्हें किसी न किसी रूप में चेतावनी देती थी। फिर भी उन्होंने उस अंदर की रोशनी के विरुद्ध पाप किया।
यह पाप किसी बाहरी नियम की अवहेलना भर नहीं था, बल्कि उस नैतिक सच्चाई का विरोध था जो उनके हृदय में अंकित थी। इस प्रकार उनका पाप जानबूझकर था, क्योंकि उन्होंने उस सीमा को लाँघा जिसे वे भीतर से पहचानते थे। यहाँ पाप का अर्थ केवल कुछ बुरे काम कर लेना नहीं है, बल्कि उस रास्ते को चुनना है जो परमेश्वर की भलाई और इच्छा के विपरीत था, चाहे वह इच्छा उन्हें लिखे हुए नियमों के रूप में न मिली हो। इस वाक्य में “पाप किया” को भूतकाल में रखा गया है, जो इस बात की ओर संकेत करता है कि यह कथन न्याय के समय की दृष्टि से बोला गया है, जहाँ मनुष्य का पूरा जीवन एक बीते हुए तथ्य के रूप में सामने होगा। वहाँ यह नहीं देखा जाएगा कि उसने कितना जाना था, बल्कि यह कि जो थोड़ा-बहुत वह जानता था, उसके साथ उसने क्या किया।
वे बिना व्यवस्था के नाश भी होंगे - यह वाक्य पहले कथन का सीधा और गंभीर परिणाम बताता है। यहाँ “नाश होंगे” कोई हल्का या अस्थायी भाव नहीं रखता, बल्कि यह उस अंतिम स्थिति की ओर संकेत करता है जिसमें मनुष्य अपने पापों के कारण जीवन से अलग कर दिया जाता है। यह शब्द अस्तित्व के पूरी तरह मिट जाने का अर्थ नहीं देता, बल्कि जीवन की उस धन्य अवस्था से वंचित हो जाने का अर्थ रखता है, जिसके लिए मनुष्य बनाया गया था। यह एक ऐसी हानि है जो अवस्था और भविष्य दोनों से जुड़ी हुई है। “बिना व्यवस्था के” फिर से इस बात को स्पष्ट करता है कि उनका नाश किसी ऐसी व्यवस्था के आधार पर नहीं होगा जो उन्हें कभी दी ही नहीं गई थी। परमेश्वर उनसे उस लिखी हुई व्यवस्था का हिसाब नहीं माँगेगा जिसे उन्होंने जाना ही नहीं। उनका दोष और उनका नाश उस मापदंड पर तय होगा जो वास्तव में उनके पास था, यानी वह नैतिक समझ और अंतरात्मा की गवाही, जो उनके भीतर कार्य करती रही। इसलिए यह नाश मनमाना या अन्यायपूर्ण नहीं है, बल्कि पूरी तरह न्याय के अनुसार है।
यह बात किसी प्रकार की नरमी या छूट नहीं दिखाती, बल्कि उलटे यह स्पष्ट करती है कि व्यवस्था का न होना दंड से बचने का आधार नहीं बनता। जो लोग यह सोच सकते हैं कि लिखी हुई व्यवस्था न मिलने के कारण वे उत्तरदायित्व से मुक्त हो जाएँगे, यह वाक्य उस सोच को पूरी तरह समाप्त कर देता है। उनका नाश इस कारण होगा कि उन्होंने पाप किया, न कि इस कारण कि उनके पास व्यवस्था नहीं थी। इस वाक्य में “भी” शब्द विशेष महत्व रखता है। यह दिखाता है कि जैसे उन्होंने बिना व्यवस्था के पाप किया, वैसे ही परिणाम भी उसी स्थिति में आएगा। पाप और नाश यहाँ एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इससे यह सच्चाई सामने आती है कि परमेश्वर का न्याय सबके लिए समान है, जहां कोई भी व्यक्ति केवल अज्ञान के सहारे अपने पापों के परिणाम से बच नहीं सकता।
और जिन्हों ने व्यवस्था पाकर पाप किया - यह वाक्य अब मामले के दूसरे पक्ष की ओर ध्यान ले जाता है और उन लोगों की स्थिति को सामने रखता है जिन्हें परमेश्वर की प्रकट की हुई व्यवस्था मिली थी। यहाँ “व्यवस्था पाकर” का अर्थ केवल व्यवस्था का होना या उसका बाहरी रूप से मालिक होना नहीं है, बल्कि उसके भीतर रहना, उसके प्रकाश में जीना, और उसे जीवन का मापदंड मानना है। यह उन लोगों की ओर संकेत करता है जिनके पास परमेश्वर की इच्छा लिखे हुए रूप में मौजूद थी, और जो जानते थे कि उनसे क्या अपेक्षा की जाती है। यह वाक्य इस भ्रम को तोड़ता है कि व्यवस्था का होना अपने आप में किसी प्रकार की सुरक्षा या विशेष अधिकार देता है। जिनके पास व्यवस्था थी, उन्होंने अधिक प्रकाश पाया था, अधिक स्पष्ट निर्देश पाए थे, और इसलिए उनसे अधिक जिम्मेदारी भी अपेक्षित थी। “पाप किया” यहाँ इस बात को दिखाता है कि उन्होंने न केवल सामान्य नैतिक समझ के विरुद्ध, बल्कि जानबूझकर उस प्रकट की हुई इच्छा के विरुद्ध कदम उठाया जिसे वे पहचानते थे। उनका पाप अधिक ज्ञान के बावजूद किया गया पाप था।
इस वाक्य में यह भी निहित है कि व्यवस्था को सुनना, जानना या उस पर गर्व करना पाप से मुक्त नहीं करता। व्यवस्था का होना तभी लाभदायक होता है जब वह जीवन में उतारी जाए। यदि वही व्यवस्था, जो सही मार्ग दिखाने के लिए दी गई थी, अनदेखी कर दी जाए, तो वही व्यक्ति के दोष को और गहरा कर देती है। क्योंकि जहाँ प्रकाश अधिक होता है, वहाँ अंधकार को चुनना और भी गंभीर हो जाता है। यहाँ लेखक जानबूझकर किसी दंड या परिणाम की बात अभी नहीं करता, बल्कि केवल स्थिति को स्पष्ट करता है। वह यह दिखाना चाहता है कि जिन लोगों ने व्यवस्था पाकर भी पाप किया, वे किसी भी तरह से पहले समूह से बेहतर नहीं ठहरते। बल्कि उनके पाप का स्वरूप और भी अधिक गंभीर बन जाता है, क्योंकि उन्होंने जानते-बूझते हुए अवज्ञा का मार्ग चुना।
उन का दण्ड व्यवस्था के अनुसार होगा - यह वाक्य अब स्पष्ट रूप से उन लोगों के विषय में निष्कर्ष प्रस्तुत करता है जिन्हें व्यवस्था मिली थी अर्थात ऐतिहासिक रूप से यहूदी, और सिद्धांत रूप में वे सब जिन्हें परमेश्वर की प्रकट की हुई इच्छा का विशेष ज्ञान दिया गया। यहाँ “दण्ड” का अर्थ केवल जाँच या पूछताछ भर नहीं है, बल्कि उस न्यायिक निर्णय से है जिसमें दोष सिद्ध होने पर उचित परिणाम सुनाया जाता है। यह निर्णय हल्का नहीं है, बल्कि पूरी गंभीरता के साथ दिया जाने वाला अंतिम फैसला है। “व्यवस्था के अनुसार” इस बात को प्रकट करता है कि वही व्यवस्था, जिसे वे अपने विशेष अधिकार और गौरव का कारण मानते थे, वही अब उनके लिए न्याय का मापदंड बन जाएगी। यह दण्ड किसी मनमाने सिद्धांत से नहीं होगा, बल्कि उसी स्पष्ट प्रकाश के आधार पर होगा जो उन्हें दिया गया था। व्यवस्था यहाँ बाहरी प्रमाण के रूप में खड़ी होगी, और उसी के शब्द उनके विरुद्ध गवाही देंगे।
इस वाक्य में यह भी निहित है कि व्यवस्था का होना दण्ड से बचाव नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व की वृद्धि है। जिन लोगों को अधिक दिया गया, उनसे अधिक माँगा जाएगा। व्यवस्था ने उनसे पूर्ण आज्ञाकारिता की माँग की थी जो आधे मन से पालन या चयनित आज्ञाकारिता को वह स्वीकार नहीं करती। इसलिए जो लोग व्यवस्था को सुनते तो थे, पर जीवन में उसे पूरा नहीं करते थे, उनके लिए वही व्यवस्था दोष सिद्ध करने का साधन बन जाती है। यह दण्ड इस बात के अनुसार होगा कि उन्होंने उस व्यवस्था के साथ क्या किया। केवल उसका ज्ञान, उसका पाठ, या उस पर गर्व करना किसी भी प्रकार से उन्हें निर्दोष नहीं ठहरा सकता। क्योंकि व्यवस्था का उद्देश्य मनुष्य को धर्मी ठहराना नहीं, बल्कि पाप को स्पष्ट करना था। इस प्रकार, जिन लोगों ने व्यवस्था पाकर भी पाप किया, उनके लिए वही व्यवस्था उनके दण्ड का आधार बनती है, और यह परमेश्वर के निष्पक्ष और पूर्ण न्याय को स्पष्ट रूप से प्रकट करता है।
रोमियों 2:12 - धार्मिक संदेश
यह वचन हमें परमेश्वर के न्याय की उस गहरी और गंभीर सच्चाई की ओर ले जाता है जहाँ मनुष्य की पहचान, उसका धार्मिक लेबल, या उसका विशेषाधिकार नहीं, बल्कि उसका जीवन और उसके काम सामने रखे जाते हैं। परमेश्वर का न्याय किसी एक वर्ग के लिए अलग और दूसरे के लिए अलग नहीं है। वह न तो अज्ञान को बहाना मानता है और न ही ज्ञान को ढाल बनने देता है। यह वचन हमें यह समझाने के लिए है कि मनुष्य जहाँ भी खड़ा है, जिस भी प्रकाश में जी रहा है, उसी प्रकाश के अनुसार वह उत्तरदायी है।
हम संसार को देखें तो पाते हैं कि परमेश्वर ने किसी को पूरी तरह अंधकार में नहीं छोड़ा। जिन्होंने लिखी हुई व्यवस्था नहीं पाई, उन्हें भी विवेक दिया गया है। उनके भीतर सही और गलत की एक आवाज़ रखी गई है। जब कोई व्यक्ति सत्य, न्याय और भलाई को जान-बूझकर कुचलता है, तो वह केवल समाज के नियमों को नहीं, बल्कि अपने भीतर की उस आवाज़ को भी दबाता है जिसे परमेश्वर ने स्वयं रखा है। नूह के दिनों में संसार के लोगों के पास मूसा की व्यवस्था नहीं थी, फिर भी उनकी हिंसा, दुष्टता और हठ ने उन्हें दोषी ठहराया। जलप्रलय इस बात का चिन्ह था कि परमेश्वर अज्ञान के नाम पर पाप को नज़रअंदाज़ नहीं करता।
दूसरी ओर, जिन्हें परमेश्वर का विशेष प्रकाश मिला था, जिनके पास उसकी व्यवस्था थी, उनका उत्तरदायित्व और भी बढ़ गया। इस्राएल इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है। उन्हें व्यवस्था दी गई, भविष्यद्वक्ता भेजे गए, चेतावनियाँ दी गईं, और बार-बार लौट आने का अवसर भी दिया गया था। फिर भी जब उन्होंने व्यवस्था को केवल सुनने, पढ़ने और उस पर गर्व करने तक सीमित रखा, और जीवन में उसे नहीं उतारा, तो वही व्यवस्था उनके विरुद्ध गवाही देने लगी। यशायाह, यिर्मयाह और यहेजकेल के द्वारा परमेश्वर ने स्पष्ट किया कि बलिदान, पर्व और धार्मिक भाषा तब तक व्यर्थ हैं, जब तक हृदय और जीवन में आज्ञाकारिता न हो।
यह वचन हमें यह भी सिखाता है कि परमेश्वर का न्याय मनमाना नहीं है। वह किसी को उस बात के लिए दोषी नहीं ठहराता जिसका ज्ञान उसे कभी मिला ही नहीं। लेकिन वह यह भी स्पष्ट करता है कि जो प्रकाश मिला है, उसी के अनुसार जीवन न जीना अपराध है। जैसे खेत में बोया गया बीज उसी भूमि की दशा के अनुसार फल देता है, वैसे ही मनुष्य का जीवन उस प्रकाश के अनुसार फल देता है जो उसे मिला है। सूर्य एक ही है, पर उसकी रोशनी में कुछ पौधे फल लाते हैं और कुछ सूख जाते हैं। दोष सूर्य में नहीं, बल्कि पौधे की प्रतिक्रिया में होता है।
बाइबल में राजा दाऊद का जीवन हमें यह दिखाता है कि ज्ञान और निकटता होने के बाद भी गिरावट संभव है, और उत्तरदायित्व भी अधिक होता है। दाऊद परमेश्वर की व्यवस्था जानता था, उसके गीत गाता था, पर जब उसने जान-बूझकर पाप किया, तो उसका परिणाम भी गहरा और पीड़ादायक हुआ। नातान नबी ने उसे यह नहीं कहा कि “तू राजा है, तुझे छूट है,” बल्कि स्पष्ट कहा कि तूने परमेश्वर के वचन को तुच्छ जाना है। यह हमें सिखाता है कि ऊँचा पद, गहरी समझ या धार्मिक पहचान किसी को न्याय से ऊपर नहीं उठाती।
यह वचन आज के विश्वासियों के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उस वक्त था। हमारे पास बाइबल है, शिक्षाएँ हैं, संदेश हैं, सभाएँ हैं। यह सब वरदान हैं, लेकिन ये सब उत्तरदायित्व भी हैं। यदि हमारा जीवन इन सच्चाइयों के अनुसार नहीं बदलता, तो वही ज्ञान हमारे विरुद्ध खड़ा हो सकता है। येशु ने स्वयं कहा था कि जिन नगरों में अधिक चमत्कार हुए, यदि वे न फिरें, तो उनका दण्ड और भी कठोर होगा। यह बात हमें डराने के लिए नहीं, बल्कि हमें जागृत करने के लिए कही गई है।
प्रकृति भी इस सत्य को सरल रूप में समझाती है। नदी यदि अपने मार्ग में मिले जल को रोक ले, तो वह सड़ने लगती है। जो कुछ उसे दिया गया है, यदि वह उसे बहने न दे, तो वही जल उसके लिए विनाश का कारण बन जाता है। उसी प्रकार आत्मिक जीवन में भी जो प्रकाश हमें मिला है, यदि वह केवल हमारे भीतर रुका रहे और आज्ञाकारिता के रूप में बाहर न आए, तो वही प्रकाश हमें दोषी ठहराने लगता है। यह वचन हमें आत्म-परीक्षण के लिए बुलाता है। प्रश्न यह नहीं है कि हमारे पास क्या है, बल्कि यह है कि हम उसके साथ क्या कर रहे हैं। क्या हमारा विवेक हमें सही मार्ग पर चला रहा है? क्या जो वचन हम जानते हैं, वह हमारे व्यवहार में दिखाई देता है? क्या हमारी धार्मिकता केवल शब्दों में है, या जीवन में भी?
अंत में, यह वचन हमें परमेश्वर की निष्पक्षता और पवित्रता की ओर ले जाता है। वह किसी का पक्षपात नहीं करता, पर वह किसी के पाप को भी हल्का नहीं मानता। यही न्याय हमें भयभीत भी करता है और आश्वस्त भी। भयभीत इसलिए कि कोई भी अपने आप को सुरक्षित मानकर लापरवाह न हो जाए, और आश्वस्त इसलिए कि परमेश्वर का न्याय सच्चा, सही और प्रेम से भरा है। जो भी मनुष्य जिस प्रकाश में चलता है, यदि वह नम्रता से सत्य को अपनाता है, तो वही परमेश्वर जो न्यायी है, उद्धारकर्ता भी है। यही इस वचन का गहरा संदेश है तो जागो, समझो, और उस प्रकाश में चलो जो तुम्हें दिया गया है।
रोमियों 2:12 - जीवन में प्रयोग
यह वचन हमारे दैनिक जीवन के लिए एक गहरा और व्यावहारिक संदेश रखता है। यह हमें अपने विश्वास, ज्ञान और आत्मिक स्थिति की ईमानदारी से जाँच करने के लिए बुलाता है। जीवन में हम अक्सर स्वयं की तुलना दूसरों से करके संतुष्ट हो जाते हैं, जैसे कि कोई कहता है कि मैं दूसरों से बेहतर हूँ, कोई यह सोचता है कि मुझे उतना ज्ञान नहीं मिला इसलिए मेरी ज़िम्मेदारी भी कम है। यह वचन दोनों ही सोच को चुनौती देता है और हमें यह सिखाता है कि परमेश्वर के सामने हर व्यक्ति अपने जीवन और अपने चुनावों के लिए स्वयं उत्तरदायी है।
यह वचन हमें सिखाता है कि हमें अपने विवेक की आवाज़ को हल्के में नहीं लेना चाहिए। जब हम जानते हैं कि कोई बात गलत है और फिर भी उसे करते हैं, तो हम स्वयं को दोषी ठहराते हैं। इसलिए जीवन के छोटे निर्णयों में भी सच्चाई, न्याय और प्रेम को चुनना अत्यंत आवश्यक है। जो लोग परमेश्वर के वचन को जानते हैं, उनके लिए यह और भी ज़रूरी हो जाता है कि वे अपने आचरण में नम्रता, आज्ञाकारिता और पवित्रता को दिखाएँ, क्योंकि अधिक प्रकाश का अर्थ अधिक उत्तरदायित्व है। यह वचन हमें यह भी सिखाता है कि धार्मिक पहचान या बाहरी गतिविधियाँ हमें सुरक्षित नहीं बनातीं। केवल चर्च जाना, बाइबल पढ़ना या आत्मिक शब्दों का प्रयोग करना पर्याप्त नहीं है, जब तक हमारा जीवन उन सच्चाइयों के अनुरूप न बदले। परमेश्वर हमसे पूर्णता नहीं, पर सच्चा मन और आज्ञाकारी जीवन चाहता है।
व्यावहारिक रूप से, यह वचन हमें प्रेरित करता है कि हम हर दिन अपने कार्यों, विचारों और निर्णयों को परमेश्वर के प्रकाश में रखें। जब हम गलती करें, तो उसे छिपाने के बजाय पश्चाताप करें। जब हमें सत्य दिखाया जाए, तो उसे टालें नहीं, बल्कि अपनाएँ। ऐसा जीवन न केवल हमें परमेश्वर के न्याय के लिए तैयार करता है, बल्कि हमें यहाँ और अभी एक सार्थक, ईमानदार और शांति से भरा हुआ जीवन जीने में भी सहायता करता है।
रोमियों 2:12 - जीवन में लागू करना
यह वचन हमें जीवन में बहुत ही व्यावहारिक रीति से चलना सिखाता है। इसे केवल सुनना या समझना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसे अपने दैनिक जीवन में उतारना आवश्यक है। सबसे पहले यह हमें अपनी ज़िम्मेदारी का बोध कराता है। चाहे किसी को परमेश्वर के वचन का गहरा ज्ञान मिला हो या केवल विवेक की हल्की-सी समझ, दोनों ही स्थितियों में मनुष्य अपने कर्मों के लिए उत्तरदायी है। इसलिए जीवन में यह सोचकर लापरवाह नहीं होना चाहिए कि मुझे तो ज़्यादा पता ही नहीं था, या यह मानकर गर्व नहीं करना चाहिए कि मुझे सब कुछ मालूम है।
इस वचन को जीवन में लागू करने का अर्थ है कि हम अपने विवेक को जीवित रखें। जब हमारे भीतर कोई बात गलत होने का एहसास कराए, तो उसे दबाने के बजाय स्वीकार करें और सुधार की ओर बढ़ें। दैनिक जीवन में ईमानदारी, सच्चाई, करुणा और न्याय का चुनाव करना इसी का व्यावहारिक रूप है। कार्यालय, परिवार, समाज और व्यक्तिगत निर्णयों में यह पूछना कि क्या यह सही है, हमें इस वचन के अनुसार चलने में सहायता करता है। जो लोग परमेश्वर के वचन को जानते हैं, उनके लिए यह और भी आवश्यक हो जाता है कि वे अपने जीवन में नम्रता और आज्ञाकारिता दिखाएँ। ज्ञान का उद्देश्य दूसरों पर अधिकार जमाना नहीं, बल्कि स्वयं को बदलना है। यदि जीवन वचन के अनुरूप नहीं बदले, तो ज्ञान स्वयं ही हमारे विरुद्ध गवाही बन जाता है।
इस वचन को जीवन में लागू करने का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि हम आत्म-जाँच करें। अपने विचारों, शब्दों और कार्यों को समय-समय पर परखें। जब गलती हो, तो बहाने न बनाएँ, बल्कि पश्चाताप करें और आगे बढ़ें। ऐसा जीवन हमें न केवल आने वाले न्याय के लिए तैयार करता है, बल्कि आज के जीवन को भी अर्थपूर्ण, संतुलित और शांति से भर देता है।
रोमियो 2:12 - कुछ सवाल खुद से पूछे
1) क्या मैं यह मानता हूँ कि केवल कम जानना मुझे निर्दोष बना देता है, या मैं अपने विवेक की आवाज़ को भी परमेश्वर की ओर से आई जिम्मेदारी समझता हूँ?
2) जहाँ मुझे सत्य और वचन का अधिक ज्ञान मिला है, वहाँ क्या मेरा जीवन वास्तव में उसके अनुसार चल रहा है, या मैं केवल जानने तक ही सीमित रह गया हूँ?
3) क्या मैंने कभी अपने पापों को यह कहकर हल्का करने की कोशिश की है कि “मैंने नहीं जाना” या “सब ऐसा ही करते हैं”, और इस प्रकार अपने मन को शान्त किया है?
4) जब मेरा विवेक मुझे किसी बात में रोकता या टोकता है, तो क्या मैं उसे सुनता हूँ, या सुविधा और इच्छा के अनुसार उसे दबा देता हूँ?
5) यदि आज मुझे अपने जीवन का हिसाब देना पड़े, तो क्या मैं यह कह पाऊँगा कि मैंने जो प्रकाश मुझे मिला, उसी के अनुसार चलने का ईमानदार प्रयास किया?
रोमियों 2:12 - प्रार्थना
हे मेरे निष्पक्ष, न्यायी और धर्मी परमेश्वर,
इस नई सुबह के लिए मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ। यह जीवन, श्वास, प्रकाश और एक और नया अवसर देने के लिए मैं तुझे धन्यवाद देता हूँ क्योंकि जब मेरी आँखें खुलीं, उससे पहले ही तेरी करुणा मेरे ऊपर थी। रात की रक्षा और सुबह की नई आशा के लिए मैं तेरा आभार मानता हूँ। यह दिन भी तेरे ही हाथों में है, और मैं इसे तेरे ही चरणों में समर्पित करता हूँ।
पिता, तू जानता है कि मैंने कितना जाना और कितना नहीं जाना, फिर भी तू मेरे हृदय की सच्ची स्थिति को पूरी तरह देखता और जानता है। हा मैं स्वीकार करता हूं कि कई बार मैंने अनजाने में गलतियाँ कीं है, और कई बार जानते हुए भी अपने विवेक की आवाज़ को अनसुना किया हैं। पिता, इसके लिए मुझे क्षमा कर। और मुझे ऐसा हृदय दे जो तेरी सच्चाई से प्रेम करे, जो बहानों में न छिपे, और जो तेरे सामने नम्र बना रहे। मुझे यह समझ दे कि ज्ञान हो या न हो, मैं अपने जीवन और अपने कामों के लिए मैं तेरा उत्तरदायी हूँ और रहूंगा। मुझे ऐसा जीवन जीना सिखा कि मेरा चलना तेरी इच्छा के अनुसार हो, न कि केवल मेरी समझ या सुविधा के अनुसार।
हे पिता, यदि तूने मुझे अधिक प्रकाश और अधिक समझ दी है, तो मेरे भीतर घमण्ड न आने दे। और जहाँ मेरी समझ सीमित है, वहाँ मुझे अन्धकार में भटकने न दे। मेरे विवेक को कोमल बनाए रख, ताकि जब तू मुझे किसी बात में रोके, तो मैं रुक सकूँ, और जब तू आगे बढ़ने को कहे, तो विश्वास के साथ आगे बढ़ सकूँ। मुझे ऐसा जीवन दे जिसमें मेरा ज्ञान मेरे लिए दोष का कारण न बने, बल्कि आज्ञाकारिता और जिम्मेदारी का कारण बने।
अब पिता, मैं अपने परिवार और अपने प्रियजनों को तेरे हाथों में सौंपता हूँ। उनके स्वास्थ्य की रक्षा कर, उन्हें हर प्रकार की बीमारी, दुर्बलता और भय से बचा। उनके आने-जाने में सुरक्षा दे, उनके मनों में शांति भर, और उनके घरों में प्रेम और एकता बनाए रख। यदि वे वचन को जानते हैं, तो उनके जीवन को उसके अनुसार चलने की सामर्थ दे, और यदि वे अभी पूरी तरह नहीं जानते, तो उनके विवेक को अपने सत्य की ओर धीरे-धीरे खींच। उन्हें गलत मार्गों से बचा और सही राह पर स्थिर रख। पिता, मुझे ऐसा व्यक्ति बना कि मेरा जीवन दूसरों के लिए गवाही बने। मेरे शब्द, मेरे काम और मेरे निर्णय तेरे न्याय और तेरी करुणा को प्रकट करें। मुझे आने वाले हर दिन के लिए तैयार कर, ताकि जब मैं तेरे सामने खड़ा होऊँ, तो लज्जा नहीं, बल्कि नम्रता और विश्वास के साथ खड़ा हो सकूँ।
हे पिता, इस दिन को, अपने जीवन को, और अपने भविष्य को मैं तेरे हाथों में छोड़ता हूँ। मुझे अपनी दया में थामे रख और अपने सत्य में चलाता रह। येशु के नाम में प्रार्थना करता हूँ।
आमीन।

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