अभिवादन और प्रस्तुति
मसीह में मेरे प्रिय भाइयो और बहनो, प्रभु येशु मसीह के मधुर और सामर्थी नाम में आप सबको प्रेम भरा नमस्कार। वह जो अपने आप को दाखलता के रूप में पहचान कराता है और हमारे जीवन और फलवन्त होने का कारण है उसी की स्तुति होती रहे हैं। आज हम सब एक ऐसे वचन के ऊपर मनन करेंगे जो हमें हमारे आत्मिक जीवन की जड़ तक ले जाता है। यह वचन हमें याद दिलाता है कि हमारा जीवन केवल चलना ही नहीं, बल्कि सही स्रोत से जुड़कर जीना है। यह वचन हमें बाहरी धार्मिकता से हटाकर भीतर के संबंध की ओर ले जाता है।
आज के Bible Vachan में आज हम किसी नई बात को नहीं, बल्कि उस सच्चाई को देखेंगे जिसे प्रभु ने बहुत सरल शब्दों में, लेकिन गहरे अर्थ के साथ कहा है। यह वचन हमें सिखाता है कि आत्मिक जीवन प्रयास से नहीं, बल्कि जुड़े रहने से फलवंत होता है। हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि मसीह में बना रहना क्या है, और उससे अलग होकर जीवन क्यों सूखा और निष्फल हो जाता है।
यह संदेश हमें दोषी ठहराने के लिए नहीं, बल्कि हमें जीवन के सच्चे स्रोत की ओर वापस बुलाने के लिए है। आज जब हम इस वचन पर मनन करेंगे, तो यह केवल सुनने या समझने तक सीमित न रहे, बल्कि हमारे हृदय को छुए। तो आइए, खुले मन और नम्र हृदय के साथ इस वचन को थोड़ा विस्तार से समझते हैं, ताकि हमारा जीवन सचमुच फलवंत और उसकी महिमा के लिए उपयोगी बन सके।
शीर्षक : आत्मनिर्भरता नहीं, मसीह पर निर्भरता
पुस्तक : यूहन्ना रचित सुसमाचार
लेखक : यूहन्ना
अध्याय : 15
वचन : 5
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मैं दाखलता हूं: तुम डालियां हो; जो मुझ में बना रहता है, और मैं उस में, वह बहुत फल फलता है, क्योंकि मुझ से अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते। यूहन्ना 15:5
यूहन्ना 15:5 - संदर्भ
यह वचन उस समय कहा गया था जब प्रभु येशु अपने चेलों के साथ अपने जीवन के सबसे गंभीर और भावनात्मक क्षणों में से एक से होकर गुजर रहे थे। यह अंतिम भोज के बाद की बातचीत का भाग था। यह वही रात थी जब येशु को पकड़वाया जाना था, जब उसके चेले भ्रम, डर और अनिश्चितता से घिरे हुए थे। बाहर से सब कुछ सामान्य दिखाई देता था, लेकिन भीतर ही भीतर एक बड़ा परिवर्तन होने वाला था। येशु यह जानता था कि वह शीघ्र ही शारीरिक रूप से उनसे अलग होने वाला है, इसलिए उसने इस समय हल्की या सतही बातें नहीं कीं, बल्कि जीवन के सबसे मूल और स्थायी सत्य उनके सामने रखे।
इस पूरे खंड में येशु अपने चेलों को यह समझाने का प्रयास कर रहा था कि उसके चले जाने के बाद उनका जीवन किस आधार पर टिका रहेगा। चेले वर्षों से उसके साथ चलते आए थे, उसे देख सकते थे, सुन सकते थे और छू सकते थे। अब यह संबंध बदलने वाला था। इसी संदर्भ में उसने दाखलता और डालियों का उदाहरण दिया था, ताकि वे समझ सकें कि भौतिक उपस्थिति के बिना भी उनका संबंध टूटने वाला नहीं है। यह संबंध अब और भी गहरा, आंतरिक और आत्मिक होने वाला था।
यह उदाहरण यहूदी पृष्ठभूमि में बहुत अर्थपूर्ण था। पुराने नियम में इस्राएल को कई बार दाखलता के रूप में चित्रित किया गया था, लेकिन वह दाखलता बार-बार निष्फल और अविश्वासी पाई गई थी। अब येशु ने स्वयं को सच्ची दाखलता कहा था, ताकि यह स्पष्ट हो जाए कि परमेश्वर के साथ सही और जीवित संबंध अब उसी के द्वारा संभव था। चेले अब किसी व्यवस्था, राष्ट्र या धार्मिक पहचान से नहीं, बल्कि एक जीवित व्यक्ति से जुड़े रहकर जीवन पाने वाले थे।
यूहन्ना 15:5 - टिप्पणी
मैं दाखलता हूँ: तुम डालियाँ हो - येशु अपने और अपने चेलों के बीच के संबंध को यहां एक बहुत ही सरल लेकिन गहरे उदाहरण के द्वारा प्रकट करता है। वह अपने आप को दाखलता कहता है और अपने शिष्यों को डालियाँ। इसका अर्थ यह नहीं कि वह सचमुच एक पेड़ है और वे सचमुच उसकी डालियाँ हैं, बल्कि वह यह दिखा रहा है कि जैसे दाखलता और उसकी डालियों के बीच स्वाभाविक, जीवित और अलग न होने वाला संबंध होता है, वैसा ही संबंध उसके और उसके लोगों के बीच है। यह संबंध केवल बाहरी या नाम का नहीं है, बल्कि जीवन से भरा हुआ और भीतर तक जुड़ा हुआ है।
दाखलता का पूरा महत्व उसकी जड़ में होता है। जड़ दिखाई नहीं देती, लेकिन वही पूरे पेड़ को जीवन देती है, रस पहुँचाती है और उसे खड़ा रखती है। इसी प्रकार मसीह वह मूल स्रोत है जिससे जीवन, सामर्थ्य और अनुग्रह बहकर उसके लोगों तक पहुँचता है। डालियाँ अपने आप में कुछ नहीं होतीं; उनकी पहचान, उनका अस्तित्व और उनका उद्देश्य पूरी तरह दाखलता पर निर्भर होता है। जब येशु कहता है “मैं दाखलता हूँ,” तो वह यह स्पष्ट करता है कि सारा आत्मिक जीवन उसी से निकलता है, और जो कुछ भी भला और जीवित है, उसकी शुरुआत वहीं से होती है।
“तुम डालियाँ हो” कहकर वह शिष्यों की स्थिति भी स्पष्ट करता है। डालियाँ बहुत सी हो सकती हैं, वे अलग-अलग दिशाओं में फैली हुई हो सकती हैं, फिर भी सब एक ही दाखलता से जुड़ी होती हैं। इसी तरह उसके लोग अलग-अलग स्थानों, स्वभावों और समझ के हो सकते हैं, फिर भी उनका जीवन एक ही मसीह से जुड़ा होता है। डालियाँ अपने आप में कमज़ोर होती हैं, वे तब तक ही जीवित और फलवंत रहती हैं जब तक वे दाखलता से जुड़ी रहती हैं। इससे यह बात सामने आती है कि शिष्यों की सामर्थ्य, स्थिरता और पहचान उनके अपने भीतर नहीं, बल्कि मसीह के साथ उनके जुड़े रहने में है।
जो मुझ में बना रहता है, और मैं उस में - यहां येशु दाखलता और डालियों के संबंध को और गहराई से समझाता है। यहाँ वह केवल जुड़ाव की बात नहीं करता, बल्कि बने रहने की बात करता है। इसका अर्थ किसी क्षणिक संपर्क से नहीं, बल्कि लगातार, स्थिर और जीवित संबंध से है। मुझ में बना रहना यह दर्शाता है कि मनुष्य का जीवन, भरोसा और सहारा लगातार मसीह में टिका हुआ हो। यह कोई एक बार की बात नहीं, बल्कि प्रतिदिन, हर स्थिति में बना रहने वाला संबंध है।
“और मैं उस में” कहकर येशु यह स्पष्ट करता है कि यह संबंध एकतरफा नहीं है। केवल मनुष्य का मसीह में रहना ही नहीं, बल्कि मसीह का भी मनुष्य में रहना आवश्यक है। जैसे दाखलता का रस डालियों में बहता रहता है, वैसे ही मसीह का जीवन, अनुग्रह और सामर्थ्य उसके लोगों के भीतर लगातार काम करता रहता है। यह अंदर से होने वाला कार्य है, जो दिखाई नहीं देता, लेकिन जिसके बिना आत्मिक जीवन संभव नहीं है।
यहाँ यह भी समझाया गया है कि जो सच में मसीह में जुड़े हुए हैं, उनकी पहचान यही होती है कि मसीह भी उनमें वास करता है। यह कोई बाहरी पहचान या धार्मिक दिखावा नहीं, बल्कि भीतर की वास्तविकता है। इस बने रहने में सुरक्षा भी है और निरंतरता भी। जैसे डालियाँ तब तक जीवित रहती हैं जब तक दाखलता में बनी रहती हैं, वैसे ही विश्वास करने वाले तब तक आत्मिक रूप से जीवित रहते हैं जब तक उनका संबंध मसीह के साथ जीवित बना रहता है। यहां येशु यह भी संकेत देता है कि आत्मिक जीवन अपने आप नहीं चलता। यह तभी संभव है जब यह आपसी संगति बनी रहे। मसीह में बना रहना और मसीह का हमारे भीतर बना रहना, यही वह जीवित संबंध है जिसमें आत्मिक जीवन टिकता है, बढ़ता है और आगे की बातों के लिए तैयार होता है।
वह बहुत फल फलता है - यहां प्रभु येशु उस संबंध का परिणाम बताता है जो मुझ में बने रहने और मेरे उस में बने रहने से उत्पन्न होता है। यहाँ फल अपने आप उगने वाली किसी बाहरी सफलता की बात नहीं है, बल्कि उस जीवन का स्वाभाविक परिणाम है जो भीतर से जीवित है। जैसे स्वस्थ दाखलता से जुड़ी हुई डालियाँ बिना ज़ोर लगाए फल लाती हैं, वैसे ही जो मनुष्य सच में मसीह में बना रहता है, उसके जीवन में फल दिखाई देता है।
“बहुत फल” कहने से यह स्पष्ट होता है कि यह फल थोड़े समय का या हल्का नहीं होता, बल्कि निरंतर और भरपूर होता है। यह उस अनुग्रह का परिणाम है जो मसीह से लगातार मिलता रहता है। यह फल मनुष्य की अपनी इच्छा, बुद्धि या मेहनत का घमंड नहीं है, बल्कि उस जीवन-रस का प्रभाव है जो दाखलता से डालियों में बहता रहता है। इसलिए यह फल केवल दिखाई देने वाले कामों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सोच, स्वभाव, व्यवहार और जीवन की दिशा में प्रकट होता है।
यह फल किसी दबाव या मजबूरी से नहीं, बल्कि जीवन की स्वाभाविक अभिव्यक्ति के रूप में आता है। जहाँ मसीह का जीवन भीतर कार्य कर रहा होता है, वहाँ ठहराव नहीं बल्कि बढ़ोतरी होती है। ऐसा व्यक्ति केवल एक बार फल नहीं लाता, बल्कि अपने पूरे जीवन में फलवंत बना रहता है। यही कारण है कि यहाँ बहुत फल लाने की बात कही गई है, क्योंकि यह संबंध समय के साथ कमजोर नहीं होता, बल्कि और गहरा होता जाता है। यहां यह भी स्पष्ट किया गया है कि सच्चे आत्मिक जीवन की पहचान फल से होती है। जहाँ यह जीवित संबंध है, वहाँ परिणाम अवश्य दिखाई देता है। फल इस बात का प्रमाण है कि जीवन भीतर से मसीह से जुड़ा हुआ है और वही जीवन बाहर प्रकट हो रहा है।
क्योंकि मुझ से अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते -
येशु यहां पहले कही गई सारी बातों को बहुत स्पष्ट और निर्णायक रूप से सामने रख देता है। यहाँ “मुझ से अलग होकर” का अर्थ केवल दूर हो जाना नहीं, बल्कि उस जीवित संबंध से बाहर हो जाना है जो दाखलता और डालियों के बीच होता है। जैसे डालियाँ अगर जड़ से अलग कर दी जाएँ, तो वे न केवल फल लाने में असमर्थ हो जाती हैं, बल्कि तुरंत सूखने लगती हैं, वैसे ही मनुष्य मसीह से अलग होकर आत्मिक रूप से कुछ भी करने में सक्षम नहीं रहता।
“कुछ भी नहीं कर सकते” कहकर यीशु यह नहीं कह रहा कि मनुष्य संसार के काम या साधारण जीवन के काम बिल्कुल नहीं कर सकता। यहाँ बात उस भलाई की है जो सच में परमेश्वर को स्वीकार्य हो, जो आत्मिक हो और जिसमें जीवन हो। मसीह से अलग होकर मनुष्य न तो ऐसे अच्छे काम की शुरुआत कर सकता है, न उसे आगे बढ़ा सकता है, और न ही उसे पूरा कर सकता है। न भला विचार स्थिर रह सकता है, न सही वचन निकल सकता है, और न ही ऐसा काम हो सकता है जिसमें आत्मिक जीवन हो।
इस कथन में पूरी निर्भरता की बात सामने आती है। मसीह ही जीवन का स्रोत है, वही सामर्थ्य देता है और वही अनुग्रह को लगातार बनाए रखता है। जब तक यह संबंध बना रहता है, तब तक जीवन और फलवंतता बनी रहती है। लेकिन जैसे ही यह संबंध टूटता है, सब कुछ व्यर्थ हो जाता है। इसलिए यह वाक्य चेतावनी भी है और सच्चाई की घोषणा भी कि आत्मिक जीवन में आत्मनिर्भरता का कोई स्थान नहीं है।
यूहन्ना 15:5 - धार्मिक उपदेश
यह वचन हमें जीवन के उस रहस्य के सामने ले आता है जहाँ सच्ची आत्मिक शक्ति का स्रोत प्रकट होता है। जैसे वचन स्पष्ट है प्रभु येशु स्वयं को यहां दाखलता कहता है, वह जड़, वह मूल, वह स्रोत जिससे जीवन बहता है। दाखलता कोई साधारण पौधा नहीं होती; वह तभी सुंदर और फलवंत होती है जब उसकी जड़ गहरी हो और रस लगातार बहता रहे। इसी तरह मसीह केवल एक शिक्षक या मार्ग दिखाने वाला नहीं है, बल्कि वह स्वयं जीवन है। जो जीवन हमें भीतर से जीवित, स्थिर और फलवंत बनाता है, वह उसी से निकलता है। हमारा आत्मिक जीवन किसी विचारधारा, परंपरा या बाहरी धार्मिकता पर नहीं, बल्कि एक जीवित व्यक्ति के साथ संबंध पर आधारित है।
जब हम अपने आप को डालियों के रूप में देखते हैं, तो यह हमारे घमंड को तोड़ देता है। डालियाँ अपनी सामर्थ्य का घमंड नहीं कर सकतीं। वे यह नहीं कह सकतीं कि फल उन्होंने अपनी मेहनत से पैदा किया। उनका अस्तित्व, उनका सौंदर्य और उनका फल ये सब कुछ दाखलता पर निर्भर है। यह सत्य हमें नम्र बनाता है। आज का संसार आत्मनिर्भरता की बात करता है, “खुद पर भरोसा करो” का नारा देता है, लेकिन यह वचन हमें एक गहरी सच्चाई सिखाता है कि आत्मिक जीवन में आत्मनिर्भरता नहीं, बल्कि मसीह-निर्भरता ही जीवन है।
यह बना रहने का संबंध बहुत महत्वपूर्ण है। यह किसी क्षणिक भावना या संकट में की गई प्रार्थना तक सीमित नहीं है। यह उस जीवन की बात करता है जो प्रतिदिन, हर परिस्थिति में, मसीह से जुड़ा रहता है। जैसे नदी अपने स्रोत से जुड़ी रहती है, वैसे ही आत्मा को मसीह से जुड़ा रहना है। दाऊद के जीवन को देखें, जब वह परमेश्वर पर निर्भर रहा, तब एक साधारण चरवाहा होते हुए भी उसने विशाल चुनौतियों का सामना किया। लेकिन जब उसने अपने बल और इच्छा पर भरोसा किया, तब उसका जीवन टूटन और पश्चाताप से भर गया। यह हमें सिखाता है कि बना रहना केवल सिद्धांत नहीं, बल्कि जीवन की आवश्यकता है।
मसीह का हमारे भीतर बना रहना हमें यह भरोसा देता है कि हम अकेले नहीं हैं। जैसे सूर्य का प्रकाश चंद्रमा में परावर्तित होता है, वैसे ही मसीह का जीवन हमारे भीतर प्रकट होता है। चंद्रमा का अपना प्रकाश नहीं होता, फिर भी वह अंधकार में रात को उजाला करता है। उसी प्रकार हमारा जीवन भी तब चमकता है जब मसीह का जीवन हम में प्रवाहित होता है। यह हमें आशा देता है कि हमारी कमजोरी बाधा नहीं है, बल्कि वही स्थान है जहाँ मसीह की सामर्थ्य प्रकट होती है।
फल लाने की बात आत्मिक जीवन का स्वाभाविक परिणाम है। फल किसी दबाव से नहीं, बल्कि जीवन से आता है। कोई किसान पेड़ को डाँटकर फल नहीं लगवाता; वह उसकी देखभाल करता है, पानी देता है, धूप और समय देता है। फल अपने समय पर आता है। इसी तरह आत्मिक फल भी तब प्रकट होता है जब जीवन भीतर से सही होता है। प्रेम, धैर्य, नम्रता, सच्चाई, करुणा ये सब फल हैं जो मसीह के जीवन से निकलते हैं। ये ऐसे गुण हैं जो कठिन परिस्थितियों में भी टिके रहते हैं, क्योंकि वे परिस्थिति से नहीं, स्रोत से आते हैं।
बाइबल में मूसा का जीवन भी यही सिखाता है। जब वह परमेश्वर की उपस्थिति में था, तब उसका चेहरा चमकता था, और इस्राएल का नेतृत्व करने की सामर्थ्य उसमें थी। लेकिन जब लोग उस उपस्थिति से दूर हुए, तब वे बार-बार भटक गए। यह हमें दिखाता है कि फलवंतता हमेशा उपस्थिति और संबंध से जुड़ी होती है, न कि केवल कार्यों से।
प्रकृति स्वयं इस सत्य की गवाही देती है। एक ग्रह यदि अपने सूर्य से अलग हो जाए, तो वह न केवल ठंडा हो जाएगा, बल्कि अपना मार्ग भी खो देगा। सूर्य के चारों ओर उसकी परिक्रमा ही उसे जीवन के योग्य स्थिति में रखती है। इसी तरह मनुष्य का जीवन भी तब संतुलित और जीवित रहता है जब वह अपने सृष्टिकर्ता के चारों ओर केंद्रित होता है। उससे अलग होकर मनुष्य शायद कुछ समय तक सक्रिय दिखे, लेकिन भीतर से वह धीरे-धीरे ठंडा और सूखा होता जाता है।
“मुझ से अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते” यह वाक्य कठोर लग सकता है, लेकिन वास्तव में यह प्रेम से भरा हुआ सत्य है। यह हमें हमारी सीमाएँ दिखाने के लिए नहीं, बल्कि हमें सही स्रोत की ओर बुलाने के लिए कहा गया है। संसार बहुत से विकल्प देता है, जैसे शक्ति, पद, धन, बुद्धि लेकिन आत्मा की गहराई को केवल मसीह ही भर सकता है। इतिहास में कई महान व्यक्तित्व हुए जिन्होंने दुनिया को प्रभावित किया, लेकिन जब उनका जीवन परमेश्वर से जुड़ा नहीं रहा, तो उनकी सफलता भी अंततः खोखली साबित हुई। इसके विपरीत, कई साधारण लोग, जिनका जीवन मसीह से जुड़ा था, उन्होंने पीढ़ियों को बदल दिया। यह वचन हमें आत्म-परीक्षा के लिए भी बुलाता है। हम फल तो चाहते हैं, लेकिन क्या हम स्रोत में बने रहना चाहते हैं? हम आशीष चाहते हैं, लेकिन क्या हम संबंध को प्राथमिकता देते हैं? आज की व्यस्त जीवन शैली में धार्मिक काम करना आसान है, लेकिन मसीह में बने रहना चुनौतीपूर्ण है। फिर भी यही जीवन का मार्ग है। जब हम उसमें बने रहते हैं, तब हमारा जीवन स्वयं एक संदेश बन जाता है वो भी बिना शब्दों के।
अंत में, यह वचन हमें आशा और आनंद से भर देता है। यह हमें यह भरोसा देता है कि हमें अपने बल से सब कुछ नहीं करना है। हमें केवल उससे जुड़े रहना है। जैसे डालियाँ बस दाखलता से जुड़ी रहती हैं और फल अपने आप आता है, वैसे ही हमारा काम है उसमें बने रहना। बाकी कार्य वह स्वयं करता है। जब यह सत्य हमारे हृदय में गहराई से उतर जाता है, तब जीवन का बोझ हल्का हो जाता है, सेवा आनंद बन जाती है, और विश्वास संघर्ष नहीं बल्कि विश्राम बन जाता है। यही इस वचन का संदेश है जो बताता है कि जीवन, फलवंतता और पूर्णता केवल उसी में है।
यूहन्ना 15:5 - जीवन में प्रयोग
यह वचन हमें सबसे पहले अपने जीवन के केंद्र की जाँच करने के लिए बुलाता है। हमें यह पूछना होता है कि हमारा भरोसा वास्तव में किस पर टिका है। हम अक्सर अपनी समझ, अनुभव, पद, संबंधों या संसाधनों पर निर्भर हो जाते हैं, लेकिन यह वचन हमें याद दिलाता है कि आत्मिक जीवन का वास्तविक स्रोत केवल मसीह है। जीवन में इसका प्रयोग यह है कि हम हर निर्णय, हर योजना और हर संघर्ष में अपने आप से पहले उससे जुड़े रहने को प्राथमिकता दें। काम शुरू करने से पहले, नहीं, बल्कि जीवन जीने के तरीके में ही यह निर्भरता दिखाई दे।
हम सफलता के समय स्वयं को ऊँचा न करें और असफलता के समय टूट न जाएँ, बल्कि दोनों परिस्थितियों में उसी पर निर्भर बने रहें जो जीवन देता है। यह वचन हमें निरंतर संगति का अभ्यास सिखाता है। मसीह में बने रहना केवल कठिन समय की प्रार्थना नहीं है, बल्कि रोज़मर्रा के जीवन में उसकी उपस्थिति को सचेत रूप से स्वीकार करना है।
यूहन्ना 15:5 - जीवन में लागू करना
यह वचन हमें अपने जीवन को देखने का एक नया दृष्टिकोण देता है। इसे जीवन में लागू करने का पहला कदम यह स्वीकार करना है कि हमारा आत्मिक जीवन अपने आप नहीं चलता। जैसे डालियाँ तब तक जीवित रहती हैं जब तक वे दाखलता से जुड़ी रहती हैं, वैसे ही हमारा जीवन भी तभी सही दिशा में चलता है जब हम मसीह से जुड़े रहते हैं। इसका अर्थ यह है कि हम अपने दिन, अपने निर्णय और अपनी प्राथमिकताओं में उसे केवल याद ही न करें, बल्कि सचमुच उस पर निर्भर होकर चलें।
इस सत्य का जीवन में व्यावहारिक तरीका यह है कि हम अपने आत्मिक जीवन को कार्यों से पहले संबंध पर आधारित करें। कठिन समय में घबराने के बजाय हमें स्रोत की ओर लौटना चाहिए। हम टूटे हुए समय में भी उससे दूर न जाएँ, बल्कि और निकट आएँ। यह सच्चाई हमारे संबंधों में भी लागू होती है। जब मसीह का जीवन हमारे भीतर काम करता है, तब हमारे व्यवहार में परिवर्तन आना चाहिए। जीवन में इसे लागू करने का अर्थ यह है कि हम अपने परिवार, कार्यस्थल और समाज में वैसा स्वभाव दिखाएँ जो भीतर से बदला हुआ हो। धैर्य, क्षमा और प्रेम कोई सीखी हुई तकनीक नहीं, बल्कि जुड़े हुए जीवन का फल हैं।
यूहन्ना 15:5 - कुछ सवाल खुद से पूछे
1) क्या मेरा आत्मिक जीवन सचमुच मसीह से जुड़े रहने पर आधारित है, या मैं केवल अपनी समझ, आदतों और धार्मिक गतिविधियों पर निर्भर होकर जी रहा हूँ?
2) जब जीवन में थकान, सूखापन या निराशा आती है, तब क्या मैं तुरंत मसीह की ओर लौटता हूँ, या पहले अपने बल और तरीकों से सब कुछ सँभालने की कोशिश करता हूँ?
3) क्या मेरे जीवन में दिखाई देने वाला फल मेरे भीतर मसीह के जीवन का प्रमाण है, या केवल बाहर से अच्छा दिखने वाला व्यवहार है?
4) क्या मेरी प्रार्थना, निर्णय और रोज़मर्रा का जीवन यह दर्शाता है कि मसीह मुझ में बना रहता है, या मेरा संबंध उससे केवल ज़रूरत के समय तक सीमित है?
5) यदि आज ईमानदारी से अपने जीवन को देखूँ, तो क्या लोग मेरे शब्दों और कार्यों में मुझे अधिक देखते हैं, या मेरे भीतर कार्य करते हुए मसीह को पहचान पाते हैं?
यूहन्ना 15:5 - प्रार्थना
हे मेरे जीवित परमेश्वर,
आज मैं नम्र हृदय और टूटे मन के साथ तेरे सामने आया हैं। तू ही सच्ची दाखलता है, और मैं तेरी डाली हूं। इस सत्य को मैं अपने मन से नहीं, बल्कि अपने हृदय की गहराई से स्वीकार करता हूं। कई बार मैंने अपने आप पर भरोसा किया, अपनी समझ, अपनी सामर्थ्य और अपने अनुभव को जीवन का आधार बना लिया। लेकिन आज मैं मानता हूं कि तेरे बिना मेरा जीवन सूखा, थका हुआ और बिना फल का हो जाता है। प्रभु, मुझे क्षमा कर कि मैने कई बार तुझसे जुड़े बिना चलने की कोशिश की है।
हे प्रभु, मुझे सिखा कि मैं उस डाली की तरह तुझमें ही बना रहूं। केवल नाम के लिए नहीं, केवल शब्दों में नहीं, बल्कि अपने पूरे अस्तित्व के साथ। जब मेरा मन भटकता है, जब मेरा हृदय भारी हो जाता है, जब विश्वास कमजोर पड़ता है, तब मुझे अपनी उपस्थिति में वापस खींच ले आ। मुझे ऐसा हृदय दे जो तुझसे दूर होकर शांति न पाए, और ऐसा मन दे जो केवल तुझमें ही विश्राम पाए। तू मेरे भीतर बना रहे, ताकि मेरा जीवन केवल बाहरी धार्मिकता न हो, बल्कि भीतर से जीवित और सच्चा हो।
प्रभु, मैं मानता हूं कि मेरे जीवन में जो भी भलाई है, वह मेरी नहीं, बल्कि तेरी अनुग्रह की देन है। यदि मेरे जीवन में कभी प्रेम दिखाई दिया, धैर्य दिखा, क्षमा निकली या सच्चाई प्रकट हुई, तो उसका श्रेय मुझे नहीं, केवल तुझे जाता है। मुझे हर प्रकार के घमंड से बचा, और मुझे सदा यह स्मरण कराता रह कि मैं केवल डाली हूं, जिसमें जीवन बस तुझसे ही आता है।
हे प्रभु, मेरे भीतर फल उत्पन्न कर। ऐसा फल जो केवल दिखाई देने के लिए न हो, बल्कि ऐसा जो कठिन समय में भी बना रहे। जब मुझे चोट पहुँचे, तब मेरे भीतर से क्षमा निकले। जब मुझे ठुकराया जाए, तब मेरे भीतर से प्रेम बहे। जब मार्ग कठिन हो, तब मेरे भीतर से धैर्य प्रकट हो। ऐसा जीवन दे जो लोगों को मेरी ओर नहीं, बल्कि तेरी ओर देखने के लिए प्रेरित करे। और प्रभु, जहाँ भी मेरे जीवन में सूखापन आ गया है, उसे प्रकट कर। जहाँ मैने तुझसे दूरी बना ली है, वहाँ मुझे नम्रता से वापस ले आ। मुझे डर नहीं, बल्कि भरोसा दे। मुझे संघर्ष नहीं, बल्कि संबंध सिखा। मुझे यह समझ दे कि फल लाना मेरा काम नहीं, बल्कि तुझमें बने रहना मेरा बुलावा है। हे येशु, मैं अपना जीवन तेरे हाथों में सौंपता हूं। मेरे विचार, मेरी इच्छाएँ, मेरे निर्णय और मेरा भविष्य और मेरा सब कुछ। मेरे अपने भीतर ऐसा जीवन बहने दे जो तेरी महिमा के लिए हो। ताकि मेरा जीवन तेरे प्रेम, तेरे अनुग्रह और तेरी सच्चाई का जीवता हुआ प्रमाण बन जाए।
आमीन।

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