अभिवादन और प्रस्तुति
मसीह में मेरे प्रिय भाइयों और बहनों, येशु के सामर्थ्यी और मधुर नाम में आप सभी को शांति और अनुग्रह मिले। वह जो हमारी शांति आनंद और आशा का ईश्वर है उसी की स्तुति होती रहे। यह मेरा सौभाग्य है कि आज मैं आपके सामने परमेश्वर के उस पवित्र और जीवित वचन को साझा करने के लिए यह लेख लेकर उपस्थित हुआ हूँ, जो न केवल हमारे मनों को तसल्ली देता है, बल्कि हमारे आत्मिक जीवन में एक नई जान डाल देता है।
आज हम हमारे Bible Vachan में परमेश्वर के वचन के उस अनमोल रत्न पर मनन करेंगे जिसे मैंने रोमियों 15:13 से लिया है। यह वचन एक ऐसी दिव्य आशीष है जो हमें उस परमेश्वर की ओर ले जाती है जो निराशा के घोर अंधकार में भी 'आशा का दाता' बनकर खड़ा रहता है। इस लेख के माध्यम से हम जानेंगे कि कैसे पवित्र आत्मा की सामर्थ्य हमारे विश्वास को आनंद और शांति की उस ऊंचाई पर ले जा सकती है, जहाँ हमारी आशा केवल स्थिर नहीं रहती, बल्कि हर परिस्थिति में बढ़ती चली जाती है। तो चलिए हम अपने हृदयों को खोलें ताकि परमेश्वर की यह सामर्थ्यी प्रार्थना हमारे जीवन की वास्तविकता बन सके।
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शीर्षक : आशा का परमेश्वर
पुस्तक : रोमियों
लेखक : प्रेरित पौलूस
अध्याय :15
वचन :13
सो परमेश्वर जो आशा का दाता है तुम्हें विश्वास करने में सब प्रकार के आनन्द और शान्ति से परिपूर्ण करे, कि पवित्र आत्मा की सामर्थ से तुम्हारी आशा बढ़ती जाए। रोमियो 15:13
रोमियो 15:13 - संदर्भ
रोमियों 15:13 इस पत्री के एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ पर आता है, जहाँ प्रेरित पौलुस अपने मुख्य उपदेशात्मक और सैद्धांतिक शिक्षण को धीरे-धीरे समेटते हुए उसे एक प्रार्थनामय निष्कर्ष की ओर ले जाते हैं। यह वचन केवल एक अलग कथन नहीं है, बल्कि रोमियों की पत्री के लंबे तर्क, शिक्षण और आत्मिक मार्गदर्शन का भावनात्मक और आत्मिक शिखर है, जहाँ सिद्धांत प्रार्थना में और शिक्षा आशीष में बदल जाती है।
रोमियों के 14वें अध्याय से लेकर 15वें अध्याय के मध्य तक, पौलुस कलीसिया के भीतर व्याप्त आपसी मतभेदों और तनावों को संबोधित कर रहे थे। रोम की कलीसिया में उस समय विश्वासियों के दो प्रमुख समूह थे एक वे जो विश्वास में मज़बूत थे और उन्हें खाने-पीने या विशेष दिनों को मानने में स्वतंत्रता थी, और दूसरे वे जो विश्वास में कमज़ोर थे, जो अब भी कुछ नियमों, परहेजों और धार्मिक प्रथाओं से बँधे हुए थे। इन मतभेदों के कारण कलीसिया में आलोचना, तिरस्कार और विभाजन की भावना उत्पन्न हो रही थी। पौलुस का उद्देश्य यह स्पष्ट करना था कि मसीही एकता व्यक्तिगत स्वतंत्रता या धार्मिक कठोरता पर नहीं, बल्कि प्रेम, सहनशीलता और परस्पर स्वीकार्यता पर आधारित होती है।
अध्याय 15 की शुरुआत में पौलुस इस एकता के लिए मसीह का सर्वोच्च उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। वे दिखाते हैं कि मसीह ने अपने सुख की खोज नहीं की, बल्कि दूसरों के बोझ को उठाया और अपमान सहा। इससे पौलुस यह सिखाते हैं कि कलीसिया में एक-दूसरे को सहन करना और स्वीकार करना केवल नैतिक सलाह नहीं है, बल्कि मसीह के चरित्र का प्रतिरूप है। यह एकता मानवीय समझौते का परिणाम नहीं, बल्कि परमेश्वर के वचन और पवित्रशास्त्र में निहित वादों पर आधारित है, जो धीरज और सांत्वना प्रदान करते हैं।
रोमियों 15:9–12 में पौलुस पुराने नियम के कई उद्धरण प्रस्तुत करते हैं, यह प्रमाणित करने के लिए कि परमेश्वर की उद्धार योजना आरंभ से ही केवल यहूदियों तक सीमित नहीं थी। बल्कि यहूदियों और अन्यजातियों दोनों को एक साथ परमेश्वर की महिमा करने के लिए बुलाया गया था। इन पदों में यह स्पष्ट होता है कि अन्यजातियों की सहभागिता कोई बाद की योजना नहीं, बल्कि परमेश्वर की अनंत इच्छा का भाग ही थी। यशायाह की भविष्यवाणी का उल्लेख करते हुए पौलुस यह दिखाते हैं कि यिशै की जड़, अर्थात मसीह, वह आधार है जिस पर अन्यजातियाँ भी अपनी आशा रखेंगी।
इसी पृष्ठभूमि में, रोमियों 15:13 आता है, जहाँ पौलुस “आशा” के इस विचार को पकड़कर एक प्रार्थना का रूप देता है। यह वचन केवल जानकारी नहीं देता, बल्कि यह एक आत्मिक घोषणा और आशीष है। इसका तात्कालिक संदर्भ यह है कि जब कलीसिया के लोग फिर चाहे वे यहूदी हों या अन्यजाति, विश्वास में मज़बूत हों या कमज़ोर मसीह में एक होकर परमेश्वर के वादों पर भरोसा करते हैं, तब परमेश्वर, जो स्वयं आशा का स्रोत है, उन्हें आनंद और शांति से भर देता है।
यह आनंद और शांति केवल भावनात्मक अनुभव नहीं है, बल्कि पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से उत्पन्न वह आंतरिक स्थिरता है जो मतभेदों, विवादों और विभाजन को मिटा देती है। इस प्रकार रोमियों 15:13 उस पूरे उपदेश का एक प्रभावशाली निष्कर्ष बन जाता है, जो विश्वासियों को आपसी संघर्षों से ऊपर उठाकर परमेश्वर की महिमा, एकता और जीवित आशा की ओर ले जाता है। यह वचन न केवल कलीसिया के लिए, बल्कि हर विश्वासी के लिए यह स्मरण है कि सच्ची एकता और परिपूर्णता पवित्र आत्मा के द्वारा मिलने वाली आशा में ही पाई जाती है।
रोमियो 15:13 - टिप्पणी
सो परमेश्वर जो आशा का दाता है - परमेश्वर को 'आशा का दाता' केहना केवल एक संबोधन नहीं, बल्कि एक महान और महिमामयी पदवी है जिसे प्रेरित पौलुस ने बहुत ही सोच-समझकर यहाँ रखा है। यह शीर्षक पिछले वचनों के संदर्भ से जुड़ा है जहाँ गैर-यहूदियों के मसीह पर भरोसा करने की बात कही गई थी। परमेश्वर को इस नाम से पुकारना इसलिए उचित है क्योंकि वे स्वयं आशा के एकमात्र स्रोत और रचयिता हैं। मनुष्य के स्वभाव में कुदरती तौर पर वह आत्मिक आशा मौजूद नहीं होती जो मृत्यु और मुश्किलों से पार देख सके; यह तो परमेश्वर का वह अनमोल उपहार है जो वे अपनी दया से हमारे हृदयों में तब बोते हैं जब हमारा नया जन्म होता है। जब पुरानी दुनिया के बुत और झूठी उम्मीदें बिजली गिरने या समय की मार से ढह जाती हैं, तब यहोवा एक ऐसी चट्टान की तरह खड़े रहते हैं जो कभी नहीं डगमगाती।
परमेश्वर की यह पहचान दो मुख्य पहलुओं को दर्शाती है: उद्देश्य और प्रभाव। उद्देश्य के रूप में देखें तो परमेश्वर ही हमारी आशा का एकमात्र केंद्र और लक्ष्य हैं। हमारी उम्मीद सांसारिक धन, अपने भले कामों या किसी इंसान पर नहीं, बल्कि उस जीवित परमेश्वर (पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा) पर टिकी है जो अपरिवर्तनीय है। वहीं प्रभाव के रूप में, वे वह कर्ता हैं जो इस आशा को हमारे भीतर सक्रिय करते हैं। वे अपने वादों, दया के संदेशों और पुराने अनुभवों के माध्यम से हमारे भीतर के बुझते हुए भरोसे को फिर से प्रज्वलित करते हैं। वे न केवल आशा को जन्म देते हैं, बल्कि उसे मरते दम तक कायम रखते हैं और बढ़ाते भी हैं। इसीलिए उन्हें 'वादों का परमेश्वर' भी कहा जाता है, क्योंकि वे अपनी कही हुई बात के प्रति सच्चे हैं और यही सच्चाई हमारी आशा की सबसे मज़बूत नींव है।
तुम्हें विश्वास करने में सब प्रकार के आनन्द और शान्ति से परिपूर्ण करे - प्रेरित पौलुस यहाँ 'आशा के दाता' परमेश्वर के सामने एक गहरी विनती कर रहे हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि बिना ईश्वरीय अनुग्रह के कोई भी उपदेश प्रभावी नहीं हो सकता। यहाँ 'आनन्द' और 'शान्ति' का उल्लेख अकारण नहीं है; ये वही आत्मिक फल हैं जो मसीही जीवन की बुनियाद बनाते हैं। यह आनन्द कोई क्षणिक या सांसारिक सुख नहीं है जो परिस्थितियों पर निर्भर हो, और न ही यह पाखंडियों का वह खोखला गर्व है जो अपनी उपलब्धियों पर आधारित होता है। यह तो वह आत्मिक खुशी है जो परमेश्वर के साथ एक पिता और पुत्र के गहरे रिश्ते से, मसीह के उद्धार की पूर्णता से और सुसमाचार के वादों से पैदा होती है। पौलुस की प्रार्थना 'परिपूर्ण' करने की है, जिसका अर्थ है कि यह खुशी इतनी प्रचुर हो कि जीवन की तमाम तकलीफों और परीक्षाओं के बीच भी वह कम न पड़े। हालाँकि मानवीय स्वभाव और शैतानी परीक्षाओं के कारण यह खुशी कभी-कभी ओझल सी लगती है, लेकिन विश्वास के मार्ग पर चलते हुए इसे लगातार नया और मुकम्मल किया जा सकता है।
इसी तरह, 'शान्ति' शब्द यहाँ केवल अशांति की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि यह वह गहरी आंतरिक स्थिरता है जो परमेश्वर के साथ हुए मेल-मिलाप से आती है। यह शान्ति मसीह के लहू के माध्यम से मिलती है और हमारे विवेक को इस बात का भरोसा दिलाती है कि हम अब दोषी नहीं, बल्कि निर्दोष ठहराए गए हैं। यह शान्ति आपसी भाईचारे और एकता को भी दर्शाती है, जिसकी कलीसिया में बहुत आवश्यकता थी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सब कुछ "विश्वास करने में" ही संभव है। विश्वास वह द्वार है जिससे होकर ये वरदान हमारे जीवन में प्रवेश करते हैं। जैसे-जैसे मसीह पर हमारा भरोसा बढ़ता है, वैसे-वैसे हमारा आनन्द और हमारी शान्ति भी बढ़ती जाती है। बिना सक्रिय विश्वास के ये अनुभव केवल विचार मात्र रह जाते हैं, लेकिन विश्वास में स्थिर रहने से ये जीवन की एक जीवंत हकीकत बन जाते हैं।
कि पवित्र आत्मा की सामर्थ से तुम्हारी आशा बढ़ती जाए - पौलुस की इस प्रार्थना का अंतिम लक्ष्य यह है कि विश्वासी केवल आशा न रखें, बल्कि वे उसमें 'बढ़ते' चले जाएं। 'बढ़ने' का अर्थ यहाँ उस बहुतायत और प्रचुरता से है, जहाँ आशा एक ऐसी पूर्ण निश्चितता में बदल जाती है जिसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं रहती। यह उस मसीही उम्मीद की पराकाष्ठा है जो स्वर्ग की महिमा और अनंत जीवन की ओर टकटकी लगाए रहती है। यह आशा आत्मा के लिए उस लंगर के समान है जो जीवन के तूफानों और अनिश्चितताओं के बीच मनुष्य को अडिग और सुरक्षित रखती है। यह केवल एक कल्पना नहीं, बल्कि उन अदृश्य वस्तुओं का ठोस प्रमाण है जिनकी हम प्रतीक्षा करते हैं। जब एक विश्वासी परमेश्वर की दया और उसके वादों का गहराई से अनुभव करता है, तो उसका यह भरोसा दिनों-दिन और अधिक मज़बूत और गहरा होता चला जाता है।
परंतु, इस आशा का बढ़ना किसी मानवीय प्रयास, इच्छाशक्ति या बौद्धिक क्षमता का परिणाम नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह से "पवित्र आत्मा की सामर्थ" पर निर्भर है। जिस प्रकार आत्मिक जीवन की शुरुआत पवित्र आत्मा के कार्य से होती है, उसी प्रकार उसका पोषण और वृद्धि भी उसी दिव्य शक्ति द्वारा संभव है। यह वही सामर्थ है जो हमारे भीतर सच्चाई को प्रकट करती है, हमें नया बनाती है और हमें वह मज़बूती देती है जो संसार नहीं दे सकता। पवित्र आत्मा ही वह शक्ति है जो हमारे भीतर आशा के बीज को एक विशाल वृक्ष में बदल देती है, जिससे हम भविष्य की ओर न केवल सकारात्मकता से, बल्कि एक ईश्वरीय अधिकार और विश्वास के साथ देख पाते हैं। अंततः, यह वाक्यांश यह स्पष्ट करता है कि एक विश्वासी का सम्पूर्ण आत्मिक अनुभव चाहे वह आनंद हो, शांति हो या आशा सब ईश्वरीय सामर्थ का ही प्रकटीकरण है।
रोमियो 15:13 - धार्मिक उपदेश
रोमियों 15:13 का यह दिव्य वचन केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि आत्मिक जीवन का एक संपूर्ण घोषणापत्र है। जब हम उस परमेश्वर की ओर देखते हैं जिसे प्रेरित पौलुस 'आशा का दाता' कहते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि यह आशा किसी मानवीय सकारात्मक सोच या केवल अच्छे दिनों की कल्पना मात्र नहीं है। यह आशा ब्रह्मांड के उस सृजक से निकलती है जिसने अंधकार के बीच 'प्रकाश हो' कहा था और शून्य में से जीवन को जन्म दिया था। जिस प्रकार प्रकृति में एक छोटा सा बीज मिट्टी की गहरी परतों के नीचे दबकर भी ऊपर की ओर सूरज की रोशनी की आशा में अपनी कोमल पंखुड़ियों को बाहर निकालता है, उसी प्रकार एक विश्वासी का जीवन परमेश्वर की सामर्थ्य से फूटता है। ब्रह्मांड की विशालता को देखें तो अरबों तारे और आकाशगंगाएँ एक अदृश्य नियम और लय में बँधी हुई हैं, जो उस परमेश्वर की वफ़ादारी की गवाही देती हैं जिसने उन्हें शून्य में टिका रखा है। जब हम उस अनंत परमेश्वर को अपनी आशा का केंद्र बनाते हैं, तो हमारा जीवन उस लंगर की तरह हो जाता है जो महासागर की सबसे भीषण लहरों के बीच भी जहाज को स्थिर रखता है। बाइबल में हम अब्राहम के उदाहरण को देखते हैं, जिसने उस समय आशा रखी जब आशा का कोई मानवीय आधार शेष नहीं था। उसने अपनी ढलती उम्र और शरीर की दुर्बलता को नहीं, बल्कि उस परमेश्वर की सामर्थ्य को देखा जिसने तारे गिनने का वादा किया था। अब्राहम की यह आशा केवल एक विचार नहीं थी, बल्कि एक ऐसा अटूट भरोसा था जिसने उसे विश्वासियों का पिता बना दिया।
परमेश्वर की यह आशा हमारे जीवन में आनंद और शांति के रूप में प्रकट होती है, जो विश्वास के मार्ग पर चलते हुए हमें प्राप्त होती है। यह आनंद उस झरने की तरह है जो पहाड़ों की गहराइयों से फूटता है और सूखे के मौसम में भी नहीं सूखता, क्योंकि इसका स्रोत जमीन की ऊपरी सतह पर नहीं बल्कि परमेश्वर की आत्मा में छिपा है। यह वह शांति है जो दुनिया की समझ से परे है एक ऐसी शांति जो दानिय्येल को सिंहों की मांद में भी प्राप्त थी। जब दानिय्येल उन भूखे सिंहों के बीच था, तब उसकी शांति उसकी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि उसके अटूट विश्वास से आ रही थी कि उसका परमेश्वर उसे बचाने में सक्षम है। बाहरी जगत में चाहे कितना भी शोर और कोलाहल क्यों न हो, लेकिन जिसके हृदय में मसीह की शांति का वास है, वह उस गहरे समुद्र के समान है जिसकी ऊपरी सतह पर तो लहरें उठती हैं, परंतु गहराइयों में पूर्ण सन्नाटा और स्थिरता होती है। महान प्रचारक और शहीद जैसे लोग, जिन्होंने आग की लपटों के बीच भी परमेश्वर की स्तुति की, वे इसी आत्मिक आनंद के गवाह थे। उनका आनंद उनके शरीर की पीड़ा से बड़ा था क्योंकि उनकी नज़रों के सामने उस महिमा का दर्शन था जो आने वाली थी। यह शांति और आनंद हमारे विश्वास की सक्रियता से बढ़ते हैं; जब हम मसीह के लहू और उसके बलिदान पर अपना संपूर्ण भरोसा टिका देते हैं, तो हमारे भीतर से अपराधबोध और भय का अंधकार विदा हो जाता है।
यह आध्यात्मिक यात्रा हमारे अपने सामर्थ्य से पूर्ण नहीं होती, बल्कि इसका वास्तविक इंजन पवित्र आत्मा की सामर्थ्य है। ब्रह्मांड के हर परमाणु में जो अदृश्य ऊर्जा व्याप्त है, वह उस महान शक्ति का एक छोटा सा अंश है जो पवित्र आत्मा के माध्यम से एक विश्वासी के भीतर काम करती है। जिस प्रकार एक पतंग आकाश की ऊँचाइयों को केवल तभी छू पाती है जब वह अदृश्य हवा के वेग के साथ तालमेल बिठाती है, उसी प्रकार हमारा जीवन तभी आशा में बढ़ता है जब हम पवित्र आत्मा के नियंत्रण में स्वयं को सौंप देते हैं। प्रेरित पतरस का जीवन इसका एक ज्वलंत उदाहरण है; वह व्यक्ति जो एक समय डर के मारे मसीह को पहचानने से मुकर गया था, पवित्र आत्मा की सामर्थ्य पाकर एक निडर गवाह बन गया। यह वही शक्ति है जो हमारे मुर्दा सपनों में जान फूँकती है और हमारी कमजोरियों को परमेश्वर की महिमा का माध्यम बना देती है। जब पवित्र आत्मा हमारे भीतर कार्य करता है, तो हमारी आशा केवल स्थिर नहीं रहती, बल्कि वह 'बढ़ती' जाती है, यानी वह प्रचुरता के साथ हमारे जीवन से होकर दूसरों तक बहने लगती है। यह एक ऐसा दैवीय चक्र है जहाँ विश्वास से शांति मिलती है, शांति से आनंद उपजता है, और पवित्र आत्मा इस पूरे अनुभव को एक अटूट आशा में बदल देता है जो मृत्यु के द्वार पर भी फीकी नहीं पड़ती।
आज का यह संदेश हर उस थके हुए हृदय के लिए है जो परिस्थितियों के बोझ तले दबा हुआ है। याद रखें कि जिस परमेश्वर ने इस विशाल ब्रह्मांड को अपनी उंगलियों से रचा है और जो हर एक तारे का नाम जानता है, वही आपकी आशा का दाता है। आपकी परिस्थितियाँ चाहे कितनी ही विपरीत क्यों न हों, यदि आप विश्वास के साथ उसकी ओर मुड़ते हैं, तो वह आपको उस आनंद से भर देगा जो आपकी समझ से परे है। यह समय अपनी समस्याओं को देखने का नहीं, बल्कि उस सामर्थ्य को देखने का है जो पवित्र आत्मा के माध्यम से आपके भीतर काम करने के लिए तैयार है। जैसे पतझड़ के बाद वसंत का आना निश्चित है और रात के घनघोर अंधेरे के बाद सूर्योदय का होना अटल है, वैसे ही जो परमेश्वर पर भरोसा रखते हैं, उनकी आशा कभी लज्जित नहीं होगी। अपनी जड़ों को विश्वास में गहरा ले जाएँ और पवित्र आत्मा को अपने जीवन की पतवार सौंप दें। तब आप देखेंगे कि आपका जीवन केवल एक साधारण अस्तित्व नहीं, बल्कि परमेश्वर की महिमा, शांति और उस जीवंत आशा का एक चमकता हुआ स्मारक बन जाएगा जो अनंत काल तक स्थिर रहने वाला होगा।
रोमियो 15:13 - जीवन में प्रयोग
रोमियों 15:13 का यह सामर्थ्यी वचन हमें सिखाता है कि मसीही जीवन केवल सिद्धांतों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे हर दिन के संघर्षों में जिया जाना चाहिए। जब हम अपनी चिंताओं के बोझ तले दबे हों, तब हमें अपनी दृष्टि अपनी समस्याओं से हटाकर उस 'आशा के दाता' परमेश्वर पर टिकानी चाहिए, जो असंभव को संभव करने की सामर्थ्य रखता है। जीवन में इसका प्रयोग तब होता है जब हम कठिन परिस्थितियों के बीच भी घबराने के बजाय पवित्र आत्मा की शांति में विश्राम करना सीखते हैं। यह वचन हमें प्रोत्साहित करता है कि हम अपने आपसी रिश्तों और कलीसियाई जीवन में मसीह के आनंद को प्रतिबिंबित करें, जिससे हमारा व्यवहार दूसरों के लिए परमेश्वर की जीवित आशा का एक जीवंत गवाह बन जाए। जब हम पूरी तरह परमेश्वर के वादों पर भरोसा करते हैं, तो पवित्र आत्मा हमारे भीतर से उस दिव्य सामर्थ्य को प्रवाहित करता है जो हमारी आशा को अटूट बनाए रखती है।
रोमियो 15:13 - जीवन में लागू करना
रोमियों 15:13 के इस सामर्थ्यी वचन को जीवन में लागू करने का अर्थ है कि हम अपनी दैनिक चिंताओं और भविष्य के डर को उस 'आशा के दाता' परमेश्वर के चरणों में सौंप दें। जब भी जीवन में अनिश्चितता या निराशा के बादल छाने लगें, तो हमें अपनी बुद्धि पर भरोसा करने के बजाय विश्वास के उस सक्रिय मार्ग को चुनना चाहिए जो हमें सीधे मसीह की शांति की ओर ले जाता है। इसका व्यावहारिक प्रयोग तब होता है जब हम कठिन समय में भी पवित्र आत्मा की सामर्थ्य को पुकारते हैं, ताकि हमारा हृदय कड़वाहट के बजाय उस आनंद से भरा रहे जो हमारी परिस्थितियों से बड़ा है। यह वचन हमें सिखाता है कि हम दूसरों के प्रति प्रेम और एकता बनाए रखकर परमेश्वर की शांति के वाहक बनें।
रोमियो 15:13 - कुछ सवाल खुद से पूछे
1) जब परिस्थितियाँ आपके विपरीत होती हैं, तब आपकी आशा का असली आधार परमेश्वर होता है या सांसारिक साधन?
2) क्या आपके जीवन में ऐसी कोई चिंता है जो आपको उस 'शान्ति' का अनुभव करने से रोक रही है जिसका वादा परमेश्वर ने किया है?
3) क्या आप अपनी मुश्किलों से लड़ने के लिए अपनी कोशिशों पर भरोसा करते हैं या पवित्र आत्मा की सामर्थ्य माँगते हैं?
4) आपके जीवन का आनंद परिस्थितियों पर निर्भर है या इस बात पर कि आप परमेश्वर की सन्तान हैं?
5) क्या आपकी बढ़ती हुई आशा दूसरों के लिए एक गवाही बन पा रही है कि आपका परमेश्वर जीवित और सच्चा है?
रोमियो 15:13 - प्रार्थना
हे मेरे प्यारे स्वर्गीय पिता, आशा के एकमात्र स्रोत और जीवन के रचयिता, मैं आज तेरे चरणों में पूरी दीनता के साथ झुकता हूँ। पिता, मैं यह मानता हूं कि रोमियों 15:13 का यह सामर्थ्यी वचन मेरे थके हुए प्राणों के लिए एक शीतल जल के झरने के समान है, जो मेरी शारीरिक और आत्मिक प्यास दोनों बुझाकर तेरे स्वभाव में चलने और बने रेहने में मेरा सहायक बनता है। मैं तुझे धन्यवाद देता हूँ कि तू केवल आशा के बारे में बताने वाला नहीं, बल्कि तू स्वयं 'आशा का दाता' है। पिता, जब दुनिया की परिस्थितियाँ मुझे डराए और भविष्य के धुंधलके मुझे बेचैन करे, तब मुझे याद दिला कि मेरी उम्मीद किसी मनुष्य या सांसारिक साधन पर नहीं, बल्कि तुझ पर टिकी है जो कभी नहीं बदलता। पिता, मेरे हृदय के सूनेपन को देख, और मुझे उस दिव्य भरोसे से भर दे जो हर मानवीय समझ से परे है।
मेरे पिता, मैं तुझसे विनती करता हूँ कि तू मुझे विश्वास करने में सब प्रकार के आनंद और शांति से पूरी तरह लबालब भर दे। मेरे मन के उन कोनों में जहाँ आज भी डर, संदेह और कड़वाहट छिपी है, वहाँ अपनी शांति का उजियारा फैला दे। मुझे वह आनंद दे जो मेरी परिस्थितियों का मोहताज न हो, बल्कि तेरे साथ मेरे अटूट रिश्ते की गहराई से निकले। पिता, जब मैं घुटनों पर आऊँ और तुझ पर अपना संपूर्ण भरोसा टिका दूँ, तो तेरी वह शांति जो सारी समझ से परे है, मेरे हृदय और विचारों की रखवाली करे। पिता, मुझे सिखा कि मैं अपनी समस्याओं को नहीं, बल्कि तेरे उन महान वादों को देखूँ जो मसीह में 'हाँ' और 'आमीन' के साथ पूरे हुए हैं। मेरा विश्वास कभी डगमगाने न पाए, बल्कि तेरी उपस्थिति में वह और भी मज़बूत होता चला जाए।
हे पिता, मैं तेरे चरणों में अपना जीवन सौंपता हूँ। मैं जानता हूं कि मेरी अपनी शक्ति सीमित है, मेरी इच्छाशक्ति कमजोर है, और मैं अपने बल पर इस संसार की लड़ाइयाँ नहीं जीत सकता। इसलिए, मैं तेरी दिव्य सामर्थ्य को पुकारता हूँ कि वे मुझ पर उमड़ आए और मेरे भीतर उस आशा को बढ़ाते चले जाए। तेरी सामर्थ्य से मेरी आशा केवल एक छोटी सी किरण न रहे, बल्कि वह एक जलती हुई मशाल बन जाए जो न केवल मेरे मार्ग को रोशन करे, बल्कि दूसरों के अंधेरे जीवन में भी तेरी महिमा का प्रकाश फैला सके। मुझे अपनी सामर्थ्य से इतना भर दे कि मैं निराशा के सागर में भी डूबने के बजाय तेरी आशा के पंखों पर उड़ सकूँ। मेरे पिता परमेश्वर, इस प्रार्थना को मेरे जीवन की सच्चाई बना दे। आज मैं जब अपनी कोई भी गतिविधि करूं तो मेरा हृदय तेरे आनंद से भरपूर रहे, मेरा प्राण तेरी शांति में विश्राम करे और मेरा पूरा अस्तित्व तेरी सामर्थ्य का गवाह बने। मेरी आशा को तू इतना बढ़ा कि मृत्यु का डर भी इसे हिला न सके, क्योंकि मेरी उम्मीद उस अनंत महिमा पर टिकी है जो तूने मेरे लिए तैयार की है। मैं यह प्रार्थना अपने उद्धारकर्ता और मसीहा के पवित्र और सामर्थ्यी नाम में माँगता हूँ। आमीन।

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