अभिवादन और प्रस्तुति
मसीह में मेरे प्रिय भाइयों और बहनों आप सभी को हमारे पवित्र परमेश्वर के नाम में जो स्वर्ग में उच्चे पर वास करता है मैं हार्दिक शुभकामना देता हूं। जो जीवन का परमेश्वर है और जिनके द्वारा हमारे जीवन को इस युग और आने वाले युग में सही मायने में अर्थ और समृद्धि मिलती है, उसी की महिमा युगानुयुग होती रहे। आमीन।
प्रियजनों प्रत्येक नया दिन हमें अपने परमेश्वर की उपस्थिति में एक क्षण के लिए रुकने, उनके दर्शन करने और अपने हृदय को शांत करके उनकी वाणी सुनने का अवसर देता है। परन्तु इस आध्यात्मिक यात्रा में, अक्सर हम अपने शब्दों, विचारों और इच्छाओं में जल्दबाजी कर बैठते हैं। Today's Bible Reading in Hindi में आज का वचन हमने सभोपदेशक 5:2 से लिया है जो हमें यही याद दिलाता है कि हम सभी को मौन रहकर और गहराई तक जाकर, सावधानीपूर्वक बोलने और इस तथ्य को स्वीकार करना चाहिए कि हम एक महान, सर्वोच्च और पवित्र परमेश्वर से संवाद कर रहे हैं और जब हम यह जानते हैं कि परमेश्वर स्वर्ग में हैं और हम पृथ्वी पर, तो हमारी वाणी श्रद्धा से भर जाती है तो वहीं हमारा हृदय नम्रता से।
आज हम जब इस वचन के समक्ष खड़े हैं तो ये हमें आंतरिक अनुशासन, भक्ति और आत्म-परीक्षण के लिए प्रेरित करता है। यह हमें याद दिलाता है कि परमेश्वर से बात करने से कहीं अधिक मूल्यवान है उनकी बात सुनना। तो आइए आज का आरंभ अपने सृष्टिकर्ता की बात सुनने के लिए तैयार हृदय, समर्पण की भावना और संयमित वाणी के साथ करें। परमेश्वर आज भी बोलते हैं, और वे उन हृदयों से अधिक गहराई से बात करते हैं जो पहले सुनना सीखते हैं।
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शीर्षक : नम्रता और संयम के शब्द
पुस्तक : सभोपदेशक
लेखक : राजा सुलेमान
अध्याय : 5
वचन : 2
बातें करने में उतावली न करना, और न अपने मन से कोई बात उतावली से परमेश्वर के साम्हने निकालना, क्योंकि परमेश्वर स्वर्ग में हैं और तू पृथ्वी पर है; इसलिये तेरे वचन थोड़े ही हों। सभोपदेशक 5:2
सभोपदेशक 5:2 - संदर्भ
सभोपदेशक 5:2 केवल एक नैतिक सलाह नहीं है, बल्कि यह उपासना, प्रार्थना और परमेश्वर के साथ संबंध की गहराई को प्रकट करने वाला एक गंभीर आत्मिक निर्देश है। इस वचन को समझने के लिए उसके साहित्यिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक संदर्भ को साथ-साथ देखना आवश्यक है, क्योंकि यह वचन मनुष्य की सीमाओं और परमेश्वर की महानता के बीच के अंतर को अत्यंत स्पष्ट रूप से सामने रखता है।
साहित्यिक दृष्टि से सभोपदेशक बाइबल के ज्ञान साहित्य की परंपरा में एक विशिष्ट स्थान रखता है। इस पुस्तक का लेखक, सुलेमान जिसे उपदेशक या (कोहेलत) कहा गया है, जीवन की अनिश्चितता, क्षणभंगुरता और मानवीय प्रयासों की सीमाओं पर गंभीर मनन करता है। जहाँ पुस्तक के पहले अध्यायों में जीवन की व्यर्थता पर विचार किया गया है, वहीं पाँचवें अध्याय में अचानक ध्यान उपासना के व्यवहारिक पक्ष पर केंद्रित हो जाता है। यह परिवर्तन स्वयं में महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह दर्शाता है कि जीवन की व्यर्थता को समझने के बाद मनुष्य को परमेश्वर के सामने किस प्रकार खड़ा होना चाहिए। इस वचन में ज्ञान साहित्य की वह विशेषता स्पष्ट दिखाई देती है जिसमें कम बोलने, अधिक सुनने और हृदय की विनम्रता को सच्ची बुद्धि का चिह्न माना गया है।
ऐतिहासिक संदर्भ में यह वचन उस समय की उपासना-प्रणाली से जुड़ा है जब यरूशलेम का मंदिर आराधना का केंद्र था। लोग परमेश्वर के भवन में जाते समय बलिदानों, प्रतिज्ञाओं और लंबी प्रार्थनाओं को अपनी धार्मिकता का प्रमाण समझते थे। ऐसे वातावरण में उपदेशक यह सिखाता है कि परमेश्वर के सामने आने का अर्थ केवल बोलना या कुछ चढ़ाना नहीं है, बल्कि सावधानी, भय और सुनने की तैयारी के साथ उपस्थित होना है। यह वचन मंदिर की देहलीज से ही आराधक को सचेत कर देता है कि परमेश्वर बाहरी शब्दों से नहीं, बल्कि भीतर की मनःस्थिति से प्रसन्न होता है।
सभोपदेशक 5:2 - टिप्पणी
बातें करने में उतावली न करना - यह वाक्य मनुष्य की सबसे सामान्य, पर सबसे खतरनाक आदत पर सीधा प्रहार करता है यानी बिना सोचे बोल देने पर। उतावली से बोलना केवल तेज़ आवाज़ या जल्दी शब्द निकालना नहीं है, बल्कि वह स्थिति है जब मन विचार करने से पहले ही मुँह खुल जाता है। ऐसे शब्द होंठों से तो निकलते हैं, पर कभी हृदय और विवेक से नहीं आते। यही कारण है कि वे शब्द हल्के, खोखले और अक्सर पश्चाताप का कारण बनते हैं।
यह उतावलापन विशेष रूप से तब गंभीर हो जाता है जब मनुष्य परमेश्वर से बात कर रहा होता है, चाहे वो प्रार्थना में, वचन में, या उपासना के किसी भी रूप में हो। परमेश्वर के सामने बोलते समय जीभ को खुली छूट देना उचित नहीं। मनुष्य कई बार सीखी हुई बातें, आदतन शब्द, या भावनाओं के उफान में निकली इच्छाएँ सीधे बोल देता है, बिना यह जाँचे कि वे सही हैं या नहीं। ऐसी उतावली प्रार्थना को भीड़ बना देती है, संवाद नहीं।उतावली से बचना दरअसल परमेश्वर के प्रति आदर का चिह्न है। जब मनुष्य धीरे बोलता है, सोचकर बोलता है, और तौलकर शब्द चुनता है, तब वह यह स्वीकार करता है कि वह किसी साधारण श्रोता के सामने नहीं, बल्कि परमेश्वर के सामने है। यही इस वचन की गहरी शिक्षा है।
और न अपने मन से कोई बात उतावली से परमेश्वर के सामने निकालना- यह वाक्य मनुष्य की आंतरिक दुनिया को संबोधित करता है। यदि पहले वाक्य में मुँह की उतावली पर रोक है, तो यहाँ मन की उतावली पर भी है। परमेश्वर के सामने समस्या केवल बोले गए शब्द नहीं होते, बल्कि वे विचार और इच्छाएँ भी होती हैं जो बिना जाँचे-परखे सीधे प्रार्थना बन जाती हैं। मनुष्य के मन में अनेक भाव उठते हैं, इच्छाएँ, डर, क्रोध, लालसा, और आकांक्षाएँ। पर वो हर एक उठी हुई भावना परमेश्वर के सामने रखने योग्य नहीं होती।
प्रार्थना मन की भीड़ नहीं, बल्कि मन की छनाई होनी चाहिए। उतावली का अर्थ यहाँ यह नहीं कि मन में विचार आना गलत है, बल्कि यह कि बिना ठहरे, बिना सोचे, और बिना आत्म-परीक्षण के उन्हें परमेश्वर के सामने रख देना अनुचित है। ऐसी प्रार्थनाएँ अक्सर स्वार्थ से भरी होती हैं और उनमें विवेक की कमी होती है। बुद्धिमानी यही है कि मनुष्य स्वयं से यह पूछे कि जो वह माँग रहा है, क्या वह सच में माँगने योग्य है। परमेश्वर के सामने बोलने से पहले मन को शांत करना, इच्छाओं को क्रम में रखना, और यह समझना कि कौन-सी बात आत्मा से निकल रही है और कौन-सी केवल क्षणिक भावना है। यही सच्ची उपासना है।
यह वाक्य हमें यह भी सिखाता है कि परमेश्वर से बात करना जल्दबाज़ी का काम नहीं है। मनुष्य को यह याद रखना चाहिए कि वह राजाओं के राजा से बोल रहा है। मन की उतावली परमेश्वर के प्रति आदर की कमी दिखाती है, जबकि ठहरा हुआ मन नम्रता और विश्वास का चिन्ह है। यही इस वाक्य की गहरी आत्मिक शिक्षा है।
क्योंकि परमेश्वर स्वर्ग में हैं और तू पृथ्वी पर है - यह वाक्य पूरे उपदेश की नींव है, क्योंकि यही वह सत्य है जो मनुष्य को उसकी सही स्थिति और परमेश्वर की महानता का बोध कराता है। यहाँ स्वर्ग और पृथ्वी का भौगोलिक भेद नहीं, बल्कि अस्तित्व का अंतर बताया गया है। “परमेश्वर स्वर्ग में हैं” कहने का अर्थ है कि वह सर्वोच्च, पवित्र, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान हैं। वह किसी मनुष्य के समान सीमित नहीं, न समय से बँधे हुए हैं और न ही परिस्थितियों से। इसके विपरीत, “तू पृथ्वी पर है” मनुष्य की सीमितता, दुर्बलता और अस्थायित्व को दिखाता है। यह भी याद रहे की यह तुलना मनुष्य को नीचा दिखाने के लिए नहीं, बल्कि उसे नम्र बनाने के लिए है। मनुष्य मिट्टी से बना है, मिट्टी पर रहता है, और मिट्टी की ओर लौट जाता है। यह पहचान मनुष्य के भीतर आदर और भय को जन्म देती है, जो सच्ची उपासना के लिए आवश्यक है।
जब मनुष्य यह अंतर भूल जाता है, तब वह परमेश्वर से ऐसे बोलने लगता है जैसे किसी बराबरी वाले से बात कर रहा हो। यही कारण है कि प्रार्थनाएँ हल्की, माँगों से भरी और कभी-कभी आदेश जैसी हो जाती हैं। लेकिन जब यह सत्य मन में गहराई से बैठ जाता है कि परमेश्वर स्वर्ग में है और मनुष्य पृथ्वी पर, तब शब्द अपने आप संयमित हो जाते हैं। यह वाक्य हमें यह सिखाता है कि परमेश्वर के सामने खड़े होना साहस नहीं, बल्कि नम्रता माँगता है। दूरी का यह बोध प्रार्थना को डर से नहीं, बल्कि गहरे आदर से भर देता है। यही इस वाक्य का आत्मिक संदेश है।
इसलिए तेरे वचन थोड़े ही हों - यह वाक्य पहले कही गई सभी बातों का स्वाभाविक और आवश्यक निष्कर्ष है। जब यह स्पष्ट हो गया कि मनुष्य न तो मुँह से उतावली करे, न मन से जल्दबाज़ी दिखाए, और यह भी समझ ले कि परमेश्वर स्वर्ग में है और वह स्वयं पृथ्वी पर है, तब परिणाम यही निकलता है कि उसके शब्द कम, संयमित और सोच-समझकर बोले गए हों। यह भी ध्यान दिया जाए की यहाँ “कम शब्द” का अर्थ सूखी या अधूरी प्रार्थना नहीं, बल्कि अर्थ से भरे और आदर से युक्त शब्द हैं। क्योंकि परमेश्वर को मनुष्य के शब्दों की संख्या की आवश्यकता नहीं है। वह मन की दशा को पहले ही जानता है। बहुत अधिक बोलना कई बार इस भ्रम से निकलता है कि शब्दों की अधिकता से बात सुनी जाएगी। यही वह सोच है जिससे प्रभु येशु ने भी सावधान किया था। प्रार्थना संवाद है, भाषण नहीं। जहाँ शब्द अधिक होते हैं, वहाँ ध्यान बँट जाता है और आत्मा की गहराई कम हो जाती है।
बोलना अकसर मन की अव्यवस्था का परिणाम होता है। जैसे थका हुआ और उलझा हुआ मन नींद में सपनों की भीड़ बना देता है, वैसे ही अशांत मन प्रार्थना में शब्दों की भीड़ खड़ी कर देता है। इसके विपरीत, शांत मन कुछ ही शब्दों में अपनी पूरी भावना प्रकट कर सकता है। याद रहे कि इस वचन का अर्थ यह बिलकुल भी नहीं है कि हम परमेश्वर के सामने अधिक शब्द बोल ही नहीं सकते। वचह्न “शब्दों की गिनती” पर रोक नहीं लगाता, बल्कि शब्दों की प्रवृत्ति और मन की दशा पर ध्यान दिलाता है। समस्या शब्दों की लंबाई नहीं, बल्कि शब्दों की उतावली, खोखलापन और लापरवाही है यदि अधिक शब्द शांत मन, सोचे हुए हृदय, और आदर के भाव से निकलते हैं, तो वे न केवल स्वीकार्य हैं, बल्कि कई बार आवश्यक भी होते हैं। स्वयं येशु ने लंबी प्रार्थनाएँ कीं, पूरी रात प्रार्थना में बिताई। दानिय्येल, नहेम्याह और भजनकारों की प्रार्थनाएँ भी लंबी थीं। इसका अर्थ यह है कि अधिक शब्द अपने आप में गलत नहीं हैं।
लेकिन यह वचन उस स्थिति के विरुद्ध है जहाँ मनुष्य यह सोचता है कि ज़्यादा बोलने से परमेश्वर प्रभावित होगा, या जहाँ शब्द आदत से, बिना मन लगाए, केवल होंठों से निकलते हैं। ऐसे शब्द प्रार्थना नहीं, बल्कि शोर बन जाते हैं। यही कारण है कि “थोड़े शब्द” कहकर मनुष्य को यह सिखाया गया है कि वह चयन करे, तौले, और आदर के साथ बोले। यह वाक्य हमें सिखाता है कि परमेश्वर के सामने चुप्पी भी कभी-कभी सबसे सशक्त भाषा होती है। थोड़े शब्द, यदि पूरे मन से कहे जाएँ, तो वे आदर, विश्वास और आत्म-समर्पण को प्रकट करते हैं। यही इस वचन की गहरी आत्मिक शिक्षा है।
सभोपदेशक 5:2 - भक्ति संदेश
मनुष्य का जीवन शब्दों से भरा हुआ है। वह बोलते-बोलते बड़ा होता है, बोलते-बोलते अपने विचार प्रकट करता है और बोलते-बोलते ही अपने भीतर की दशा दिखा देता है। पर समस्या यह है कि बोलना हमने सीख लिया है, पर ठहरना नहीं सीखा। यह वचन हमें वहीं रोकता है जहाँ हम अक्सर फिसल जाते हैं। यह हमें सिखाता है कि जीवन में हर बात तुरंत बाहर निकाल देना बुद्धिमानी नहीं, बल्कि कई बार आत्मिक दुर्बलता का चिन्ह होता है। जब मनुष्य परमेश्वर की उपस्थिति को सच में पहचान लेता है, तब उसका स्वभाव बदलने लगता है। उसकी ज़ुबान धीमी हो जाती है और उसका मन गहरा।
जीवन में इस वचन का प्रयोग सबसे पहले हमारे दैनिक व्यवहार में दिखाई देता है। घर, परिवार, कार्य-स्थल और समाज में कितनी ही बार हम ऐसी बातें कह देते हैं जिन्हें बाद में हम स्वयं ही वापस लेना चाहते हैं। उतावली में निकले शब्द रिश्तों को तोड़ देते हैं, विश्वास को कमज़ोर कर देते हैं और मन में अपराध-बोध भर देते हैं। यदि मनुष्य बोलने से पहले कुछ पल ठहर जाए, तो वही शब्द जो चोट पहुँचाते, वे शायद बाहर ही न निकलें। यह ठहराव कोई कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मिक परिपक्वता है।
परमेश्वर से संबंध के स्तर पर यह वचन और भी गहरा हो जाता है। बहुत से लोग प्रार्थना को शब्दों की भरमार समझ लेते हैं। वे सोचते हैं कि जितना अधिक बोला जाए, उतना ही प्रभाव पड़ेगा। पर आत्मिक सच्चाई यह है कि परमेश्वर आवाज़ की ऊँचाई नहीं, बल्कि हृदय की गहराई देखता है। बाइबल में कर वसूलने वाला व्यक्ति बहुत कम बोलता है, पर उसका हृदय टूटा हुआ है, और वही बात परमेश्वर तक पहुँचती है। इसके विपरीत, कई बार लंबे-लंबे वाक्य केवल हवा में बिखर जाते हैं क्योंकि उनमें आत्मा का भार नहीं होता। जैसा आगे टिपण्णी में कहा है इस वचन का अर्थ यह भी बिलकुल नहीं है कि हम परमेश्वर के सामने अधिक शब्द बोल ही नहीं सकते। वचन “शब्दों की गिनती” पर रोक नहीं लगाता, बल्कि शब्दों की प्रवृत्ति और मन की दशा पर ध्यान दिलाता है। समस्या शब्दों की लंबाई नहीं, बल्कि शब्दों की उतावली, खोखलापन और लापरवाही है। स्वयं येशु ने लंबी प्रार्थनाएँ कीं, पूरी रात प्रार्थना में बिताई। दानिय्येल, नहेम्याह और भजनकारों की प्रार्थनाएँ भी लंबी थीं। इसका अर्थ यह है कि अधिक शब्द अपने आप में गलत नहीं हैं।
यह वचन हमें यह भी सिखाता है कि हर भावना को तुरंत आध्यात्मिक रूप देने की ज़रूरत नहीं। मनुष्य के भीतर कई भाव उठते हैं जैसे डर, क्रोध, लालसा, निराशा। पर विवेक यह माँग करता है कि हम उन भावों को पहचानें, परखें और फिर तय करें कि कौन सी बात परमेश्वर के सामने रखने योग्य है। राजा दाऊद के जीवन में हम देखते हैं कि वह अपने मन की स्थिति को पहचानता है, पर उसे कच्चे रूप में नहीं छोड़ता। वह अपने भावों को संयम और विश्वास के साथ प्रस्तुत करता है। यही संतुलन इस वचन की आत्मा है। जीवन में इसका प्रयोग हमें विनम्र बनाता है। जब मनुष्य यह मान लेता है कि वह सीमित है और परमेश्वर असीम, तब उसके भीतर एक पवित्र भय जन्म लेता है। यह भय डर नहीं, बल्कि आदर है। जैसे कोई छोटा बालक अपने पिता के सामने सोच-समझकर बोलता है, वैसे ही आत्मिक जीवन में भी मनुष्य का स्वभाव बदलता है। यह बदलाव शोर को कम करता है और सार को बढ़ाता है।
प्रकृति भी इस सत्य को चुपचाप सिखाती है। गहरे समुद्र सबसे अधिक शांत होते हैं, जबकि उथली नदियाँ शोर मचाती हैं। पर्वत ऊँचे होते हैं, पर वे बोलते नहीं। आकाश अपनी विशालता में चुप है, फिर भी उसकी उपस्थिति सब पर भारी है। यही आत्मिक सिद्धांत मनुष्य के जीवन पर भी लागू होता है। जो भीतर से गहरे होते हैं, वे कम बोलते हैं, पर जब बोलते हैं तो उनके शब्द वजन रखते हैं। पशु जगत में भी हम यह देख सकते हैं कि सबसे अधिक शोर अक्सर असुरक्षा से निकलता है। शांत पशु अपने अस्तित्व को साबित करने के लिए आवाज़ नहीं लगाते। इसी तरह आत्मिक रूप से स्थिर व्यक्ति को अपने शब्दों से स्वयं को सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती। वह जानता है कि उसका मूल्य परमेश्वर के सामने है, लोगों की तालियों में नहीं।
बाइबल के बाहर के जीवन में भी यही सिद्धांत दिखाई देता है। इतिहास के महान विचारक, संत और मार्गदर्शक अपनी भाषा में संयम रखते थे। वे जानते थे कि हर शब्द बीज की तरह होता है या तो जीवन देगा, या बोझ बढ़ाएगा। यही कारण है कि उनके वाक्य कम थे, पर पीढ़ियों तक जीवित रहे। इस वचन का जीवन में प्रयोग हमें सुनना भी सिखाता है। जो व्यक्ति कम बोलता है, वही सच में सुन पाता है। सुनना केवल कानों का काम नहीं, बल्कि हृदय की तैयारी है। जब हम बोलने में व्यस्त रहते हैं, तब परमेश्वर की धीमी आवाज़ दब जाती है। पर जब शब्द कम होते हैं, तब आत्मा जाग्रत होती है। एलिय्याह ने भी परमेश्वर को तूफ़ान या आग में नहीं, बल्कि कोमल स्वर में पहचाना। यह पहचान केवल शांत मन में संभव होती है।
यह शिक्षा हमें समाज में भी संतुलित बनाती है। आज का संसार शोर से भरा है जहां बोलने वाले बहुत हैं, पर सोचनेवाले बहुत कम। इस वचन के अनुसार जीने वाला व्यक्ति भीड़ में अलग दिखता है। वह उत्तेजना में नहीं बहता, बहस में नहीं उलझता और अपनी पहचान शब्दों से नहीं बनाता। उसका जीवन स्वयं एक संदेश बन जाता है। आत्मिक जीवन में यह अभ्यास समय के साथ गहराता है। शुरू में मन को रोकना कठिन लगता है, पर धीरे-धीरे मनुष्य सीखता है कि हर बात कहना आवश्यक नहीं। कुछ बातें चुप्पी में ही पूरी हो जाती तो अच्छा रहता हैं। कुछ प्रार्थनाएँ शब्दों से नहीं, आँसुओं से पूरी होती हैं। कुछ निवेदन केवल मन की गहराई में रखे जाने से ही स्वीकार्य हो जाते हैं। अंततः यह वचन हमें यह सिखाता है कि परमेश्वर के साथ संबंध में गुणवत्ता महत्वपूर्ण है, मात्रा नहीं। जैसे प्रेम में शब्दों की संख्या नहीं, सच्चाई का मूल्य होता है, वैसे ही आत्मिक जीवन में भी यही सिद्धांत लागू होता है। जब मनुष्य इस सत्य को जीवन में उतार लेता है, तब उसका जीवन शांत, स्थिर और फलदायी हो जाता है।
यह संदेश हमें हर दिन याद दिलाता है कि बोलना आसान है, पर संयम कठिन है। और जो कठिन मार्ग चुनता है, वही भीतर से मजबूत बनता है। यही इस वचन का जीवन-संदेश है, इसलिए अपना जीवन शोर से नहीं, गहराई से जियो; उतावली से नहीं, विवेक से बोलो; और शब्दों से अधिक, अपने हृदय को परमेश्वर के सामने रखो।
सभोपदेशक 5:2 - प्रार्थना
हे अनंत और पवित्र पिता, इस नई सुबह के लिए मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ। क्योंकि मैं यह जानता हूं कि तुझमें मेरी हर नई किरण, हर साँस और हर पल का सौभाग्य पाया जाता है। तू स्वर्ग में अपनी महिमा और ज्ञान में स्थिर है, और मैं पृथ्वी पर सीमित और नाज़ुक अवस्था में हूँ। आज की इस सुबह की शुरुआत में तुझे याद करना और अपनी आत्मा को तेरे सामने झुकाना मेरे लिए सम्मान और शांति का स्रोत और क्षण है। तेरे असीम प्रेम और कृपा के लिए मैं हृदय से तेरा आभारी हूँ, जिसने मुझे यह नया अवसर दिया है कि मैं अपने शब्दों और विचारों में सच और संयम के साथ आगे बढ़ सकूँ।
हे पिता, मेरे अपने मन और मेरे शब्दों पर नियंत्रण की मुझे शक्ति दे। मुझे अपने होंठों और मन की उतावली से बचा, ताकि मैं तेरे सामने केवल वही बोलूँ जो सत्य, समझदारी, अर्थसहित और आदर से भरा हो। मेरे भीतर उठने वाली आकस्मिक भावनाओं को शांत कर और उन्हें विवेक और सच्चाई के साथ तुझे समर्पित करने की सामर्थ्य दे। मेरे शब्द भले कम हो, पर सशक्त और सार्थक हों। मुझे यह समझ दे कि तू स्वर्ग में है और मैं पृथ्वी पर, और इस भिन्नता का आदर करते हुए मेरे हर विचार और हर वचन में तेरे लिए नम्रता, आदर और श्रद्धा बनी रहे।
हे सर्वज्ञ और दयालु पिता, जैसे मेरे लिए वैसे मेरे परिवार और प्रियजनों के लिए भी अपनी सुरक्षा और स्वास्थ्य का आशीर्वाद बरसा। उनके जीवन में तुझसे जुड़ी शांति, सुरक्षा और मार्गदर्शन बनी रहे। प्रार्थना करता हूं कि उनके मन शांत रहें, उनके शब्द संयमित रहें, और उनके हृदय तुझमें भरोसे और प्रेम से भरे रहें। उन्हें उतावली, अधैर्य और असावधानी से बचा और उनके जीवन को तेरे अनंत प्रेम की छाया में सुरक्षित रख।
वहीं हे पिता, मेरी आत्मा को स्थिर और मेरी वाणी को संयमित बनाए रख। मेरी प्रार्थना सिर्फ़ शब्दों की न हो, बल्कि मेरे पूरे हृदय और विश्वास का प्रतिबिंब बने। तू मेरे भीतर और मेरे चारों ओर है, और मैं तुझमें स्थिरता और पवित्रता के लिए झुकता हूँ। इस दिन के हर कदम में मुझे तेरे सामने सही और सोच-समझकर चलने की शक्ति दे। तेरे प्रकाश, तेरी कृपा और तेरी शांति के साथ मेरा मन, मेरा परिवार और मेरा जीवन आज पूरी तरह तुझमें सुरक्षित रहें। येशु के नाम में मांगता हूं।
आमीन।

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