Today's Bible Reading in Hindi - मत्ती 5:11

अभिवादन और प्रस्तुति 

मसीह में प्रिय भाइयों और बहनों, प्रभु की शांति आप सभी के साथ हो। तुम जो येशु के कारन सताए और तिरस्कृत किए जाते हो, तो याद रहे कि तुम उसके अनुग्रह में जी रहे हो। आज की यह नई सुबह हमें फिर से यह अवसर दे रही है कि हम परमेश्वर के वचन के सामने अपने मन को नम्र करें और अपने जीवन को उसकी ज्योति में देखें। संसार की आवाज़ें बहुत हैं, पर जीवन को दिशा देने वाली आवाज़ वही है जो सत्य, धैर्य और आशा से भरी हुई है। जिसकी शुरुआत और अंत येशु है।

Today's Bible Reading in Hindi में हमने आज के बाइबल पाठ में जो वचन लिया है वो मत्ती 5:11,12 से है। हम इन वचनों पर आज मनन करेंगे जो हमें यह समझाता है कि सच्चाई के मार्ग पर चलना हमेशा सरल नहीं होता। जब मनुष्य सही को चुनता है, तब उसे विरोध, गलत समझ और निंदा का सामना करना पड़ सकता है। फिर भी यह वचन हमें यह स्मरण दिलाता है कि ऐसे क्षण व्यर्थ नहीं होते, बल्कि वे हमारी आत्मा को मजबूत करते हैं और विश्वास को गहरा बनाते हैं।

प्रियों यह पाठ हमें डराने के लिए नहीं, बल्कि तैयार करने के लिए है। यह हमें सिखाता है कि परिस्थितियाँ कैसी भी हों, हमारे भीतर का चरित्र और हमारा भरोसा स्थिर रह सकता है। आज का यह संदेश हमें धैर्य, नम्रता और उस आंतरिक आनन्द की ओर बुलाता है, जो बाहरी हालात पर निर्भर नहीं करता। तो आइए, खुले हृदय और शांत मन के साथ आज के इस वचन को पढ़ें, ताकि यह केवल हमारे कानों तक ही नहीं, बल्कि हमारे जीवन में भी उतर सके।

Today's Bible Reading in Hindi - मत्ती 5:11

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शीर्षक : निंदा और सताव के बीच धन्यता का मार्ग

पुस्तक : मत्ती रचित सुसमाचार 

लेखक : मत्ती

अध्याय : 5

वचन : 11,12

धन्य हो तुम, जब मनुष्य मेरे कारण तुम्हारी निन्दा करें, और सताएं और झूठ बोल बोलकर तुम्हरो विरोध में सब प्रकार की बुरी बात कहें। आनन्दित और मगन होना क्योंकि तुम्हारे लिये स्वर्ग में बड़ा फल है इसलिये कि उन्होंने उन भविष्यद्वक्ताओं को जो तुम से पहिले थे इसी रीति से सताया था॥ मत्ती 5:11,12

मत्ती 5:11,12 - संदर्भ 

मत्ती 5:11–12 का यह वचन येशु मसीह के प्रसिद्ध पहाड़ी उपदेश का एक अत्यंत महत्वपूर्ण भाग है। यह उपदेश केवल नैतिक शिक्षा नहीं, बल्कि परमेश्वर के राज्य के नागरिकों के चरित्र, जीवन और भविष्य की दिशा को स्पष्ट करता है। येशु यहाँ अपने शिष्यों को यह नहीं बताते कि संसार कैसा होना चाहिए, बल्कि यह बताते हैं कि जो लोग परमेश्वर की ओर चलेंगे, उनके साथ संसार कैसे व्यवहार करेगा।

मत्ती अध्याय 5 की शुरुआत जिन धन्यवचनों से होती है, वे सामान्य आशीषों की घोषणा नहीं हैं, बल्कि ऐसे जीवन की तस्वीर हैं जो परमेश्वर की दृष्टि में मूल्यवान है, चाहे संसार उसे कमज़ोर या अस्वीकार्य समझे। मत्ती 5:3 से 10 तक दिए गए धन्यवचन अधिकतर तीसरे पुरुष में हैं, लेकिन मत्ती 5:11–12 में येशु सीधे अपने शिष्यों से बात करने लगते हैं। इस कारण बहुत से विद्वान इन पदों को एक नया धन्यवचन न मानकर, आठवें धन्यवचन का विस्तार मानते हैं। यहाँ शिक्षा सामान्य सिद्धांत से निकलकर व्यक्तिगत चेतावनी और प्रोत्साहन बन जाती है।

ऐतिहासिक रूप से येशु यहाँ अपने शिष्यों को उस परंपरा से जोड़ते हैं, जो पुराने नियम के भविष्यद्वक्ताओं के जीवन में दिखाई देती है। परमेश्वर का संदेश लेकर खड़े होने वाले लोग कभी भी सुविधाजनक स्थिति में नहीं रहे। एलिय्याह को राजा और समाज दोनों से विरोध झेलना पड़ा। यिर्मयाह को देशद्रोही कहा गया और कैद में डाला गया। जकर्याह को मंदिर के आँगन में मार डाला गया। येशु यह स्पष्ट कर रहे हैं कि जो लोग परमेश्वर की इच्छा के अनुसार बोलते और जीते हैं, वे उसी मार्ग पर चलते हैं जिस पर पहले परमेश्वर के दास चले हैं। इस प्रकार सताव कोई असामान्य अनुभव नहीं, बल्कि विश्वास की एक ऐतिहासिक पहचान है।

यह समझना भी आवश्यक है कि येशु हर प्रकार की पीड़ा या विरोध को धन्य नहीं कहते। इस वचन में स्पष्ट सीमाएँ हैं। सताव का कारण व्यक्ति का अपना गलत व्यवहार नहीं, बल्कि मसीह के साथ उसकी निष्ठा होना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति अपने कठोर स्वभाव, घमंड या अनुचित आचरण के कारण विरोध झेलता है, तो वह इस वचन के अंतर्गत नहीं आता। यहाँ बात उस स्थिति की है जहाँ व्यक्ति सही मार्ग पर चलते हुए भी झूठे आरोपों और बदनामी का सामना करता है।

इस प्रकार मत्ती 5:11–12 केवल एक चेतावनी नहीं, बल्कि एक गहरी पहचान का वचन है। यह बताता है कि परमेश्वर के राज्य के नागरिकों को संसार कैसे पहचानेगा, और परमेश्वर उन्हें कैसे देखता है। यह वचन शिष्यों को भयभीत करने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें स्थिर, आश्वस्त और आशावान बनाने के लिए दिया गया है, ताकि वे जान सकें कि विरोध के बीच भी उनका मार्ग व्यर्थ नहीं है, और उनकी पहचान सुरक्षित है।


मत्ती 5:11,12 - टिप्पणी 

धन्य हो तुम - यह वचन पहली बार सामान्य सिद्धांत की तरह नहीं, बल्कि सीधे उन शिष्यों से कहा गया है जो प्रभु के सामने बैठे हुए थे और उसकी शिक्षा सुन रहे थे। यहाँ “धन्य” होना किसी दूर के आदर्श की बात नहीं, बल्कि जीवित और वास्तविक लोगों के जीवन में घटने वाली सच्चाई है। प्रभु येशु यह स्पष्ट कर देता है कि जो लोग वास्तव में उसके पीछे चलेंगे, वे संसार से अलग रखे नहीं जाएँगे, बल्कि संसार की शत्रुता का सामना करेंगे। यह वचन शिष्यों को पहले से तैयार करने और उनके मन को दृढ़ करने के लिए है, ताकि आने वाले अपमान और कष्ट उन्हें चौंका न दें।

जब लोग मेरे कारण - यहीं इस पूरे वचन का केंद्र है। सताव किसी सामान्य नैतिकता के कारण नहीं, बल्कि इसलिए है कि शिष्य मसीह से जुड़े हुए हैं। “धार्मिकता” जैसे सामान्य शब्द की जगह यहाँ प्रभु अपने व्यक्तित्व को सामने रखता है। उसका नाम, उसका सुसमाचार और उससे जुड़ाव ही विरोध का कारण बनता है। शिष्यों को यह जान लेना चाहिए कि वे जानबूझकर निंदा को आमंत्रित न करें, न किसी को कठोरता से ठेस पहुँचाएँ, न धर्म के नाम पर दूसरों को चिढ़ाएँ। लेकिन यदि सच्चे मन से मसीह का अनुसरण करने में, वैसे ही जैसे उनके स्वामी के साथ हुआ, उनके साथ भी निंदा और सताव होता है, तो उन्हें धैर्य रखना चाहिए।

तुम्हारी निंदा करें - निंदा का अर्थ केवल कठोर शब्द नहीं, बल्कि वह तिरस्कार है जो मज़ाक, तानों, उपनामों और अपमानजनक भाषा में प्रकट होता है। यह सताव का सबसे हल्का रूप है, फिर भी यह हृदय को गहरे तक चोट पहुँचाता है। परमेश्वर के सेवकों के जीवन में यह सदा से होता आया है। दाऊद के विरुद्ध झूठे गवाह खड़े हुए, यूहन्ना और मसीह दोनों को बदनाम किया गया, और स्वयं येशु को सामरी, दुष्टात्मा से ग्रस्त और पागल तक कहा गया। क्रूस पर भी उसे अपमान और ठट्ठों का सामना करना पड़ा। फिर भी उसने बदले में अपमान नहीं किया। इस प्रकार, जब शिष्य निंदा सहते हैं, तो वे वास्तव में अपने स्वामी के मार्ग पर चल रहे होते हैं।

और सताएँ - यह निंदा से आगे बढ़कर वह अवस्था है जहाँ विरोध व्यवहार में बदल जाता है। इसमें स्थान-स्थान पर खदेड़ा जाना, कठोर व्यवहार, सामाजिक बहिष्कार और हर प्रकार का अन्याय शामिल है। यह केवल अदालतों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह सारी शत्रुता है जो किसी भी रूप में प्रकट हो सकती है। प्रभु के मन में यह पूरा चित्र पहले से स्पष्ट है, और वह अपने शिष्यों को इसी वास्तविकता के लिए तैयार करता है। इसलिए यह मानना उचित नहीं कि ये बातें बाद में जोड़ी गई हों; ये स्वयं प्रभु की चेतावनी और शिक्षा हैं।

और झूठ बोलकर तुम्हारे विरुद्ध हर प्रकार की बुरी बातें कहें - यहाँ विशेष ज़ोर इस बात पर है कि आरोप झूठे हैं। यदि कोई व्यक्ति अपने कर्मों के कारण बदनाम हो, तो उसमें कोई धन्यता नहीं है। लेकिन जब बिना किसी सच्चाई के, जानबूझकर झूठे आरोप लगाए जाएँ, तब यह सताव का वह रूप है जो परमेश्वर की दृष्टि में गिना जाता है। पहले मसीहियों पर समाज-विरोधी होने, अनैतिक कर्म करने, यहाँ तक कि हत्या जैसे अपराधों के झूठे आरोप लगाए गए। इन सब बातों में सच्चाई का एक अंश भी नहीं था। यही बात उनके लिए ढाढ़स का कारण थी, क्योंकि उनका अपना मन उन्हें दोषी नहीं ठहराता था। ये सब दुर्भावनापूर्ण झूठ थे, जिनका उद्देश्य मसीहियों और उनके विश्वास को बदनाम करना था।

आनंदित और मगन होना - यह बुलाहट सामान्य खुशी की नहीं, बल्कि गहरे और विजयपूर्ण आनन्द की है। यह आनन्द दुःख के न होने से नहीं, बल्कि इस पहचान से आता है कि यह दुःख व्यर्थ नहीं है। संसार का तिरस्कार अपने आप में चाहने योग्य नहीं, फिर भी मसीह के पदचिन्हों पर चलना और उसके लिए सहना धन्य है। यह आनन्द आत्मा की उस शांति से उत्पन्न होता है, जो निर्दोषता और परमेश्वर की स्वीकृति से आती है।

क्योंकि स्वर्ग में तुम्हारा प्रतिफल बड़ा है - यह प्रतिफल किसी अधिकार या मजदूरी की तरह नहीं, बल्कि अनुग्रह का फल है। इस जीवन के हल्के और थोड़े समय के दुःख उस अनन्त महिमा के सामने कुछ भी नहीं हैं जो आने वाले जीवन में प्रकट होगी। मसीह के लिए धैर्य और प्रसन्नता से सहा गया सताव कभी व्यर्थ नहीं जाता।

भविष्यद्वक्ताओं को भी जो तुमसे पहिले थे सताया गया था - यह शिष्यों को एक महान परंपरा से जोड़ता है। वे अकेले नहीं हैं। उनसे पहले परमेश्वर के सच्चे दासों ने भी यही मार्ग चला है। सताव केवल पीड़ा नहीं, बल्कि यह इस बात का प्रमाण भी है कि मनुष्य सचमुच परमेश्वर की ओर है। इतिहास गवाही देता है कि शहीदों का लहू कलीसिया का बीज बना है। जब सताए गए लोग नम्रता, धैर्य और प्रेम के साथ सहते हैं, तो बहुतों के हृदय बदल जाते हैं और वे उसी सत्य को स्वीकार करने को विवश हो जाते हैं, जिसे वे पहले ठुकरा रहे थे। इस प्रकार, यह पूरा वचन शिष्यों के लिए चेतावनी भी है, सांत्वना भी, और महिमा की आशा भी, जो मसीह के साथ चलने के मार्ग को स्पष्ट, सुसंगत और अर्थपूर्ण बनाता है।

मत्ती 5:11 - भक्ति संदेश 

जब मनुष्य सत्य के मार्ग पर चलता है, तो सबसे पहले जिस बात का सामना करता है, वह यह है कि संसार उसे पूरी तरह स्वीकार नहीं करता। जैसे ही कोई व्यक्ति अपने जीवन में सच्चाई, पवित्रता और ईमानदारी को चुनता है, वैसे ही उसके चारों ओर की व्यवस्था असहज हो जाती है। यह असहजता अक्सर शब्दों में प्रकट होती है, कभी मज़ाक बनकर, कभी ताने बनकर, और कभी झूठे आरोपों के रूप में। जीवन में इस स्थिति का आना यह संकेत नहीं है कि व्यक्ति गलत मार्ग पर है, बल्कि कई बार यह इस बात का प्रमाण होता है कि उसने सही मार्ग को थामा है।

इतिहास में देखें तो परमेश्वर के निकट चलने वाले लोग कभी भी भीड़ के प्रिय नहीं रहे।राजा दाऊद को ही देखिए, जिसने किसी का अहित नहीं किया, फिर भी उसके विरुद्ध झूठी बातें कही गईं। यूसुफ ने सच्चाई को नहीं छोड़ा, पर उसे कारागार का मुँह देखना पड़ा। यिर्मयाह ने वही कहा जो उसे कहना सौंपा गया था, फिर भी उसे देशद्रोही कहा गया। इन सबके जीवन में एक समान बात दिखती है कि उन्होंने परिस्थितियों के कारण अपने आचरण को नहीं बदला। उन्होंने यह नहीं कहा कि अब चुप रहना बेहतर है, या सत्य को थोड़ा मोड़ लेना ठीक रहेगा। उन्होंने सहा, पर झुके नहीं।

आज के जीवन में भी यही सिद्धांत काम करता है। जब कोई व्यक्ति बेईमानी से इनकार करता है, तो उसे कठोर कहा जाता है। जब कोई अन्याय में साथ नहीं देता, तो उसे अव्यावहारिक समझा जाता है। जब कोई व्यक्ति पवित्रता को चुनता है, तो उस पर पुराने विचारों वाला होने का ठप्पा लगाया जाता है। यह सब उस निंदा के आधुनिक रूप हैं, जिनका अनुभव हर युग में सत्य के साथ चलने वालों ने किया है। यहाँ जीवन की परीक्षा यह नहीं होती कि लोग क्या कहते हैं, बल्कि यह होती है कि हम उनके कहे से क्या बनने देते हैं।

जीवन में एक गहरी आत्मिक परिपक्वता तब आती है, जब मनुष्य यह सीख लेता है कि हर आवाज़ का उत्तर देना आवश्यक नहीं है। जैसे पर्वत अपनी ऊँचाई के कारण हवाओं का सामना करता है, वैसे ही स्थिर मन वाला व्यक्ति आलोचनाओं को सह सकता है। पर्वत हवाओं को रोकता नहीं, पर उनसे हिलता भी नहीं। इसी प्रकार, आत्मिक जीवन में स्थिरता का अर्थ यह नहीं कि विरोध नहीं आएगा, बल्कि यह कि विरोध हमें अपने केंद्र से हटा नहीं पाएगा।

प्रकृति स्वयं इस सत्य को सिखाती है। मोती तभी बनता है जब सीप के भीतर रेत का कण प्रवेश करता है। यदि वह कण न हो, तो मोती भी न बने। पीड़ा यहाँ विनाश नहीं, बल्कि रूपांतरण का माध्यम बनती है। इसी प्रकार, जीवन में आने वाली निंदा और झूठे आरोप यदि धैर्य और नम्रता के साथ सहे जाएँ, तो वे आत्मा को कठोर नहीं, बल्कि उज्ज्वल बना देते हैं। जो व्यक्ति भीतर से शुद्ध रहता है, उसके लिए बाहरी शब्द अंततः अपना प्रभाव खो देते हैं।

बाइबल में एक और उदाहरण मिलता है, जहाँ स्थिप्नुस पर झूठे आरोप लगाए गए और उसे मृत्यु तक सहना पड़ा। उस घड़ी में भी उसके मुख पर क्रोध नहीं, बल्कि शांति थी। वह शांति किसी परिस्थिति की देन नहीं थी, बल्कि उस संबंध की फल थी, जिसमें वह जीवन भर बना रहा। यही बात आज के जीवन में भी लागू होती है। बाहरी शांति हमेशा संभव नहीं होती, पर भीतरी शांति उस आत्मिक जड़ से आती है जो परमेश्वर में गहराई से लगी होती है।

आधुनिक संसार में भी ऐसे उदाहरण मिलते हैं, जहाँ सच्चाई के लिए खड़े होने वाले लोगों को पहले अपमान सहना पड़ा, पर समय ने उनकी गवाही को सही ठहराया। कई सुधारक, समाजसेवी और सत्यवादी व्यक्ति अपने जीवनकाल में उपेक्षित रहे, पर बाद में वही लोग प्रेरणा का स्रोत बने। यह हमें सिखाता है कि वर्तमान की प्रतिक्रिया अंतिम निर्णय नहीं होती। समय स्वयं गवाही देता है कि कौन सही था और कौन केवल शोर कर रहा था।

जीवन का यह मार्ग मनुष्य को कठोर नहीं, बल्कि करुणामय बनाता है। जब कोई व्यक्ति अन्याय सहकर भी भलाई को नहीं छोड़ता, तो वह अपने विरोधियों के समान नहीं बनता। वह उसी मिट्टी से जुड़ा रहता है, जहाँ से दया, क्षमा और सहनशीलता उपजती है। यही वह शक्ति है जो बिना तलवार के युद्ध जीत लेती है। यही वह प्रकाश है जो अंधकार को कोसता नहीं, बल्कि उसे चुपचाप दूर कर देता है।

आत्मिक जीवन में यह समझ बहुत आवश्यक है कि सम्मान और अपमान दोनों अस्थायी हैं। जैसे बादल आकाश में आते-जाते हैं, वैसे ही लोगों की राय भी बदलती रहती है। आकाश बादलों से अपनी पहचान नहीं खोता। उसी प्रकार, जो व्यक्ति अपने अस्तित्व को परमेश्वर की दृष्टि से देखता है, वह मनुष्यों की अस्थिर धारणाओं से परिभाषित नहीं होता। यह दृष्टि मनुष्य को भीतर से स्वतंत्र बनाती है।

अंततः, यह जीवन का मार्ग किसी आसान यात्रा का वादा नहीं करता, पर यह एक अर्थपूर्ण यात्रा अवश्य देता है। यह मार्ग आँसुओं को व्यर्थ नहीं होने देता, पीड़ा को अर्थ देता है, और सहनशीलता को महिमा में बदल देता है। जो व्यक्ति इस मार्ग पर चलता है, वह अकेला नहीं होता, क्योंकि उसके साथ उन सभी की गवाही होती है जिन्होंने पहले यह रास्ता तय किया है। उनके जीवन यह बताते हैं कि सत्य कभी हारता नहीं, वह केवल समय लेता है।

इस प्रकार, जीवन में जब निंदा आए, जब झूठ बोले जाएँ, जब समझा न जाए, तब यह क्षण निराशा का नहीं, बल्कि आत्मिक जागृति का अवसर बन सकता है। यह वह क्षण है जहाँ मनुष्य यह चुनता है कि वह परिस्थितियों के अनुसार बदलेगा या अपने मूल स्वरूप में स्थिर रहेगा। यही चुनाव आत्मा को परखता है, और यही चुनाव जीवन को एक संदेश में बदल देता है, जो शब्दों से नहीं, बल्कि जीवन से बोला जाता है।

मत्ती 5:11 - प्रार्थना 

हे पिता, इस नई सुबह के लिए मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ। मैं मानता हूं कि यह दिन, यह श्वास, यह प्रकाश सब तेरे अनुग्रह की ही देन हैं। और हररोज की तरह आज भी जब मेरी आँखें खुलीं, तो मैं फिर से तेरी दया के बीच खड़ा पाया गया। बीती रात की रक्षा के लिए, और आज के नए दिन में प्रवेश करने में मदद करने के इस अवसर के लिए मैं तुझे धन्यवाद देता हूँ। संसार चाहे जैसा भी हो, पर हर सुबह मुझे यह याद दिलाती है कि तू अब भी मुझ में कार्य कर रहा है, तू अब भी मुझे संभाल रहा है।

हे पिता, तू जानता है कि जब मैं सच्चाई के साथ चलना चाहता हूँ, तो मुझे किन बातों का सामना करना पड़ता है। जब मेरे बारे में गलत समझ बनाई जाती है, जब शब्दों से चोट पहुँचाई जाती है, जब बिना कारण मेरी निंदा होती है, तब मेरे मन को संभाल। मुझे ऐसा हृदय दे जो कठोर न हो जाए, और ऐसी आत्मा दे जो टूटे नहीं। मुझे यह सामर्थ दे कि मैं अपमान के बदले अपमान न दूँ, और झूठ के सामने भी अपने भीतर की शांति न खो दूँ। जब मैं अकेला महसूस करूँ, तब मुझे यह स्मरण दिला कि तू मेरे साथ है। मेरी दृष्टि लोगों की बातों पर नहीं, बल्कि तेरी स्वीकृति पर टिकी रहे। मुझे ऐसा जीवन जीने की कृपा दे कि मेरा आचरण मेरे शब्दों से अधिक बोले।

हे पिता, मैं अपने परिवार और अपने प्रियजनों को तेरे हाथों में सौंपता हूँ। उनके जीवन की रक्षा कर, उनके शरीर को स्वस्थ रख, और उनके मन को शांति से भर दे। जहाँ वे जाते हैं, वहाँ तेरी छाया उनके साथ रहे। हर अनदेखे खतरे से उनकी सुरक्षा कर, और हर दिन उन्हें सही निर्णय लेने की बुद्धि दे। यदि उनके जीवन में भी कभी निंदा, विरोध या कठिनाई आए, तो उन्हें भी वही धैर्य और विश्वास दे जो तू मुझे इस वचन के द्वारा देना चाहता है। मेरे घर को प्रेम, समझ और सहनशीलता से भर दे, ताकि बाहर की कठोरता भीतर प्रवेश न कर सके।

हे पिता, आज के दिन में मुझ पर इतनी कृपा बनाए रखना की इस दिन के अंत तक मैं तेरे साथ चल सकू, तुझ पर भरोसा बनाए रखूं और जो मैं समझ नहीं पाता, उसे तेरे हाथों में छोड़ना सीखूँ। जो मैं सहता हूँ, उसमें अर्थ देख सकूँ। और जो मैं बोलूँ या करूँ, उससे तेरे नाम को आदर दे सकू। इस प्रार्थना को सुन, और मेरे जीवन को अपने उद्देश्य के अनुसार ढाल। येशु के नाम में, आमीन।


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