Today's Bible Reading in Hindi - गलातियों 2:20

अभिवादन और प्रस्तुति

हमारे प्रिय प्रभु में तुम प्रिय जनो, आपको प्रभु यीशु मसीह के मधुर और सामर्थी नाम में मेरा प्रेमभरा नमस्कार। यह नई सुबह और यह नया दिन हमारे लिए परमेश्वर की दया और अनुग्रह का सजीव प्रमाण है। जब हम आज के वचन के साथ परमेश्वर की उपस्थिति में आते हैं, तो अपने हृदय को शांत करें और अपने मन को खोलें, ताकि वह सत्य जो हमें नया जीवन देता है, हमारे भीतर गहराई से उतर सके। जो हमें परमेश्वर के पुत्र के द्वारा मिलता है बिना मोल के, उसी की स्तुति और बढ़ाई होती रहे।

Today's Bible Reading in Hindi में हमारा आज का बाइबल पाठ हमने ग 2:20 से लिया है जो हमें उस गहरे आत्मिक रहस्य की ओर ले जाता है जहाँ जीवन केवल बाहरी गतिविधियों का नाम नहीं रह जाता, बल्कि भीतर होने वाले परिवर्तन की कहानी बन जाता है। यह वचन हमें यह समझने के लिए आमंत्रित करता है कि सच्चा जीवन तब आरम्भ होता है जब हमारा पुराना स्वभाव पीछे छूटने लगता है और परमेश्वर की इच्छा हमारे जीवन में सक्रिय होने लगती है। यहाँ बात केवल त्याग या सहनशीलता की नहीं, बल्कि उस नए जीवन की है जो विश्वास के द्वारा हमारे भीतर कार्य करता है। आज के इस पाठ के माध्यम से हम अपने आप से यह प्रश्न पूछ सकते हैं कि हमारा दैनिक जीवन किस पर आधारित है क्या अपने बल और समझ पर, या उस विश्वास पर जो हमें हर परिस्थिति में स्थिर रखता है। तो आइए, इस वचन को थोड़ा विस्तार से समझे और हा, पढ़ते समय हम केवल सुनने वाले नहीं, बल्कि उसे अपने जीवन में जीने वाले भी बनें।

{tocify} $title={Table Of Content}

Today's Bible Reading in Hindi - गलातियों 2:20

शीर्षक : पुराने मनुष्य की मृत्यु, नए जीवन की शुरुआत

पुस्तक : गलातियों 

लेखक : पौलूस 

अध्याय : 2

वचन : 20

मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूं, और अब मैं जीवित न रहा, पर मसीह मुझ में जीवित है: और मैं शरीर में अब जो जीवित हूं तो केवल उस विश्वास से जीवित हूं, जो परमेश्वर के पुत्र पर है, जिस ने मुझ से प्रेम किया, और मेरे लिये अपने आप को दे दिया। गलातियों 2:20

गलातियों 2:20 - संदर्भ 

गलातियों 2:20 बाइबल के सबसे सामर्थी और गहरे वचनों में से एक है, क्योंकि इसमें प्रेरित पौलुस मसीही जीवन के मूल सार को अत्यंत संक्षेप में, परन्तु पूर्णता के साथ प्रकट करते हैं। यह वचन केवल व्यक्तिगत भक्ति की अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि पूरे गलातियों पत्र के तर्क का शिखर है। इसे सही रूप से समझने के लिए आवश्यक है कि हम उस ऐतिहासिक, धार्मिक और आत्मिक पृष्ठभूमि को समझें जिसमें यह वचन कहा गया।

गलातिया की कलीसियाओं में उस समय एक गंभीर संकट उत्पन्न हो गया था। कुछ यहूदी पृष्ठभूमि से आए मसीही यह सिखा रहे थे कि केवल येशु मसीह पर विश्वास करना उद्धार के लिए पर्याप्त नहीं है। उनके अनुसार, गैर-यहूदियों को भी मूसा की व्यवस्था का पालन करना होगा, विशेष रूप से खतना जैसे बाहरी नियमों को स्वीकार करना अनिवार्य है। यह शिक्षा मसीह के सुसमाचार की स्वतंत्रता को सीधे चुनौती दे रही थी। पौलुस के लिए यह केवल एक व्यावहारिक विवाद नहीं था, बल्कि सुसमाचार के हृदय पर आक्रमण था।

इसी संदर्भ में पौलुस गलातियों के दूसरे अध्याय में अंताकिया की घटना का उल्लेख करते हैं, जहाँ उन्होंने प्रेरित पतरस का सार्वजनिक रूप से सामना किया। पतरस, जो पहले गैर-यहूदियों के साथ स्वतंत्रता से संगति करता था फ़िर यहूदी मसीहियों के दबाव में उनसे अलग हो गया। पौलुस ने इसे पाखंड कहा, क्योंकि यह व्यवहार सुसमाचार की सच्चाई के अनुरूप नहीं था। इससे स्पष्ट होता है कि यह विवाद केवल शिक्षा का नहीं, बल्कि जीवन और पहचान का प्रश्न था।

इसके बाद पौलुस अपने तर्क को गहराई से प्रस्तुत करते हैं। वे स्पष्ट रूप से कहते हैं कि कोई भी मनुष्य व्यवस्था के कामों से धर्मी नहीं ठहरता, बल्कि केवल येशु मसीह पर विश्वास करने से धर्मी ठहरता है। जब पौलुस कहते हैं कि वे “व्यवस्था के द्वारा व्यवस्था के लिए मर गए,” तो उनका आशय यह नहीं है कि व्यवस्था बुरी थी, बल्कि यह कि व्यवस्था ने अपना उद्देश्य पूरा कर लिया है। व्यवस्था ने पाप को प्रकट किया, पर जीवन देने की सामर्थ उसमें कभी नहीं थी। मसीह में व्यवस्था की माँग पूरी हो गई, और उसी पूर्ति के कारण पौलुस अब उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं रहे।

इसी बिंदु पर गलातियों 2:20 सामने आता है, जो पूरे तर्क का आत्मिक शिखर है। जब पौलुस यह कहते हैं कि वे मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाए गए हैं, तो वे अपने पुराने अस्तित्व, अपनी पुरानी धार्मिक पहचान और अपने आत्म-केन्द्रित प्रयासों की मृत्यु की बात कर रहे हैं। यह मृत्यु किसी आत्म-नाश का चित्र नहीं है, बल्कि उस पुराने मनुष्य के अंत का संकेत है जो व्यवस्था के अधीन होकर स्वयं को धर्मी सिद्ध करना चाहता था। यहाँ पौलुस यह भी स्पष्ट करते हैं कि उनका जीवन समाप्त नहीं हुआ, बल्कि उसका स्रोत बदल गया है। अब जीवन उनकी अपनी सामर्थ, धार्मिक उपलब्धियों या आत्मिक अनुशासन पर आधारित नहीं है। उनका वर्तमान जीवन विश्वास के वातावरण में जीया जा रहा है। यह विश्वास किसी सिद्धांत में नहीं, बल्कि उस परमेश्वर के पुत्र में है जिसने व्यक्तिगत रूप से उनसे प्रेम किया और उनके लिए अपने आप को दे दिया।

इस प्रकार यह वचन यह प्रकट करता है कि मसीही जीवन का आधार भय या बाध्यता नहीं, बल्कि प्रेम है। पौलुस मसीह का अनुसरण इसलिए नहीं करते कि व्यवस्था उन्हें मजबूर करती है, बल्कि इसलिए कि क्रूस पर प्रकट हुआ प्रेम उनके पूरे अस्तित्व को पकड़ चुका है। यह प्रेम ही वह शक्ति है जो अब उनके भीतर से जीवन को संचालित करती है। गलातियों 2:20 का संदर्भ अंततः यह स्थापित करता है कि एक सच्चा मसीही व्यक्ति व्यवस्था की गुलामी से मुक्त है, पर वह स्वेच्छाचारिता में नहीं जाता। वह अब स्वयं के बल से धर्मी बनने का प्रयास नहीं करता, बल्कि मसीह के जीवन को अपने भीतर कार्य करने देता है। यह व्यवस्था के धर्म से विश्वास के धर्म की ओर, और आत्म-निर्भरता से मसीह-निर्भरता की ओर एक पूर्ण और निर्णायक परिवर्तन है।

गलातियों 2:20 - टिप्पणी 

मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ - यह वाक्य मसीही जीवन की नींव को प्रकट करता है। यह किसी शाब्दिक या ऐतिहासिक घटना का वर्णन नहीं करता, बल्कि एक गहरे आत्मिक सत्य को प्रकट करता है। प्रेरित पौलुस यह नहीं कह रहे कि वे शारीरिक रूप से मसीह के साथ उसी समय और उसी स्थान पर क्रूसित हुए, क्योंकि इतिहास के अनुसार तो केवल 2 चोर ही मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाएं गए थे। पर यह कि मसीह की क्रूस की मृत्यु में वे आत्मिक रूप से सम्मिलित थे। मसीह ने अपने लोगों के प्रतिनिधि के रूप में क्रूस सहा, और जो कुछ उन्होंने किया और सहा, वह उनके नाम और उनके स्थान पर था। इस कारण पौलुस स्वयं को मसीह में सम्मिलित देखते हैं, जैसे कि वह भी उस क्रूस पर उनके साथ मरे हों। यह क्रूसारोपण विशेष रूप से पुराने मनुष्य की मृत्यु को दर्शाता है। वह पुरानी पहचान जो व्यवस्था के अधीन थी, जो अपने प्रयासों से धर्मी ठहरना चाहती थी और जो पाप तथा संसार के प्रभाव में थी, अब समाप्त हो चुकी है। मसीह के क्रूस में उस पुराने स्वभाव को घातक चोट लगी है, जिससे उसका अधिकार और प्रभुत्व टूट गया है। अब पाप, व्यवस्था और संसार का पौलुस पर वैसा नियंत्रण नहीं रहा जैसा पहले था। यह कथन यह भी दर्शाता है कि मसीही जीवन कोई सतही सुधार नहीं, बल्कि एक निर्णायक मृत्यु से होकर गुजरने वाला परिवर्तन है, जहाँ पुराना जीवन क्रूस पर छोड़ा जाता है और नया जीवन आरम्भ होता है।

और अब मैं जीवित न रहा - प्रेरित पौलुस यहां उस आत्मिक परिवर्तन की गहराई को प्रकट करते हैं जो क्रूस के अनुभव के बाद घटित होता है। यहाँ “मैं” के समाप्त होने का अर्थ यह नहीं है कि पौलुस का व्यक्तित्व नष्ट हो गया, बल्कि उस पुराने स्वभाव का अंत हुआ जो स्वयं को जीवन का केंद्र मानता था। वह जीवन जो अपनी समझ, सामर्थ और धार्मिक उपलब्धियों पर आधारित था, अब शासन में नहीं है। पौलुस यह स्पष्ट करते हैं कि उनके जीवन का स्रोत, दिशा और प्रेरणा अब स्वयं वे नहीं, बल्कि मसीह हैं। मसीह का पौलुस में जीवित होना किसी शारीरिक निवास का संकेत नहीं, बल्कि एक गहरी आत्मिक संगति का वर्णन है। मसीह की आत्मा, उसका स्वभाव और उसकी इच्छा पौलुस के जीवन को भीतर से संचालित कर रही है। जैसे शरीर में प्राण हर अंग को जीवन देता है, वैसे ही मसीह का जीवन पौलुस की सोच, निर्णय और कार्यों को जीवित और सक्रिय बनाता है। यह एकता इतनी निकट है कि पौलुस अपने जीवन को मसीह से अलग करके नहीं देखते। अब उनका जीवन स्वतंत्र नहीं, बल्कि मसीह में निहित, उससे प्रेरित और उसी से सामर्थ पाने वाला जीवन है, जो भीतर से बदलकर बाहर प्रकट होता है।

पर मसीह मुझ में जीवित है - यह वाक्य पूरे पद का हृदय है। मसीही जीवन केवल मसीह के लिए जीना नहीं है, बल्कि मसीह का हमारे भीतर जीवित रहना है। पौलुस यह नहीं कहता कि वह केवल मसीह की शिक्षा पर चलता है, बल्कि यह कि मसीह स्वयं उसके भीतर जीवन का स्रोत बन गया है। इसका अर्थ यह नहीं कि पौलुस की पहचान मिट गई, बल्कि यह कि उसकी पहचान मसीह से जुड़ गई। जैसे बेल और डाल का संबंध होता है, वैसे ही मसीह और विश्वासी का संबंध है। जीवन की शक्ति बाहर से नहीं आती, बल्कि भीतर से बहती है। मसीह उसके विचारों को दिशा देता है, उसकी इच्छाओं को शुद्ध करता है, और उसके कामों को प्रेरित करता है। यह संगति इतनी गहरी है कि पौलुस कह सकता है कि अब उसका जीवन मसीह का जीवन है।

और मैं शरीर में अब जो जीवित हूं - यह वाक्य एक व्यावहारिक स्पष्टता लाता है। पौलुस यह मानता है कि वह अभी भी उसी संसार में है, उसी शरीर में है, उन्हीं परिस्थितियों में है। मसीही जीवन कोई आकाशीय पलायन नहीं है। यह शरीर में रहते हुए जिया जाने वाला जीवन है। फिर भी, यह जीवन केवल शारीरिक नहीं है। बाहर से सब कुछ सामान्य दिखाई देता है, लेकिन भीतर एक और ही जीवन चल रहा है। यह जीवन दुखों में भी स्थिर रहता है, परीक्षाओं में भी आशावान रहता है, और साधारण कार्यों में भी परमेश्वर को महिमा देता है। मसीही जीवन संसार से भागना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए बदले हुए ढंग से जीना है।

उस विश्वास से जीवित हूं, जो परमेश्वर के पुत्र पर है - यह वाक्य बताता है कि इस नए जीवन की कार्य-प्रणाली क्या है। यह जीवन आत्म-निर्भरता से नहीं, बल्कि विश्वास से चलता है। विश्वास यहाँ केवल मान लेना नहीं, बल्कि पूरा भरोसा है। यह भरोसा है कि मसीह पर्याप्त है, उसकी कृपा पर्याप्त है, और उसकी सामर्थ पर्याप्त है। पौलुस यह नहीं कहता कि वह अपने विश्वास पर जीता है, बल्कि यह कि वह विश्वास के द्वारा मसीह पर जीता है। मसीह इस विश्वास का केंद्र है, लक्ष्य है, और आधार है। “परमेश्वर का पुत्र” कहना यह याद दिलाता है कि यह भरोसा किसी साधारण व्यक्ति पर नहीं, बल्कि उस पर है जिसमें जीवन देने की सामर्थ है। जो पौलूस का जीवन बन गया है।

जिसने मुझ से प्रेम किया और अपने आप को मेरे लिए दे दिया - इस वाक्य में प्रेरित पौलुस उस गहरे और व्यक्तिगत प्रेम की घोषणा करते हैं जो पूरे मसीही जीवन की प्रेरणा और आधार है। यहाँ मसीह का प्रेम किसी सामान्य या सामूहिक विचार के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया, बल्कि अत्यंत व्यक्तिगत रूप में व्यक्त किया गया है। यद्यपि मसीह ने संसार से प्रेम किया और बहुतों के लिये अपने आप को दिया, फिर भी पौलुस इस सत्य को अपने जीवन पर लागू करते हुए कहते हैं कि यह प्रेम विशेष रूप से उनके लिये था। यह विश्वास की वह विशेषता है जो मसीह के कार्य को केवल ऐतिहासिक सत्य के रूप में नहीं, बल्कि व्यक्तिगत वास्तविकता के रूप में ग्रहण करती है।

यह प्रेम किसी योग्यता या पात्रता पर आधारित नहीं था। पौलुस जानते थे कि उनका अतीत विरोध, निन्दा और सताव से भरा हुआ था, फिर भी मसीह ने उनसे प्रेम किया। यह प्रेम अनन्त, नि:शुल्क और बिना शर्त था, जो समय से पहले ही ठहराया गया था। इस प्रेम की सबसे बड़ी और निर्णायक अभिव्यक्ति यह है कि मसीह ने अपने आप को दे दिया। उन्होंने केवल कुछ नहीं दिया, बल्कि अपना सम्पूर्ण अस्तित्व, अपना जीवन, अपनी देह और प्राण न्याय के हाथों सौंप दिए। यह बलिदान स्वेच्छा से और प्रेम से प्रेरित था। यही प्रेम पौलुस को अब अपने लिये नहीं, बल्कि उस मसीह के लिये जीने को प्रेरित करता है जिसने उनके लिये सब कुछ दे दिया।

इस प्रकार गलातियों 2:20 केवल एक धार्मिक कथन नहीं, बल्कि मसीही जीवन का पूरा खाका है। इसमें मृत्यु है, पर निराशा नहीं; जीवन है, पर घमंड नहीं; पहचान है, पर आत्म-केंद्रितता नहीं; और विश्वास है, पर खोखलापन नहीं। यह पद दिखाता है कि सच्चा मसीही जीवन स्वयं को मिटाना नहीं, बल्कि मसीह में नया बनना है। यह जीवन बाहर से साधारण लग सकता है, पर भीतर से परमेश्वर की सामर्थ से भरा हुआ होता है।

गलातियों 2:20 - भक्ति संदेश 

मसीही जीवन का सच्चा अर्थ बाहर से दिखाई देने वाले बदलावों में तो है लेकिन उससे भी ज्यादा एक मनुष्य के भीतर घटने वाले गहरे परिवर्तन में प्रकट होता है। बहुत बार लोग धर्म को आदतों, नियमों या बाहरी पहचान तक सीमित कर देते हैं, लेकिन परमेश्वर जिस जीवन की ओर बुलाता है, वह इससे कहीं अधिक गहरा होता है। यह ऐसा जीवन है जहाँ व्यक्ति अपने पुराने सोचने के तरीके, अपनी पुरानी प्रतिक्रियाओं और अपने स्वार्थी उद्देश्यों को छोड़कर एक नई दिशा में चलना सीखता है। यह बदलाव अचानक नहीं, बल्कि निरंतर आत्मिक प्रक्रिया के द्वारा होता है, जहाँ मनुष्य हर दिन यह सीखता है कि उसका जीवन अब केवल उसका नहीं रहा।

जब यह सत्य जीवन में उतरता है, तब मनुष्य अपने अधिकारों की नहीं, बल्कि परमेश्वर की इच्छा की चिंता करने लगता है। पहले जो बातें सबसे महत्वपूर्ण लगती थीं जैसे मान-सम्मान, स्वीकृति, सफलता और सुरक्षा वे अब धीरे-धीरे अपने स्थान से हटने लगती हैं। उनकी जगह एक नया बोझ आता है, जो दूसरों के लिए प्रेम, सहनशीलता और सेवा से जुड़ा होता है और जहां मसीह प्रथम होता है। यही कारण है कि सच्चा आत्मिक जीवन व्यक्ति को संसार से काटता नहीं, बल्कि उसे संसार में अधिक जिम्मेदार बना देता है।

अब्राहम का जीवन इसी परिवर्तन को दिखाता है। उसने एक सुरक्षित और जाना-पहचाना जीवन छोड़ा, बिना यह जाने कि आगे क्या होगा। उसका चलना किसी नक्शे के आधार पर नहीं, बल्कि भरोसे के आधार पर था जो उसने अपने सच्चे परमेश्वर पर रखा था। यही भरोसा हर उस व्यक्ति के जीवन में दिखाई देने लगता है जो अपने भविष्य को अपने नियंत्रण में रखने के बजाय परमेश्वर के हाथों में सौंप देता है। ऐसा जीवन अनिश्चितताओं से भरा हो सकता है, लेकिन वह भय से शासित नहीं होता। इस आत्मिक यात्रा में सबसे कठिन बात अपने भीतर के पुराने स्वभाव को पहचानना और उसे छोड़ना है। बहुत बार व्यक्ति मसीही कहलाने के बाद भी उसी तरह प्रतिक्रिया करता है, उसी तरह क्रोधित होता है, उसी तरह बदला लेने की सोचता है, जैसे पहले करता था पौलूस की तरह। लेकिन जब भीतर वास्तविक परिवर्तन होता है, तब उसका व्यवहार भी बदलने लगता है। यह बदलाव दबाव से नहीं, बल्कि भीतर की नई प्रेरणा से आता है। यही वह बिंदु है जहाँ व्यक्ति यह अनुभव करता है कि उसके भीतर काम करने वाली शक्ति अब पहले जैसी नहीं रही।

पतरस का जीवन इस बात को बहुत स्पष्ट करता है। वह भावनात्मक, जल्दी प्रतिक्रिया करने वाला और आत्मविश्वास से भरा हुआ व्यक्ति था। उसने अपने साहस पर भरोसा किया, लेकिन जब परीक्षा आई तो वह टूट गया। फिर भी परमेश्वर ने उसे नहीं छोड़ा। उसके टूटने के बाद उसमें एक नई नम्रता आई, और वही व्यक्ति बाद में दूसरों को संभालने वाला बना। यह दिखाता है कि आत्मिक जीवन का अर्थ गलती न करना नहीं, बल्कि गिरने के बाद बदल जाना है। जीवन की साधारण परिस्थितियाँ ही यह दिखाती हैं कि भीतर कौन सा जीवन काम कर रहा है। जब कोई हमें ठेस पहुँचाता है, जब हमारे साथ अन्याय होता है, या जब हमारी अपेक्षाएँ पूरी नहीं होतीं, तब हमारी प्रतिक्रिया यह प्रकट करती है कि हम किस स्रोत से जी रहे हैं। यदि प्रतिक्रिया कड़वाहट और क्रोध से भरी है, तो इसका अर्थ है कि पुराना स्वभाव अभी भी हावी है। लेकिन यदि प्रतिक्रिया धीरज, क्षमा और स्थिरता से भरी है, तो यह उस नए जीवन का प्रमाण है जो भीतर कार्य कर रहा है।

यूसुफ का जीवन इस सच्चाई का एक मजबूत उदाहरण है। उसके साथ विश्वासघात हुआ, उसे झूठे आरोपों में जेल में डाला गया, और वर्षों तक उसकी कोई सुनवाई नहीं हुई। फिर भी उसके भीतर कड़वाहट नहीं पनपी। हम देख सकते हैं कि उसकी पहचान परिस्थितियों से नहीं, बल्कि परमेश्वर की उपस्थिति से बनी रही। यही कारण था कि जब उसे अवसर मिला, तो उसने बदले के बजाय क्षमा को चुना। ऐसा व्यवहार केवल नैतिक प्रशिक्षण से नहीं, बल्कि भीतर बसे हुए नए जीवन से आता है। यह आत्मिक जीवन हमें सिखाता है कि हम अपनी सीमाओं को स्वीकार करें और अपनी कमजोरी को छुपाने के बजाय उसे परमेश्वर के सामने लाएँ। संसार कमजोरी को छुपाने को कहता है, लेकिन आत्मिक जीवन कमजोरी में भी भरोसा रखना सिखाता है। पौलुस ने स्वयं अपने जीवन में यह अनुभव किया कि जब वह कमजोर था, तभी उस पर सामर्थ प्रकट हुई। यही अनुभव आज भी हर उस व्यक्ति के लिए सच्चा है जो अपने बल पर नहीं, बल्कि परमेश्वर की कृपा पर निर्भर रहता है।

परिवार, कार्यक्षेत्र और समाज में यह जीवन बहुत व्यावहारिक रूप में दिखाई देता है। यह जीवन हमें सिखाता है कि हम केवल अपने लाभ की नहीं, बल्कि दूसरों की भलाई की भी चिंता करें। पति-पत्नी के संबंध में यह जीवन धैर्य और समझ को बढ़ाता है। माता-पिता और बच्चों के बीच यह जीवन कठोरता के स्थान पर मार्गदर्शन को जन्म देता है। कार्यस्थल पर यह जीवन ईमानदारी और विश्वसनीयता को प्राथमिकता देता है, चाहे उसका तुरंत लाभ न दिखाई दे।

रूत का जीवन इस व्यावहारिक विश्वास का सुंदर उदाहरण है। उसके पास कोई बड़ी धार्मिक भूमिका नहीं थी, न ही वह किसी मंच पर खड़ी दिखाई देती है। फिर भी उसकी निष्ठा, उसका प्रेम और उसका त्याग परमेश्वर की योजना का हिस्सा बन गया। उसका जीवन यह दिखाता है कि आत्मिक जीवन महान दिखने वाले कार्यों से नहीं, बल्कि विश्वासयोग्य चाल से पहचाना जाता है। यह जीवन निरंतर बढ़ने का जीवन है। कोई भी व्यक्ति एक दिन में परिपक्व नहीं हो जाता। इसमें सीखना, गिरना, संभलना और आगे बढ़ना शामिल है। इसमें कई बार मौन रहना पड़ता है, कई बार अपने अधिकार छोड़ने पड़ते हैं, और कई बार अपने विचारों को परमेश्वर के वचन के अधीन करना पड़ता है। लेकिन इस प्रक्रिया में भीतर एक ऐसी शांति विकसित होती है जो परिस्थितियों पर निर्भर नहीं रहती।

राजा दाऊद के भजनों में यह जीवन साफ दिखाई देता है। वह राजा था, पर अपने टूटे मन को छुपाता नहीं था। वह गिरा, पर परमेश्वर के पास लौटा। उसका जीवन हमें सिखाता है कि आत्मिक जीवन का अर्थ निष्पाप होना नहीं, बल्कि परमेश्वर के साथ सच्चा होना है। जब यह जीवन हमारे भीतर गहराता है, तब हमारी आशा भी बदल जाती है। हम अब केवल इस संसार की सफलता पर नहीं टिके रहते। हमारी दृष्टि आगे की ओर, स्थायी बातों पर टिक जाती है। यह हमें कठिन समय में भी स्थिर रखती है, क्योंकि हम जानते हैं कि हमारा जीवन केवल वर्तमान से नहीं बंधा।

अंत में, यह आत्मिक जीवन एक बुलाहट है, हर दिन अपने आप से हटकर परमेश्वर की ओर मुड़ने की बुलाहट। यह आसान मार्ग नहीं, लेकिन यही मार्ग सच्ची स्वतंत्रता की ओर ले जाता है। जब मनुष्य इस जीवन में चलता है, तब उसका जीवन स्वयं एक संदेश बन जाता है, बिना ऊँचे शब्दों के, बिना दिखावे के, केवल एक बदले हुए हृदय के द्वारा।

गलातियों 2:20 - प्रार्थना 

हे दयालु और करुणामयी पिता, इस नई सुबह के लिए मैं तुझे धन्यवाद देता हूँ। रात की शांति के बाद फिर से मेरी आँखें खुलीं है, साँस चल रही है, हृदय धड़क रहा है और जीवन का एक और दिन मेरे सामने है। यह सब तेरी कृपा के बिना संभव नहीं हो सकता था। आज की यह सुबह मेरे लिए केवल समय का आरम्भ नहीं, बल्कि तेरी दया की नई घोषणा है। जो बीत गया उसके लिए भी धन्यवाद, और जो आज सामने है उसके लिए भी मैं तुझे आदर देता हूँ। तूने मुझे फिर अवसर दिया कि मैं इस दिन को तेरी इच्छा के अनुसार जी सकूँ।

पिता, आज मैं अपने लिए तेरे सामने आता हूँ। मैं स्वीकार करता हूँ कि कई बार मेरा पुराना स्वभाव फिर से सिर उठाने लगता है। मेरी सोच, मेरी प्रतिक्रियाएँ और मेरे निर्णय हमेशा वैसे नहीं होते जैसे तू चाहता है। आज मैं अपने भीतर चल रहे उस संघर्ष को तेरे सामने रखता हूँ। जो कुछ मेरे अंदर तुझसे दूर खींचता है, जो मुझे स्वार्थ, घमंड या भय की ओर ले जाता है, उसे तू शांत कर दे। मुझे ऐसा जीवन जीना सिखा जिसमें मेरा भरोसा अपने बल पर नहीं, बल्कि तेरी सामर्थ पर टिका रहे। मेरे भीतर ऐसा परिवर्तन करता जा कि मेरा जीवन केवल नाम का नहीं, बल्कि सच में बदला हुआ दिखाई दे।

पिता, मैं चाहता हूँ कि मेरी चाल, मेरे शब्द और मेरे विचार तेरी उपस्थिति को दर्शाएँ। जब मैं कमजोर पड़ूँ, तब तू मेरी शक्ति बन। जब मैं भ्रम में पड़ूँ, तब तू मेरी समझ बन। जब मेरे भीतर अंधकार घिरने लगे, तब तू अपने सत्य से मुझे प्रकाश दे। मुझे ऐसा मन दे जो झुकना जानता हो, ऐसा हृदय दे जो सीखना चाहता हो, और ऐसी आत्मा दे जो तेरी अगुवाई के प्रति संवेदनशील रहे। मैं नहीं चाहता कि मेरा जीवन केवल बाहरी धार्मिकता तक सीमित रहे; मैं चाहता हूँ कि भीतर से नया जीवन बहता रहे।

वहीं हे मेरे पिता, आज मैं अपने परिवार और अपने प्रियजनों को भी तेरे हाथों में सौंपता हूँ। जिनसे मेरा हृदय जुड़ा है, जिनकी चिंता मुझे सताती है, जिनकी हँसी और जिनके आँसू मेरे अपने हैं, उन सबको तू अपनी छाया में रख। उनके शरीर को स्वस्थ रख, उनके मन को शांति दे और उनके मार्गों की रक्षा कर। जहाँ वे हों, जैसे हालात में हों, तू उनका रक्षक और सहायक बन। किसी अनदेखे खतरे से उन्हें बचा, किसी बीमारी से उन्हें दूर रख, और यदि वे किसी कठिनाई से गुजर रहे हों, तो उन्हें सहने की सामर्थ दे। पिता, मेरे घर में शांति बनाए रख। हमारे संबंधों में समझ और प्रेम बढ़ा। यदि कहीं तनाव, गलतफहमी या थकान हो, तो तू उसे अपने हाथ से छूकर ठीक कर दे। मेरे प्रियजनों के दिलों में भी भरोसा और आशा भर दे, ताकि वे अपने जीवन में तेरी भलाई को पहचान सकें। मुझे भी ऐसा बना कि मैं उनके लिए आशीष का कारण बनूँ, न कि बोझ का।

अंत में हे पिता, मैं यह दिन तेरे चरणों में धन्यवाद के साथ सौंपता हूँ। आज जो कुछ मैं करूँ, जहाँ कहीं जाऊँ, जो निर्णय लूँ उन सब में तू मेरी अगुवाई कर। यदि मैं भटकने लगूँ, तो मुझे वापस मोड़ देना। यदि मैं थक जाऊँ, तो मुझे थाम लेना। मेरा जीवन ऐसा हो कि उसमें तेरी महिमा दिखाई दे, न कि मेरी। इस नई सुबह को तू पिता अपने उद्देश्य से भर दे। मैं यह प्रार्थना पूरे भरोसे और नम्रता के साथ तेरे सामने येशु मसीह के नाम में रखता हूँ।

आमीन।

Post a Comment

Previous Post Next Post