अभिवादन और प्रस्तुति
मसीह में मेरे प्रिय भाइयों और बहनों,
तुम्हें हमारे प्रभु के नाम में शांति, आनंद और अनुग्रह मिले। तुमने अपने जीवन में परमेश्वर के वचन को थामे रहने का जो निश्चय किया है, वह सचमुच प्रशंसा के योग्य है। मैं यह आशा करता हूँ कि जिस प्रकाश में तुमने चलना आरंभ किया है, उसी में अंत तक स्थिर बने रहोगे। हमारा प्रभु, जो स्वयं ज्योति, सत्य और जीवन का मार्ग है, और जिसका वचन हमारे लिए उजियाले के समान है, उसकी महिमा युगानुयुग होती रहे।
आज हम परमेश्वर के वचन से एक ऐसे सत्य पर मनन करने जा रहे हैं जो हमारे दैनिक जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है। जीवन की हर सुबह एक नई यात्रा की तरह होती है, जहाँ हमें कदम-कदम पर निर्णय लेने होते हैं। यह यात्रा तभी सुरक्षित और अर्थपूर्ण बनती है जब हम अपने जीवन को अपनी समझ या संसार की रोशनी में नहीं, बल्कि परमेश्वर के वचन के प्रकाश में रखते हैं। इसलिए आइए, इस नए दिन को उसके चरणों में सौंपते हुए, उसके जीवित और सामर्थी वचन से सीखने के लिए अपने हृदय खोलें।
हमारा Today's Bible Verse in Hindi है भजन संहिता 119:105, जो हमें जीवन के मार्ग में सही दिशा और सच्चे सहारे की ओर ले जाता है। यह वचन हमें यह स्मरण दिलाता है कि हम इस संसार में अकेले और बिना मार्गदर्शन के नहीं चल रहे हैं। जब हमारे चारों ओर अनिश्चितता, भय और अँधेरा होता है, तब परमेश्वर का वचन हमारे लिए दीपक बनकर जलता है और हमें सुरक्षित मार्ग दिखाता है।
आज इस पद के माध्यम से हम यह सीखेंगे कि सच्ची सुरक्षा, सही दिशा और स्थिर जीवन उसी को मिलता है जो परमेश्वर के वचन को अपने पाऊं का दीपक और अपने मार्ग का उजियाला बना लेता है। आइए, इस सत्य को केवल सुनें नहीं, बल्कि अपने जीवन में अपनाएँ, ताकि हमारा हर दिन, हर कदम और हर निर्णय परमेश्वर की महिमा के लिए हो।
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शीर्षक : परमेश्वर का वचन, विश्वासियों के मार्ग का उजियाला
पुस्तक : भजनसंहिता
लेखक : राजा दाऊद
अध्याय : 119
वचन : 105
तेरा वचन मेरे पांव के लिये दीपक, और मेरे मार्ग के लिये उजियाला है। भजन संहिता 119:105
भजनसंहिता 119:105 - संदर्भ
भजन संहिता 119:105 का मूल इब्रानी (Hebrew) भाषा में विश्लेषण करने पर इसके अर्थ और भी गहरे होकर सामने आते हैं। मूल इब्रानी पाठ में यह वचन कुछ इस तरह है: "नैर-लिरगली दबेरेखा वेओर लिनतीबाती"। यहाँ प्रयुक्त प्रत्येक शब्द प्राचीन इस्राएली संस्कृति और उनकी सोच के एक विशिष्ट पहलू को उजागर करता है, जो अनुवाद में अक्सर पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाते।
इब्रानी शब्द 'नैर' (Ner) का अर्थ केवल एक सामान्य रोशनी नहीं, बल्कि एक खास तरह का मिट्टी का छोटा दीपक है। प्राचीन काल में ये दीपक हथेली जितने छोटे होते थे, जिनमें जैतून का तेल भरा जाता था और एक बत्ती जलती थी। यह 'नैर' बहुत ही सीमित क्षेत्र को प्रकाशित करता था। जब भजनकार कहता है कि तेरा वचन मेरे 'पांव' के लिए 'नैर' है, तो वह एक बहुत ही सूक्ष्म और व्यक्तिगत मार्गदर्शन की बात कर रहा है। इब्रानी सोच में इसका अर्थ यह है कि परमेश्वर का वचन हमें एक बार में पूरे जीवन का नक्शा नहीं देता, बल्कि वह हमें केवल अगला एक कदम उठाने के लिए पर्याप्त रोशनी देता है। यह मनुष्य को सिखाता है कि उसे हर कदम पर, हर पल, परमेश्वर पर निर्भर रहना होगा।
वचन के दूसरे भाग में प्रयुक्त शब्द 'ओर' (Or) और 'नतीबाह' (Netibah) अधिक व्यापक अर्थ रखते हैं। जहाँ 'नैर' एक छोटा दीपक है, वहीं 'ओर' शब्द का प्रयोग सूर्य की रोशनी या दिन के उजाले के लिए किया जाता है। यह एक ऐसी दिव्य ज्योति है जो पूरे परिदृश्य को स्पष्ट कर देती है। इसके साथ ही, 'मार्ग' के लिए इब्रानी शब्द 'नतीबाह' का अर्थ कोई चौड़ी सड़क नहीं, बल्कि एक संकरा, पीटा हुआ रास्ता या पगडंडी है जिसे लगातार चलने से बनाया गया हो। इब्रानी संदर्भ में इसका अर्थ यह निकलता है कि जब हम परमेश्वर के वचन के छोटे दीपक (नैर) के निर्देश पर एक-एक कदम बढ़ाते हैं, तो अंततः वह हमारे पूरे जीवन की पगडंडी (नतीबाह) को दिन के उजाले (ओर) की तरह स्पष्ट कर देता है।
एक और दिलचस्प भाषाई पहलू यह है कि इब्रानी में 'वचन' के लिए यहाँ 'दबार' (Dabar) शब्द का उपयोग हुआ है। 'दबार' का अर्थ केवल बोले गए शब्द नहीं हैं, बल्कि इसका अर्थ 'कार्य' या 'शक्ति' भी होता है। इब्रानी विचार में परमेश्वर का बोलना और उसका करना एक ही बात है। इसलिए, जब भजनकार वचन को दीपक कहता है, तो वह केवल कागज़ पर लिखे शब्दों की बात नहीं कर रहा, बल्कि उस सक्रिय ईश्वरीय शक्ति की बात कर रहा है जो वास्तव में हमारे जीवन की परिस्थितियों को बदलती है और अंधकार को मिटाती है। यह विश्लेषण स्पष्ट करता है कि यह वचन बौद्धिक ज्ञान के बारे में कम और परमेश्वर के साथ सक्रिय रूप से चलने के अनुभव के बारे में अधिक है।
भजनसंहिता 119:105 - टिप्पणी
तेरा वचन - यह वाक्य सीधे परमेश्वर से संवाद करता है और यह स्पष्ट करता है कि यहाँ किसी मनुष्य की बुद्धि, परंपरा या अनुभव की बात नहीं हो रही, बल्कि उस वचन की चर्चा है जो स्वयं परमेश्वर से निकलता है। यह वचन केवल सुनने या जानने की वस्तु नहीं है, बल्कि जीवन से जुड़ा हुआ सत्य है। जब मनुष्य “तेरा वचन” कहता है, तो वह यह स्वीकार करता है कि उसका मार्गदर्शन किसी बाहरी शक्ति से नहीं, बल्कि परमेश्वर की इच्छा से होना चाहिए। यह वचन अधिकार से भरा हुआ है और जीवन के हर क्षेत्र में दिशा देने वाला है।
मेरे पाऊं के लिए - यहाँ ध्यान सिर या आँखों पर नहीं, बल्कि पैरों पर दिया गया है। पैर चलने से जुड़े होते हैं, और चलना जीवन के व्यवहारिक पक्ष को दर्शाता है। इसका अर्थ यह है कि परमेश्वर का वचन केवल सोचने या समझने के लिए नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के कदमों के लिए है। मनुष्य हर दिन निर्णय लेता है, रास्ते चुनता है और आगे बढ़ता है। इन सभी में उसके “पैर” काम करते हैं। वचन उन पैरों के लिए है, ताकि जीवन की यात्रा सुरक्षित और सही दिशा में हो।
दीपक है - दीपक अँधेरे को दूर करता है, परंतु वह पूरे आकाश को रोशन नहीं करता, बल्कि उतनी ही रोशनी देता है जितनी अगले कदम के लिए आवश्यक हो। यही बात परमेश्वर के वचन पर लागू होती है। यह वचन पूरे भविष्य को एक साथ प्रकट नहीं करता, बल्कि समय-समय पर उतनी ही समझ देता है जितनी ज़रूरी हो। दीपक हाथ में लेकर चलना पड़ता है, उसे साथ रखना पड़ता है। इसी तरह वचन को भी जीवन में साथ लेकर चलना होता है, तभी उसकी रोशनी लाभदायक बनती है।
और मेरे मार्ग के लिए उजियाला - यह वाक्य पहले वाक्य को और गहरा करता है। यहाँ “मार्ग” पूरे जीवन-पथ को दर्शाता है, केवल एक कदम नहीं, बल्कि पूरी दिशा। उजियाला मार्ग को स्पष्ट करता है, यह दिखाता है कि कहाँ चलना है और कहाँ नहीं। यह उजियाला यह भी बताता है कि कौन-से रास्ते सही लगते हुए भी खतरनाक हो सकते हैं। जीवन में कई ऐसे मोड़ आते हैं जहाँ गलत और सही के बीच अंतर बहुत छोटा दिखाई देता है, परंतु वचन का उजियाला उस अंतर को स्पष्ट कर देता है।
इस संसार की तुलना अँधेरे स्थान से की जा सकती है, जहाँ बिना उजियाले के चलना जोखिम भरा है। पुराने समय में यात्री अपने साथ दीपक लेकर चलते थे, ताकि वे गड्ढों, गंदगी और टूटे रास्तों से बच सकें। यही स्थिति मनुष्य के जीवन की है। यदि परमेश्वर का वचन साथ न हो, तो वह अनजाने में ऐसे रास्तों पर चल पड़ता है जो अंत में दुख और हानि देते हैं।
परमेश्वर का वचन मनुष्य को यह भी दिखाता है कि उसके भीतर क्या कमी है। इसकी रोशनी में मनुष्य अपनी कमजोरी, गलतियाँ और अधूरापन पहचानता है। यह पहचान उसे निराश करने के लिए नहीं, बल्कि सही दिशा में ले जाने के लिए होती है। जब मनुष्य यह समझ लेता है कि वह अपने बल पर सही नहीं ठहर सकता, तब वह परमेश्वर की ओर अधिक भरोसे से देखता है।
यह वचन केवल चेतावनी नहीं देता, बल्कि सांत्वना भी देता है। जब चारों ओर अँधेरा छा जाता है, जब निर्णय कठिन हो जाते हैं और मन भय से भर जाता है, तब यही वचन दीपक बनकर मन को स्थिर करता है। यह बताता है कि रास्ता अभी समाप्त नहीं हुआ है और परमेश्वर साथ चल रहा है।
यह भी महत्वपूर्ण है कि यह उजियाला सबके लिए समान रूप से उपयोगी नहीं होता। जैसे दीपक अंधे व्यक्ति के लिए लाभदायक नहीं होता, वैसे ही वचन भी तभी मार्गदर्शन करता है जब मनुष्य उसे समझने और अपनाने के लिए तैयार हो। जब मन की आँखें खुलती हैं, तब यह वचन सजीव और प्रभावशाली बन जाता है।
भजनसंहिता 119:105 - भक्ति संदेश
मनुष्य का जीवन एक निरंतर यात्रा है। हर दिन हम किसी न किसी मार्ग पर चलते हैं, चाहे वह सोच का मार्ग हो, निर्णयों का मार्ग हो, या व्यवहार की दिशा हो। इस यात्रा में अँधेरा बार-बार आता है। कभी परिस्थितियों का अँधेरा, कभी मन की उलझन, कभी भय, कभी पाप का भ्रम, और कभी भविष्य की अनिश्चितता। ऐसे समय में यह वचन केवल पढ़ने का विषय नहीं रहता, बल्कि जीने की आवश्यकता बन जाता है। परमेश्वर का वचन जीवन के लिए वही है जो अँधेरी रात में चलने वाले यात्री के हाथ में जलता हुआ दीपक होता है।
जब मनुष्य इस संसार में चलता है, तो वह हर समय सही और गलत का अंतर स्पष्ट रूप से नहीं देख पाता। कई बार रास्ते सीधे दिखते हैं, पर अंत में वे खाई की ओर ले जाते हैं। परमेश्वर का वचन हमें यह सिखाता है कि हर चमकता हुआ मार्ग सुरक्षित नहीं होता। यही कारण है कि जो लोग वचन को अपने जीवन का सहारा बनाते हैं, वे दिखावे के पीछे नहीं दौड़ते, बल्कि सच्चाई को चुनते हैं, चाहे वह मार्ग संकरा और कठिन क्यों न हो।
पुराने समय में राजा दाऊद का जीवन इसका स्पष्ट उदाहरण है। वह केवल एक राजा नहीं था, बल्कि एक ऐसा व्यक्ति था जिसने अपने हर निर्णय में परमेश्वर से मार्गदर्शन माँगा। जब वह भय में था, जब शत्रु उसके पीछे लगे थे, जब उसे समझ नहीं आ रहा था कि आगे क्या करना है, तब उसने परमेश्वर के वचन में शरण ली। उसी वचन की रोशनी ने उसे यह सिखाया कि बदला लेना उसका काम नहीं, बल्कि परमेश्वर पर भरोसा करना ही सच्चा मार्ग है। यदि दाऊद केवल अपनी भावना के अनुसार चलता, तो उसका जीवन अँधेरे में खो सकता था, पर वचन का दीपक उसे संभालता रहा।
जीवन में लागू करने का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य को हर बात का उत्तर तुरंत मिल जाए। कई बार वचन केवल अगला कदम दिखाता है, पूरा मार्ग नहीं। यही विश्वास की परीक्षा होती है। इस्राएल की प्रजा जब जंगल में चल रही थी, तब उनके पास पूरा नक्शा नहीं था, पर परमेश्वर की उपस्थिति उन्हें प्रतिदिन दिशा देती थी। वैसे ही वचन हमें यह सिखाता है कि पूरे भविष्य को समझने की ज़िद छोड़कर, आज के दिन के लिए परमेश्वर पर भरोसा करना सीखें।
मनुष्य का स्वभाव अक्सर यह चाहता है कि वह पहले सब कुछ देख ले, फिर चले। पर परमेश्वर का तरीका यह है कि पहले चलो, और रोशनी साथ-साथ मिलती जाएगी। जब हम वचन को अपने जीवन में लागू करते हैं, तब हम यह स्वीकार करते हैं कि हमारा ज्ञान सीमित है, पर परमेश्वर की समझ पूर्ण है। यह नम्रता जीवन को सुरक्षित बनाती है।
परमेश्वर का वचन केवल बाहरी निर्णयों को ही नहीं, बल्कि मन की स्थिति को भी दिशा देता है। जब मन क्रोध से भर जाता है, तब वचन संयम सिखाता है। जब मन निराश होता है, तब वचन आशा देता है। जब मन घमंड से ऊँचा उठने लगता है, तब वचन हमें हमारी सच्ची स्थिति दिखाता है। इसी कारण यह केवल मार्ग का प्रकाश नहीं, बल्कि मन का दीपक भी है।
यूसुफ का जीवन इस बात का सुंदर उदाहरण है। जब वह अकेला था, परदेश में था, और परीक्षा के क्षण में था, तब उसके पास कोई मानवीय सहारा नहीं था। पर उसके भीतर परमेश्वर के प्रति भय और वचन की समझ थी। उसी आंतरिक प्रकाश ने उसे गलत कदम उठाने से रोका। यदि वह उस क्षण केवल परिस्थिति को देखता, तो उसका जीवन दूसरे मार्ग पर चला जाता। पर वचन का दीपक उसे सही राह पर बनाए रखता है, चाहे उस राह में दुख और प्रतीक्षा क्यों न हो।
आज के समय में भी मनुष्य अनेक आवाज़ों से घिरा हुआ है। समाज, विचारधाराएँ, सलाहें और भावनाएँ। सब मिलकर जीवन की दिशा तय करना चाहती हैं। ऐसे में परमेश्वर का वचन एक शांत और स्थिर प्रकाश की तरह है, जो शोर में भी स्पष्ट दिखाई देता है। जो व्यक्ति नियमित रूप से वचन के साथ समय बिताता है, उसके निर्णयों में जल्दबाज़ी नहीं होती, उसके कदमों में स्थिरता होती है, और उसके जीवन में एक अलग प्रकार की शांति दिखाई देती है।
वचन का जीवन में लागू होना केवल व्यक्तिगत भलाई तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दूसरों के साथ हमारे व्यवहार को भी बदल देता है। जब मनुष्य स्वयं प्रकाश में चलता है, तो वह दूसरों के लिए भी ठोकर का कारण नहीं बनता। वह कठोर नहीं, बल्कि करुणामय होता है। वह जल्दी दोष नहीं लगाता, बल्कि समझने का प्रयास करता है। यह परिवर्तन किसी बाहरी नियम से नहीं, बल्कि भीतर जलते हुए दीपक से आता है।
मूसा का जीवन भी यही दिखाता है। उसने परमेश्वर की उपस्थिति में समय बिताया, और उसी का प्रभाव उसके चेहरे और उसके नेतृत्व में दिखाई दिया। उसने अपने मार्ग में अनेक कठिनाइयाँ देखीं, पर वचन और परमेश्वर की बातों ने उसे सही दिशा दी। वह जानता था कि यदि प्रकाश उसके साथ है, तो अँधेरा उसे निगल नहीं सकता।
अंत में यह कहना उचित है कि परमेश्वर का वचन जीवन के लिए कोई अतिरिक्त वस्तु नहीं, बल्कि अनिवार्य आवश्यकता है। जैसे बिना प्रकाश के चलना खतरनाक है, वैसे ही बिना वचन के जीना आत्मिक रूप से असुरक्षित है। जब मनुष्य इस वचन को पढ़ता ही नहीं, बल्कि उसे अपनाता है, तब उसका जीवन एक संदेश बन जाता है। ऐसा जीवन दूसरों को भी यह दिखाता है कि अँधेरे संसार में भी एक सुरक्षित, सीधा और शांति से भरा मार्ग संभव है।
जो व्यक्ति परमेश्वर के वचन को अपने पैरों का दीपक और अपने मार्ग का उजियाला बनाता है, वह गिरता नहीं, भटकता नहीं, और अंत में उसी स्थान पर पहुँचता है जहाँ परमेश्वर ने उसे पहुँचाने का उद्देश्य रखा है। यही इस वचन का जीवित और प्रभावशाली संदेश है, जो हर युग और हर जीवन के लिए समान रूप से सत्य है।
भजनसंहिता 119:105 - प्रार्थना
हे मेरे स्वर्गीय पिता,
इस नई सुबह के लिए मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ। यह जीवन, यह श्वास, यह जागरण, सब तेरी ही दया का फल है। जब रात का अँधेरा बीत गया और तूने मुझे यह एक और दिन देखने का अवसर दिया, तब मैं यह स्वीकार करता हूँ कि तेरी करुणा हर भोर मेरे लिए नई हो जाती है। इस सुबह के प्रकाश के साथ मैं तेरा नाम ऊँचा करता हूँ और अपना हृदय तेरे सामने खोलता हूँ।
पिता, आज मैं अपने लिए प्रार्थना करता हूँ। जैसा कि तेरा वचन कहता है कि तेरा वचन मेरे पाऊं के लिए दीपक और मेरे मार्ग के लिए उजियाला है, वैसे ही आज मेरे जीवन में भी यही सत्य प्रकट हो। जब मैं दिन के मार्गों पर चलूँ, जब निर्णय लेने हों, जब शब्द बोलने हों और जब कदम बढ़ाने हों, तब मेरा सहारा मेरी समझ नहीं, बल्कि तेरा वचन हो। मुझे उस अँधेरे से बचा जिसमें मनुष्य बिना तेरी रोशनी के भटक जाता है। जब मेरे सामने ऐसे मार्ग आएँ जो देखने में सरल और आकर्षक हों, पर अंत में हानि देते हों, तब तेरा वचन मुझे सावधान करे और सही दिशा दिखाए।
पिता, मेरे भीतर जो डर, असमंजस और कमजोरी है, उन्हें तेरे वचन की रोशनी में उजागर कर और दूर कर। मुझे ऐसा हृदय दे जो तेरी बात सुन सके, और ऐसी आँखें दे जो तेरी राह को पहचान सकें। मुझे केवल सुनने वाला नहीं, बल्कि तेरे वचन पर चलने वाला बना। जब मैं थक जाऊँ, तब तेरा वचन मुझे स्थिर करे। जब मैं गिरने लगूँ, तब वही दीपक मुझे संभाले। मेरे हर कदम में तेरा उजियाला बना रहे।
अब, हे पिता, इसके साथ ही मैं अपने परिवार और अपने प्रियजनों को तेरे हाथों में सौंपता हूँ। उनके जीवन के मार्गों पर भी तेरा वचन दीपक बना रहे। उन्हें हर प्रकार की बीमारी, दुर्घटना और अनहोनी से सुरक्षित रख। उनके शरीर को स्वास्थ्य दे, उनके मन को शांति दे और उनके घरों को अपनी उपस्थिति से भर दे। जहाँ वे जाएँ, वहाँ तेरी रक्षा हो; जहाँ वे रहें, वहाँ तेरा उजियाला हो। यदि वे किसी अँधेरे से गुजर रहे हों, तो तेरा वचन उनके लिए मार्ग खोल दे और उन्हें वहां से सुरक्षित निकाल लाए।
पिता, मेरे घर में ऐसा वातावरण बना कि तेरा वचन केवल पुस्तक में नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में दिखाई दे। मेरे संबंधों में, मेरे व्यवहार में और मेरे निर्णयों में तेरा उजियाला झलके। मुझे ऐसा जीवन दे कि मैं इस संसार के अँधेरे में भी तेरी रोशनी का साक्षी बन सकूँ।
अंत में, हे पिता, मैं अपना पूरा दिन तेरे चरणों में रखता हूँ। जो मार्ग आज मेरे सामने है, उसे तू जानता है। मैं नहीं जानता कि हर मोड़ पर क्या होगा, पर मैं यह जानता हूँ कि यदि तेरा वचन मेरे साथ है, तो कोई अँधेरा मुझे गिरा नहीं सकता। मुझे अंत तक तेरे उजियाले में चलने का अनुग्रह दे। मैं यह सब प्रार्थना नम्र और विश्वास से भरे हृदय के साथ तेरे प्रिय पुत्र येशु मसीह के नाम में तेरे सामने रखता हूँ।
आमीन।
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