अभिवादन और प्रस्तुति
मसीह में मेरे सभी प्यारे भाइयों और बहनों, हमारे उद्धारकर्ता प्रभु यीशु मसीह के पवित्र और सामर्थी नाम में आप सभी को अनुग्रह और शांति मिले और आप अनंतजीवन के वारिश बनो जिसके लिए मसीह बलिदान हुए। वही प्रभु जो हमारे जीवन के कर्णधार हैं और जो हर नई सुबह हमें जीवन की सांस के साथ यह स्मरण कराते हैं कि हम अभी भी अनुग्रह के युग में हैं, जहाँ दया द्वार पर खड़ी है और प्रेम हमें आलिंगन के लिए पुकार रहा है। Today's bible reading in Hindi में आज के वचन में आज हम जिस वचन पर ध्यान करने जा रहे हैं, वह यूहन्ना 3:16 है, यह कोई साधारण वचन नहीं है। यह संपूर्ण सुसमाचार का निचोड़ है। या इस सुसमाचार का हृदय है जो एक ही स्थान में हमें परमेश्वर का पाप के प्रति घृणा, न्याय, क्षमा, और जगत के प्रति उनका असीमित प्रेम देखने मिलता है।
यह वचन वह दीपक है जो हमारे जीवन की अंधकारमय राहों में उजाला करता है, और साथ ही यह एक ऐसा आह्वान (बुलाहट) है जो हमारे हृदय की गहराईयों तक पहुँचता है।
मेरे प्यारों, यह वचन केवल किसी दूर 'संसार' के लिए नहीं है। यह मेरे लिए है, आपके लिए है, हम सब के लिए है। यह वचन हमें यह दिखाता है कि परमेश्वर का प्रेम न केवल महान है, बल्कि अत्यंत व्यक्तिगत है। यह केवल एक जानकारी नहीं, बल्कि एक निमंत्रण है, उस प्रेम को समझने, उसे स्वीकार करने, और मसीह पर अपना विश्वास दृढ़ करने का। आईए, इस अद्भुत वचन में छिपे न्याय, प्रेम, बलिदान और उद्धार के रहस्य को हम साथ मिलकर न केवल समझें, बल्कि उसे अपने जीवन का अंग बना लें, ताकि यह वचन केवल शब्द न रहे, बल्कि हमारे अस्तित्व की धड़कन बन जाए।
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शीर्षक : परमेश्वर का अनंत प्रेम
पुस्तक : यूहन्ना रचित सुसमाचार
लेखक : यूहन्ना
अध्याय : 3
वचन : 16
क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उस ने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए। यूहन्ना 3:16
यूहन्ना 3:16 - संदर्भ
यूहन्ना 3:16 मसीही विश्वास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है और इसे अक्सर पूरे पवित्रशास्त्र का सार कहा जाता है। लेकिन इस वचन की गहराई को समझने के लिए उसे उसके संदर्भ से अलग करके नहीं देखा जा सकता। यह वचन अचानक प्रकट नहीं होता, बल्कि एक गहरी आत्मिक बातचीत का परिणाम है, जिसमें मनुष्य की स्थिति, परमेश्वर की योजना और उद्धार का मार्ग स्पष्ट होता है।
यूहन्ना अध्याय 3 की पृष्ठभूमि में निकुदेमुस और यीशु की मुलाकात है। निकुदेमुस यहूदियों के धार्मिक अगुओं में से एक था, शास्त्रों का ज्ञाता और समाज में सम्मानित व्यक्ति। वह रात के समय येशु के पास आया, जिसका अर्थ केवल डर या सामाजिक दबाव ही नहीं, बल्कि यह भी दर्शाता है कि वह आत्मिक अंधकार में था और प्रकाश की खोज में था। वह यह स्वीकार करता है कि येशु के कार्य साधारण मनुष्य के नहीं हो सकते, क्योंकि ऐसे काम केवल परमेश्वर की सहायता से ही संभव हैं। इसी बातचीत में यीशु उसे यह सिखाते हैं कि केवल बाहरी धार्मिकता या वंश पर्याप्त नहीं है, बल्कि मनुष्य को भीतर से नया बनाया जाना आवश्यक है।
यूहन्ना 3:16 से ठीक पहले येशु पुराने नियम की एक घटना का उल्लेख करते हैं, जो इस वचन को समझने की कुंजी है। जंगल में इस्राएली लोग अपने अविश्वास और कुड़कुड़ाने के कारण दंड भोग रहे थे और सांपों के डसने से मर रहे थे। परमेश्वर ने मूसा के माध्यम से एक ऐसा उपाय दिया जो मानव बुद्धि से परे था। जिसने भी विश्वास के साथ उस ऊंचे उठाए गए चिन्ह की ओर देखा, वह जीवित रहा। येशु इस घटना को अपने आने वाले कार्य से जोड़ते हैं और बताते हैं कि जैसे वह चिन्ह जीवन का माध्यम बना, वैसे ही मनुष्य का पुत्र भी ऊंचा उठाया जाएगा, ताकि देखने और विश्वास करने वाला नाश से बचे।
यूहन्ना 3:16 - टिप्पणी
क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा - यह वाक्य सम्पूर्ण सुसमाचार का केन्द्र और आधार है। यहाँ “प्रेम” किसी क्षणिक भावना या भावुकता को नहीं दर्शाता, बल्कि परमेश्वर की स्थिर, गहरी और सक्रिय इच्छा को प्रकट करता है। यह प्रेम इस कारण नहीं है कि संसार योग्य था, बल्कि इस कारण है कि संसार अत्यन्त आवश्यकता में था। मनुष्य परमेश्वर से अलग हो चुका था, पाप के अधीन था, और अपने स्वभाव के कारण नाश की ओर बढ़ रहा था। फिर भी परमेश्वर का प्रेम ऐसा नहीं था जो केवल अच्छे, धार्मिक या योग्य लोगों तक सीमित रहता, बल्कि ऐसा प्रेम था जो गिरे हुए, बिगड़े हुए और मरते हुए संसार की ओर बढ़ा।
यह प्रेम किसी मनुष्य के कामों पर आधारित नहीं है। परमेश्वर मनुष्य के पाप से प्रसन्न नहीं था, न ही उसके विद्रोह को स्वीकार करता था, फिर भी वह मनुष्य के प्रति भलाई की इच्छा रखता था। जैसे एक माता-पिता अपने बच्चे के गलत आचरण से दुखी हो सकते हैं, पर फिर भी उसका भला चाहते हैं, वैसे ही परमेश्वर पाप से घृणा करता है, लेकिन पापी से प्रेम करता है। यह प्रेम न्याय को मिटाता नहीं, बल्कि उद्धार का मार्ग खोलता है। यह प्रेम इतना व्यापक, इतना गहरा और इतना असीम है कि वह हर स्थिति को सँभालने में सक्षम है। यह प्रेम सबसे बुरे, सबसे तिरस्कृत, सबसे टूटे हुए और सबसे निराश मनुष्य तक भी पहुँच सकता है। संसार की कोई भी स्थिति, कोई भी गिरावट, इस प्रेम से बाहर नहीं है।
जगत से - “जगत” शब्द यहाँ बहुत सोच-समझकर प्रयोग किया गया है। इसका अर्थ केवल यहूदी जाति नहीं है, न ही केवल कोई सीमित धार्मिक समूह। यह शब्द उस पूरी मानवता की ओर संकेत करता है जो परमेश्वर से अलग थी। विशेष रूप से, यह उस यहूदी सोच का खंडन करता है जो मानती थी कि परमेश्वर का प्रेम और उद्धार केवल इस्राएल के लिए है और अन्य जातियाँ केवल न्याय और विनाश के लिए हैं। येशु यह बात एक यहूदी गुरु, निकुदेमुस, से कह रहे हैं। इसलिए इस शब्द का प्रभाव और भी गहरा है। इसका अर्थ है कि परमेश्वर का प्रेम उन तक भी पहुँचता है जिन्हें यहूदी “संसार” कहकर बाहर और तुच्छ समझते थे। यह प्रेम सीमाओं को तोड़ता है चाहे वो सीमा जाति की हो, परंपरा की हो या धार्मिक घमंड की।
यह जगत ऐसा संसार नहीं है जो परमेश्वर का मित्र हो, बल्कि ऐसा जगत है जो उससे विद्रोह में था। फिर भी वही जगत या संसार परमेश्वर के प्रेम का पात्र बना। यह बात इस प्रेम को और भी महान बनाती है।
कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया - परमेश्वर का प्रेम केवल शब्दों में नहीं रहा, बल्कि उसने उसे कार्य में प्रकट किया। “उसने दिया”यह प्रेम का सबसे ठोस और निर्णायक प्रमाण है। यह देना किसी दबाव में नहीं था, न ही किसी कर्तव्य के कारण। मनुष्य का परमेश्वर पर कोई अधिकार नहीं था। यह पूरी तरह से स्वतंत्र, बिना योग्यता का और अनुग्रह से भरा हुआ देना था। यह पुत्र कोई साधारण व्यक्ति नहीं, बल्कि परमेश्वर का एकलौता पुत्र है जो उसकी सच्ची प्रतिमा या यू कहे उसका स्वरूप है, उसका प्रिय, उसका अनन्त पुत्र। जैसे अब्राहम अपने एकलौते पुत्र को देने को तैयार था, वैसे ही परमेश्वर ने अपने पुत्र को सचमुच दे दिया। फर्क यह है कि अब्राहम को रोक लिया गया, लेकिन परमेश्वर ने अपने पुत्र को नहीं रोका।
यह देना क्रूस की ओर ले जाने वाला देना था। यह पीड़ा, अपमान और मृत्यु का मार्ग था। परमेश्वर ने अपने पुत्र को मनुष्यों के हाथों में सौंप दिया, ताकि वह उनके स्थान पर दुःख उठाए। यह प्रेम की सबसे ऊँची अभिव्यक्ति है, जिसकी कल्पना मनुष्य कर सकता है लेकिन पूरी तरह नहीं।
ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे - यहाँ उद्धार का द्वार सबके लिए खुला है, लेकिन शर्त स्पष्ट है और वो है विश्वास। “जो कोई” यह दिखाता है कि कोई भी बाहर नहीं रखा गया, लेकिन “विश्वास करे” यह बताता है कि उद्धार स्वतः नहीं मिलता। यह विश्वास केवल मुँह से मान लेने का नाम नहीं है, बल्कि अपने पूरे जीवन को उसी पर टिका देने का नाम है। यह ऐसा विश्वास है जिसमें मनुष्य अपने आप पर भरोसा छोड़ देता है और परमेश्वर की दी हुई व्यवस्था को स्वीकार करता है जो क्रूस जड़ित येशु मसीह में विश्वास करना है। जैसे अब्राहम ने अपनी पूरी आशा परमेश्वर पर रखी, वैसे ही विश्वास करने वाला अपने उद्धार का भार परमेश्वर पर छोड़ देता है।
यह विश्वास परमेश्वर के प्रेम के प्रकट होने पर प्रतिक्रिया है। यह प्रेम को स्वीकार करना है, न कि अपने कामों के द्वारा उसे कमाने की कोशिश करना।
वह नाश न हो - नाश यहाँ कोई अचानक दिया गया दंड नहीं है, बल्कि पाप का स्वाभाविक परिणाम है। यदि मनुष्य को उसके हाल पर छोड़ दिया जाए, तो पाप उसे धीरे-धीरे विनाश की ओर ले जाता है। यह प्रक्रिया पहले से चल रही थी। संसार पहले से ही नाश की ओर बढ़ रहा था। लेकिन परमेश्वर का प्रेम इस प्रक्रिया को रोकने के लिए आया है। यह नाश अपरिहार्य नहीं है। कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जिसे पहले से ही बाहर कर दिया गया हो। समस्या यह नहीं है कि परमेश्वर बचाना नहीं चाहता, बल्कि यह है कि मनुष्य उस उपाय को स्वीकार करता है या नहीं जो परमेश्वर ने दिया है।
परन्तु अनन्त जीवन पाए - अनन्त जीवन केवल समय की लंबाई नहीं है, बल्कि जीवन की गुणवत्ता है। यह ऐसा जीवन है जो परमेश्वर के साथ संबंध में शुरू होता है और मृत्यु से समाप्त नहीं होता। यह अनुग्रह का जीवन है जो इस संसार में शुरू होता है और आगे चलकर पूर्णता में पहुँचता है। यह जीवन किसी मनुष्य के कामों का फल नहीं है, बल्कि परमेश्वर की दया और उसके पुत्र के बलिदान का परिणाम है। जो इसे स्वीकार करता है, वह केवल भविष्य में ही नहीं, बल्कि अभी से एक नए जीवन में प्रवेश करता है। इस प्रकार यूहन्ना 3:16 यह प्रकट करता है कि उद्धार की पूरी योजना प्रेम से शुरू होती है, विश्वास के द्वारा ग्रहण की जाती है, और अनन्त जीवन में पूरी होती है। यह पद परमेश्वर के हृदय को खोल देता है और मनुष्य के सामने स्पष्ट चुनाव रखता है। परमेश्वर ने प्रेम किया है, उसने दिया है, अब प्रश्न यह है कि मनुष्य उस पर विश्वास करेगा या नहीं।
यूहन्ना 3:16 - भक्ति संदेश
यह वचन मनुष्य को सबसे पहले यह सिखाता है कि उसका जीवन किसी दुर्घटना का परिणाम नहीं है, बल्कि एक गहरे उद्देश्य के भीतर रखा गया एक उपहार है। जब मनुष्य अपने जीवन को केवल संघर्षों, असफलताओं और अपराधबोध की दृष्टि से देखता है, तब वह स्वयं को व्यर्थ समझने लगता है। पर यह वचन हमें याद दिलाता है कि मानव जीवन की कीमत उसके कार्यों से नहीं, बल्कि उस प्रेम से आँकी जाती है जिसके अंतर्गत उसे बुलाया गया है। यह समझ मनुष्य के भीतर आत्म-घृणा को तोड़ती है और उसे यह स्वीकार करना सिखाती है कि वह अनुग्रह का पात्र है, चाहे उसका अतीत कैसा भी क्यों न रहा हो।
जीवन में इसका पहला प्रभाव यह होता है कि मनुष्य डर से मुक्त होने लगता है। बहुत से लोग परमेश्वर को केवल न्यायी, कठोर और दंड देने वाले के रूप में देखते हैं। वे यह मानते हैं कि परमेश्वर उनके जीवन की हर गलती पर घात लगाए बैठा है। लेकिन यह वचन मनुष्य के भीतर यह साहस भरता है कि परमेश्वर का पहला उद्देश्य नाश नहीं, बल्कि जीवन है। यही कारण है कि येशु के पास आने वाले टूटे हुए लोग उससे भागे नहीं, बल्कि उसकी ओर खिंचे चले आए। व्यभिचार में पकड़ी गई स्त्री, चुंगी लेने वाला जक्कई, और क्रूस पर लटका हुआ अपराधी, इन सबने यही अनुभव किया कि दया पहले आती है, निर्णय बाद में।
यह वचन मनुष्य को यह भी सिखाता है कि सच्चा भरोसा केवल धार्मिक जानकारी रखने से नहीं आता है। बहुत से लोग धार्मिक भाषा जानते हैं, शास्त्र पढ़ते हैं, पर भीतर से खाली रहते हैं। यहाँ जीवन का मार्ग उस भरोसे की बात करता है जो पूरे अस्तित्व को सौंप देता है। यह वही भरोसा है जो अब्राहम ने दिखाया था, जब उसे यह नहीं पता था कि आगे क्या होगा, फिर भी उसने अपने कदम रोक नहीं लिए। आज के जीवन में यह हमें सिखाता है कि भविष्य की अनिश्चितता के बावजूद, सही मार्ग पर चलने का साहस रखें।
यह संदेश मनुष्य के भीतर यह समझ भी उत्पन्न करता है कि विनाश कोई बाहर से थोपी गई सज़ा नहीं, बल्कि मनुष्य के स्वयं के भीतर से उपजा हुआ परिणाम है। जब मनुष्य सच्चाई से मुँह मोड़ता है, तो अंधकार अपने आप उसे घेर लेता है। जैसे एक व्यक्ति यदि जानबूझकर रोशनी से दूर किसी गड्ढे में उतर जाए, तो गिरना तय है। यह वचन चेतावनी भी है और निमंत्रण भी। चेतावनी इसलिए कि सत्य को ठुकराने का मूल्य चुकाना पड़ता है, और निमंत्रण इसलिए कि लौटने का मार्ग अभी खुला है।
जीवन में इसका एक गहरा प्रयोग यह है कि मनुष्य दूसरों को भी उसी दृष्टि से देखने लगता है। यदि उसे यह अनुभव हो गया है कि उसे बिना योग्य हुए स्वीकार किया गया है, तो वह दूसरों को भी केवल उनके दोषों से नहीं तौलेगा। यही कारण है कि प्रेरित पौलुस, जो कभी विश्वासियों को सताने वाला था, बाद में सबसे बड़ा सेवक बन गया। उसने अपने पत्रों में बार-बार यह लिखा कि वह जो कुछ भी है, वो अनुग्रह के कारण है। यह सोच मनुष्य को कठोर न्यायाधीश बनने से बचाती है और उसे सहानुभूति से भर देती है।
इतिहास में भी इसके उदाहरण मिलते हैं। ऑगस्टीन, जो अपने युवावस्था में भटकाव भरा जीवन जी रहा था, जब इस सत्य से टकराया, तो उसका जीवन पूरी तरह बदल गया। उसने बाद में लिखा कि उसका हृदय तब तक अशांत रहा जब तक उसे विश्राम नहीं मिला। यह विश्राम किसी दर्शन या नियम से नहीं, बल्कि उस जीवन से आया जो भीतर से नया कर देता है जो येशु से हमे मिलता है। इसी प्रकार जॉन न्यूटन, जो कभी दास व्यापार में शामिल था, जब इस सच्चाई को समझ पाया, तो उसका जीवन पश्चाताप और सेवा में बदल गया, और वही व्यक्ति आगे चलकर “अमेज़िंग ग्रेस” जैसा भजन लिख पाया।
यह वचन मनुष्य को वर्तमान में जीना भी सिखाता है। अनन्त जीवन केवल मृत्यु के बाद की आशा नहीं, बल्कि अभी शुरू होने वाला संबंध है। इसका अर्थ यह है कि क्षमा, शांति और नया स्वभाव केवल भविष्य की बातें नहीं हैं। जब मनुष्य इस सत्य को स्वीकार करता है, तो उसके रिश्ते बदलने लगते हैं, उसकी प्राथमिकताएँ बदलती हैं, और उसके निर्णयों में स्थायित्व आने लगता है। वह जो पहले अपने ही लिए जीता था अब केवल अपने लिए नहीं जीता, बल्कि उस जीवन को सामाजिक कार्य में भलाई कर के प्रतिबिंबित करता है जो उसे दिया गया है।
यह संदेश विशेष रूप से उस समय प्रासंगिक हो जाता है जब संसार डर, हिंसा और निराशा से भरा हुआ दिखाई देता है। जब समाचार केवल विनाश की बातें करते हैं, तब यह वचन मनुष्य को याद दिलाता है कि अंधकार अंतिम सत्य नहीं है। प्रकाश आ चुका है, और वह अभी भी काम कर रहा है। यही कारण है कि मदर टेरेसा जैसे लोग सबसे अंधेरी जगहों में भी आशा का दीपक बन सके। वे किसी राजनीतिक शक्ति से नहीं, बल्कि भीतर जले उस प्रेम से प्रेरित थे जो सेवा में ढल गया।
अंततः यह वचन मनुष्य को चुनाव की गंभीरता का एहसास कराता है। जीवन तटस्थ नहीं है। हर दिन, हर निर्णय, हर प्रतिक्रिया किसी न किसी दिशा में हमें ले जाती है। या तो मनुष्य सत्य की ओर झुकता है, या उससे दूर जाता है। यह वचन किसी पर दबाव नहीं डालता, पर जिम्मेदारी अवश्य देता है। यह कहता है कि मार्ग दिखा दिया गया है, द्वार खुला है, अब कदम रखने का निर्णय तुम्हारा है। इस प्रकार यह संदेश केवल पढ़ने या सुनने के लिए नहीं, बल्कि जीने के लिए है। यह मनुष्य को भय से विश्वास की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर, और निराशा से जीवन की ओर बुलाता है। और यह कि मनुष्य स्वयं बदले, और उसी बदले हुए जीवन के द्वारा दूसरों के लिए भी आशा का कारण बने।
यूहन्ना 3:16 - जीवन में प्रयोग
यह वचन जीवन को देखने की दृष्टि को बदल देता है। यह मनुष्य को यह स्मरण कराता है कि उसका मूल्य उसकी सफलताओं या असफलताओं से नहीं, बल्कि उस प्रेम से तय होता है जिसके अंतर्गत उसे बुलाया गया है। जब व्यक्ति स्वयं को अयोग्य, दोषी या टूटा हुआ महसूस करता है, तब यह वचन उसे आश्वस्त करता है कि जीवन का उद्देश्य नाश नहीं, बल्कि नया जीवन है जो उसे क्रूस पर दिया गया है। यह सत्य भय को कम करता है और मन में भरोसा जगाता है।
यह वचन यह भी सिखाता है कि जीवन केवल अपने बल पर सँभालने की वस्तु नहीं है। विश्वास का अर्थ है अपने भार को येशु पर छोड़ देना और उस दिए गए जीवन को स्वीकार करना जो भीतर से परिवर्तन लाता है। यह मनुष्य को अंधकार से दूर होकर सत्य की ओर चलने के लिए प्रेरित करता है। दैनिक जीवन में इसका अर्थ है क्षमा को अपनाना जैसे हमें क्षमा किया गया है, दूसरों को आशा की दृष्टि से देखना, और ऐसे निर्णय लेना जो जीवन की ओर ले जाएँ। यह वचन मनुष्य को प्रेम में स्थिर रहने और अपने जीवन के द्वारा उसी प्रेम को प्रकट करने की चुनौती देता है।
यूहन्ना 3:16 - जीवन में लागू करना
इस वचन को जीवन में लागू करने की शुरुआत अपने मूल्य को सही दृष्टि से देखने से होती है। जब आत्मग्लानि, असफलता या अतीत की गलतियाँ मन को दबाने लगें, तब स्वयं को यह स्मरण कराना आवश्यक है कि जीवन को त्याग के लिए नहीं, बल्कि बचाए जाने के लिए चुना गया है। यह सोच आत्म-निराशा से बाहर निकलने में सहायता करती है।
इसे लागू करने का अगला कदम है भरोसे को कर्मों से अधिक संबंध पर आधारित करना। इसका अर्थ है हर परिस्थिति में अपने बल पर नियंत्रण रखने के प्रयास को छोड़कर, निर्णयों और भविष्य को विश्वास के साथ सौंपना। कठिन समय में घबराने के बजाय शांति से आगे बढ़ना इसी भरोसे का व्यावहारिक रूप है। और जब हम इसे जीवन में लागू करते हैं तब यह दूसरों के प्रति व्यवहार में भी दिखता है। क्षमा न कर पाने की जगह क्षमा को चुनना, नफरत की जगह प्रेम को अपनाना जैसे क्रूस पर हमें प्रेम किया गया, तुरंत न्याय करने की जगह धैर्य रखना, और टूटे लोगों से दूरी बनाने की बजाय उन्हें समझने का प्रयास करना इस वचन का जीवन में उतरना है।
अंततः, इसे जीवन में लागू करना एक ऐसा जीवन जीना है जो विनाश की ओर नहीं, बल्कि आशा, परिवर्तन और जीवन की दिशा में बढ़ता रहे।
यूहन्ना 3:16 - कुछ सवाल खुद से पूछे
1) जब मैं यह सुनता हूँ कि “परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा,” तो क्या मैं सच में विश्वास करता हूँ कि उस “संसार” में मैं भी शामिल हूँ?
2) क्या मैंने अपने जीवन में कभी यह महसूस किया है कि परमेश्वर का प्रेम मेरे योग्य न होते हुए भी मुझ तक पहुँचा?
3)“जो कोई उस पर विश्वास करे” क्या मेरा विश्वास केवल शब्दों में है, या मेरे निर्णयों और जीवन-शैली में भी दिखाई देता है?
4) क्या मैं आज भी अपने दोषों, अपराधबोध या भय के कारण यह सोचता हूँ कि मैं अनन्त जीवन के योग्य नहीं हूँ, या मैं मसीह की दी हुई प्रतिज्ञा पर भरोसा करता हूँ?
5) क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम किया, क्या मैं भी दूसरों को उसी दृष्टि से देखता हूँ?
यूहन्ना 3:16 - प्रार्थना
हे मेरे प्रेमी परमेश्वर,
जब जब मैं इस वचन को पढ़ता हूँ , जिसे तूने अपने अति प्रिय पुत्र येशु के मुख से कहा है कि " परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया”। वाकई यह सुनकर मेरा हृदय कांप उठता है। और मैं इस आश्चर्य में पड़ जाता हूं कि क्या ऐसा भी हो सकता है? कि तूने इस टूटी, बगावती, तुझसे दूर भागती दुनिया से इतना प्रेम किया? जिसमें मुझे भी शामिल किया। मैं जो कई बार तुझसे दूर भागा, मैं जो कई बार अपने पापों में उलझा रहा, पर फिर भी तूने मुझे नहीं छोड़ा और तूने मुझे उस समय भी प्रेम किया जब मैं अपने आप को प्रेम करने के योग्य भी नहीं समझता था।
हे पिता, तेरा प्रेम कोई साधारण भावना नहीं थी। यह क्रूस पर लहूलुहान होता हुआ प्रेम था, जो दर्द से भरा हुआ था फिरभी मेरे लिए तूने अपने इकलौते पुत्र को दे दिया मेरे लिए बलिदान होने के लिए। जब मैं यह सोचता हूँ कि तूने अपने बेटे को इसलिए दिया ताकि मैं नाश न हो जाऊं, तो मेरी आत्मा में एक गहरा कंपन उठ खड़ा होता है। हे दयालु पिता तेरा प्रेम महज़ कोमल नहीं है बल्कि यह दृढ़ है, बलिदानी है, और पवित्र भी है।
हे पिता मैं अब मानता हु, कि मेरा सबसे बड़ा उपहार येशु ही है, वही मेरा रास्ता है जिसने मेरी मृत्यु को अपनी मृत्यु में ले ली, ताकि मैं अपना जीवन उसके जीवन में पा सकूं। और हे पिता तूने मुझे यह जीवन तेरे पुत्र में मुझे बिना शर्त दिया है। क्या मैंने कभी ऐसा विश्वास दिखाया? क्या मैंने तुझ पर वैसा भरोसा किया जैसा तू योग्य है? फिर भी तू इन कमजोर हाथों को थामें रहता है। तू मेरी टूटी हुई प्रार्थनाओं को सुनता है। तू मेरी खामोशी में बोलता है। तू कहता है: “जो कोई मुझ पर विश्वास करेगा, वह नाश नहीं होगा।” और मैं रो पड़ता हूँ, क्योंकि मैं जानता हूँ कि मेरा विश्वास भी तेरे ही अनुग्रह का फल है।
हे दयालु और अनुग्रह कारी परमेश्वर मैं तुझसे विनती करता हूँ कि इस वचन को सिर्फ मेरे मन में नहीं, मेरे अस्तित्व में बसा दे। और जब दुनिया का डर मुझे निगलने आए, या जब शैतान मुझे यह याद दिलाए कि मैं कितना पापी हूँ, तो तू मुझे यह याद दिला कि मैं वह हूँ जिसे तूने इतना प्रेम किया कि तूने मेरे लिए अपना इकलौता पुत्र दे दिया।” मुझे इस वचन में रोज़ जीने दे। हे पिता, मेरे विचारों, निर्णयों और मार्गों को शुद्ध कर जैसा तेरा प्रिय पुत्र है। और जब मैं कमजोर पड़ता हूँ, तब मुझे यह स्मरण दिला कि जीवन का स्रोत जो येशु है वो मेरे भीतर कार्य कर रहा है। और मुझे ऐसा जीवन जीने में सहायता कर जो केवल मेरे लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए भी आशा का कारण बने जैसे तेरा एकलौता पुत्र सारे संसार के लिए बना। हे पिता, मेरे भीतर ऐसा परिवर्तन कर कि मेरा जीवन तेरे दिए हुए अनन्त जीवन की गवाही बन जाए।
हे दयालु पिता, अंत में मैं अपने आप को फिर से तेरे सामने नम्रता के साथ झुकाता हूँ। और पिता, जो जीवन तूने मुझे दिया है, वह व्यर्थ न जाए। मेरा विश्वास बना रहे, मेरा मार्ग सीधा हो, और मेरा अंत जीवन में हो, न कि विनाश में। यह प्रार्थना मैं उसी भरोसे के साथ करता हूँ, जो यह जानता है कि तू सुनता है, स्वीकार करता है, और जीवन देता है। तेरे एकलौते आज्ञाकारी प्रिय पुत्र येशु के नाम में यह प्रार्थना करता हूं।
आमीन।

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