Today's Bible Reading in Hindi - 1 शमूएल 2:2

अभिवादन और प्रस्तुति 

मसीह में प्रिय आत्मीय जनो, आज की इस नई सुबह में आप सभी का हार्दिक स्वागत है। आप सभी मसीह के नाम में अनुग्रह और शांति मिले। वह जो पवित्र और हमारी अटल चट्टान है उसी की स्तुति होती रहे। प्रियों यह दिन हमें फिर से आज एक अवसर देता है कि हम अपने मन और हृदय को परमेश्वर की ओर मोड़ें, उसकी उपस्थिति में ठहरें और उसके वचन से जीवन के लिए मार्गदर्शन प्राप्त करें। संसार की भागदौड़ और अनिश्चितताओं के बीच, परमेश्वर का यह वचन हमें स्थिरता, शांति और सच्ची आशा प्रदान करता है।

Today's bible reading in Hindi में आज के हमारे बाइबल पाठ में हम एक ऐसे वचन पर आज मनन करने जा रहे हैं जो हमें परमेश्वर के स्वभाव की गहराई से पहचान कराता है। यह वचन हमें स्मरण दिलाता है कि यहोवा अपने आप में पूर्ण, पवित्र और अद्वितीय है। उसके तुल्य न कोई है और न हो सकता है। यह सत्य न केवल हमारी सोच को शुद्ध करता है, बल्कि हमारे विश्वास की नींव को भी दृढ़ करता है। यह पाठ हमें यह भी सिखाता है कि जब जीवन की परिस्थितियाँ बदलती हैं, जब हमारे चारों ओर की चीज़ें अस्थिर लगती हैं, तब भी परमेश्वर अडिग बना रहता है। वह चट्टान के समान है जो स्थिर, भरोसेमंद और सभी रीति से सुरक्षित है। जो उसके पास शरण लेते हैं, उन्हें कभी निराश नहीं होना पड़ता।

तो आइए, आज के इस बाइबल पाठ को खुले मन और नम्र हृदय के साथ पढ़ें और प्रार्थना करें कि परमेश्वर हमें अपने वचन के द्वारा छुए, हमारी समझ को खोले और हमारे जीवन में अपनी पवित्रता, स्थिरता और भरोसे को स्थापित करे। आज का यह वचन हमारे लिए केवल पढ़ने का विषय न रहे, बल्कि हमारे जीवन का आधार बन जाए।

Today's Bible Reading in Hindi - 1 शमूएल 2:2

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शीर्षक : एकमात्र पवित्र प्रभु और अटल चट्टान

पुस्तक : 1 शमूएल

लेखक : शमूएल 

अध्याय : 1 शमूएल 2

वचन : 2

यहोवा के तुल्य कोई पवित्र नहीं, क्योंकि तुझ को छोड़ और कोई है ही नहीं; और हमारे परमेश्वर के समान कोई चट्टान नहीं है। 1 शमूएल 2:2

1 शमूएल 2:2 - संदर्भ 

 1 शमूएल 2:2 का यह वचन हन्ना की प्रार्थना, जिसे हन्ना का गीत भी कहा जाता है, का एक केन्द्रीय भाग है। यह गीत बाइबल के सबसे गहरे, भावपूर्ण और भक्तिपूर्ण गीतों में गिना जाता है। यह केवल व्यक्तिगत धन्यवाद का गीत नहीं, बल्कि परमेश्वर के स्वभाव, उसके कार्यों और उसके न्यायपूर्ण शासन की एक गहरी घोषणा है। इस वचन को सही रूप से समझने के लिए हन्ना के जीवन की परिस्थितियों और उस समय की सामाजिक तथा आत्मिक पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक है।

हन्ना एलकाना की पत्नी थी और वह बाँझ थी। उस समय के समाज में बाँझपन को केवल शारीरिक समस्या नहीं, बल्कि अपमान और कभी-कभी परमेश्वर की अप्रसन्नता के रूप में देखा जाता था। एलकाना की दूसरी पत्नी पनिन्ना, जिसके बच्चे थे, हन्ना को बार-बार ताना देती और उसके दुःख को और बढ़ाती थी। इस निरंतर मानसिक पीड़ा और अपमान के बीच हन्ना का हृदय टूट चुका था, पर उसने अपनी पीड़ा को कड़वाहट में नहीं बदला, बल्कि उसे प्रार्थना में उँडेल दिया। वह शीलो में यहोवा के मंदिर में गई और अत्यंत गहरे मन से रोते हुए प्रार्थना की, और मन्नत मानी कि यदि यहोवा उसे पुत्र देगा, तो वह उसे जीवन भर के लिए यहोवा को समर्पित कर देगी।

परमेश्वर ने उसकी प्रार्थना सुनी और उसे शमूएल नाम का पुत्र दिया। जब शमूएल का दूध छुड़ाया गया, तब हन्ना ने अपने वचन के अनुसार उसे यहोवा के मंदिर में याजक एली के पास छोड़ दिया। यह क्षण मानवीय दृष्टि से अत्यंत भावुक और पीड़ादायक हो सकता था, क्योंकि वह अपने इकलौते पुत्र को अपने से अलग कर रही थी। फिर भी, उस क्षण में उसके मुख से विलाप नहीं, बल्कि आनंद और स्तुति का गीत निकला। यह दर्शाता है कि उसका विश्वास परिस्थितियों पर नहीं, बल्कि परमेश्वर के स्वभाव पर आधारित था।

इसी स्तुति के बीच 1 शमूएल 2:2 आता है, जहाँ हन्ना परमेश्वर के तीन महान गुणों की घोषणा करती है। जब वह कहती है कि यहोवा के समान कोई पवित्र नहीं है, तो वह यह स्वीकार कर रही है कि परमेश्वर की पवित्रता अद्वितीय और पूर्ण है। उसने अपने अनुभव से जाना कि परमेश्वर न केवल नैतिक रूप से शुद्ध है, बल्कि वह ऐसा परमेश्वर है जो दीन और टूटे हुए मनुष्यों की सुनता है और असंभव परिस्थितियों में भी कार्य करता है। उसकी पवित्रता उसके कार्यों में दिखाई देती है, विशेषकर उस अनुग्रह में जिसके द्वारा उसने हन्ना की लज्जा को आनंद में बदल दिया।

1 शमूएल 2:2 - टिप्पणी

यहोवा के तुल्य कोई पवित्र नहीं - यह वाक्य किसी सैद्धान्तिक घोषणा से अधिक, एक गहरे व्यक्तिगत और ऐतिहासिक अनुभव का निष्कर्ष है। यहाँ पवित्रता को केवल अलगाव या नैतिक शुद्धता के अर्थ में नहीं समझना चाहिए, बल्कि यह परमेश्वर के सम्पूर्ण स्वभाव की झलक है, जो उसके हर काम, हर निर्णय और हर मार्ग में प्रकट होती है। यहोवा की पवित्रता यह दिखाती है कि वह अपने आप में पूर्ण है, किसी से प्राप्त की हुई नहीं, किसी पर निर्भर नहीं और कभी बदलने वाली नहीं। मनुष्य या स्वर्गदूत चाहे जितने ऊँचे क्यों न हों, उनकी पवित्रता सीमित है, मिली हुई है और स्थिर नहीं है। स्वर्गदूत भी पवित्र हैं, पर वे अपने आप से नहीं, और उनकी पवित्रता भी प्रभु की पवित्रता के सामने अपूर्ण है। यही कारण है कि वे उसकी पवित्रता के सामने झुकते हैं। मनुष्यों में तो यह और भी अधिक स्पष्ट है, क्योंकि सबसे श्रेष्ठ मनुष्य भी पाप से रहित नहीं है। इस प्रकार यह कथन यह स्थापित करता है कि सच्ची, पूर्ण और अटल पवित्रता केवल यहोवा में ही पाई जाती है।

क्योंकि तुझे छोड़ और कोई है ही नहीं - यह वाक्य पहले कथन का कारण और आधार प्रस्तुत करता है। यहोवा पवित्र इसलिए नहीं कि वह दूसरों की तुलना में अधिक पवित्र है, बल्कि इसलिए है क्योंकि कि उसके समान कोई और है ही नहीं। वह अकेला, अद्वितीय और सर्वोच्च है। उसके अतिरिक्त कोई भी अस्तित्व अपने आप में है ही नहीं। जो कुछ भी है, उसी से है और उसी पर निर्भर है। यदि किसी में पवित्रता दिखाई देती है, तो वह उसकी अपनी नहीं, बल्कि यहोवा ही से मिली हुई है। आदम की निर्दोष अवस्था की पवित्रता भी उसी की देन थी, और आज जो लोग सच्चे अर्थ में पवित्र जीवन जीते हैं, वे भी उसी की बुलाहट और अनुग्रह के कारण ऐसा करते हैं। इस प्रकार यह वाक्य यह स्पष्ट करता है कि न केवल पवित्रता, बल्कि अस्तित्व भी यहोवा से ही आता है। उसके बाहर न तो कोई स्वतंत्र पवित्रता है और न ही कोई स्वतंत्र सत्ता।

और हमारे परमेश्वर के समान कोई चट्टान नहीं है - यह चित्र इस्राएल के जीवन अनुभव से गहराई से जुड़ा हुआ है। रेगिस्तान में खड़ी चट्टानें, जो बदलती रेत के बीच अडिग खड़ी रहती थीं, जो स्थिरता, सुरक्षा और भरोसे का प्रतीक थीं। परमेश्वर को चट्टान कहना यह दर्शाता है कि वह न बदलता है, न गिरता है, और न धोखा देता है। वह वही है जिस पर भरोसा किया जा सकता है, विशेषकर संकट और अनिश्चितता के समय में। अन्य तथाकथित देवता या मानवीय शक्तियाँ अस्थायी और निर्बल हैं, पर यहोवा सदा एक-सा रहने वाला है। वही सच्ची शरण है, वही रक्षा है, वही सच्चा विश्राम है और वही उद्धार का आधार है। इस रूपक में यह भी निहित है कि यहोवा केवल बचाने वाला ही नहीं, बल्कि वह वह नींव भी है जिस पर जीवन को सुरक्षित रूप से खड़ा किया जा सकता है।

इस कथन में यह भी स्पष्ट है कि “चट्टान” केवल शक्ति का नहीं, बल्कि विश्वासयोग्यता का भी संकेत है। यहोवा की प्रतिज्ञाएँ अडिग हैं, जैसे चट्टान अडिग होती है। उसने जो कहा है, उसे वह पूरा करता है, और जो उसके पास भरोसे के साथ आता है, वह कभी निराश नहीं होता। यही कारण है कि धर्मी लोग हर समय उसी पर निर्भर रहते हैं, क्योंकि उनके अनुभव ने यह सिखाया है कि उसके समान कोई और सहारा नहीं है।

इस प्रकार वचन 2 एक ही प्रवाह में यहोवा की पवित्रता, उसकी अद्वितीय सत्ता और उसकी अटल सुरक्षा को प्रकट करता है। यह न केवल यह बताता है कि यहोवा कैसा है, बल्कि यह भी सिखाता है कि मनुष्य को किस पर भरोसा करना चाहिए। यह वचन विश्वास को दृढ़ करता है, घमंड को तोड़ता है और यह घोषित करता है कि सम्पूर्ण जीवन, उद्धार और स्थिरता का एकमात्र आधार यहोवा ही है।

1 शमूएल 2:2 - भक्ति संदेश 

जब मनुष्य अपने जीवन में यह स्वीकार करना शुरू करता है कि “यहोवा के तुल्य कोई पवित्र नहीं है”, तब उसके सोचने, बोलने और जीने की दिशा धीरे-धीरे बदलने लगती है। यह वाक्य केवल परमेश्वर की महिमा की घोषणा नहीं है, बल्कि मनुष्य के हृदय को उसकी सही स्थिति दिखाने वाला दर्पण भी है। जैसे ही मनुष्य यह समझ लेता है कि परमेश्वर की पवित्रता पूर्ण और अद्वितीय है, वैसे ही उसके भीतर नम्रता जन्म लेने लगती है। तब वह अपने गुणों, उपलब्धियों और धार्मिकता पर घमंड करना छोड़ देता है और यह मानने लगता है कि जो कुछ भी भला है, वह उसी से आता है और जो भला है उसीने सबको बनाया है तो यदि हम भलाई करे तो घमंड की कोई वजह ही नहीं रह जाती क्योंकि बनानेवाला यदि भला है तो जो वो रचेगा उससे भलाई ही चाहेगा और विशेष मनुष्य से क्योंकि ये उसके स्वरूप में रचा गया है।इसलिए भलाई करना हमारी बुनियाद ही बन जाती है यह बोध जब मनुष्य को हो जाता है तब वह मनुष्य खुदको दूसरों से ऊँचा नहीं, बल्कि परमेश्वर के सामने झुका हुआ बनाता है।

आज के जीवन में, जहाँ हर व्यक्ति अपनी पहचान, सफलता और नैतिकता को स्वयं से गढ़ना चाहता है, तब यह सत्य बहुत गहरा संदेश हमें देता है कि पवित्रता कोई अर्जित की हुई वस्तु नहीं, बल्कि परमेश्वर का स्वभाव है। जब हम यह स्वीकार करते हैं कि हमारी भलाई अधूरी है और हमारी समझ सीमित है, तब हम दूसरों के प्रति कठोर होने के बजाय करुणामय बनते हैं। येशु ने भी फरीसियों के उदाहरण में यही दिखाया कि बाहरी धार्मिकता के बावजूद, जब हृदय में परमेश्वर की पवित्रता का भय नहीं होता, तो जीवन खोखला हो जाता है। इसके विपरीत, कर वसूलने वाला व्यक्ति, जिसने अपनी असमर्थता को स्वीकार किया, तब वो परमेश्वर के सामने सही ठहरा।

जब वाक्यांश कहता है “तुझको छोड़ ओर कोई है ही नहीं” यह बात मनुष्य को झूठे सहारों से मुक्त करती है। जीवन में अकसर लोग धन, पद, संबंध, बुद्धि या अनुभव को अपना आधार बना लेते हैं। जब ये चीजें स्थिर रहती हैं, तब विश्वास भी स्थिर लगता है, पर जैसे ही ये डगमगाती हैं, भीतर भय भर जाता है। यह वचन हमें याद दिलाता है कि सच्चा आधार केवल वही है जो स्वयं से है और जिस पर किसी और का नियंत्रण नहीं। अय्यूब के जीवन में यह बात स्पष्ट दिखती है। सब कुछ छिन जाने के बाद भी वह कह सका कि प्रभु ने दिया और प्रभु ने लिया। यह समझ तभी आती है जब मनुष्य जानता है कि उसके बाहर कोई दूसरा परमेश्वर नहीं है जिस पर वह अपना जीवन टिका सके।

आधुनिक समय में भी ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहाँ लोग सब कुछ होने के बाद भी भीतर से खाली रहते हैं। प्रसिद्ध विचारक ऑगस्टीन ने कहा था कि मनुष्य का हृदय तब तक अशांत रहता है जब तक वह परमेश्वर में विश्राम न पाए। यह अशांति इसी कारण होती है कि हम अपने अस्तित्व का स्रोत भूल जाते हैं। जब हम यह मान लेते हैं कि हमारा जीवन, हमारी सांसें और हमारी दिशा उसी से आती है, तब तुलना, ईर्ष्या और असंतोष धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं। तब दूसरों की सफलता हमें छोटा नहीं बनाती और अपनी असफलता हमें तोड़ती नहीं।

“हमारे परमेश्वर के समान कोई चट्टान नहीं है” यह वाक्य जीवन के संकटों में विशेष अर्थ रखता है। चट्टान का अर्थ केवल शक्ति नहीं, बल्कि स्थिरता भी है। जीवन में परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं। स्वास्थ्य, संबंध, कार्य और समाज सब अनिश्चित हैं। ऐसे समय में यदि मनुष्य का विश्वास किसी अस्थायी वस्तु पर टिका हो, तो उसका मन जल्दी टूट जाता है। राजा दाऊद के भजनों में बार-बार यह पुकार सुनाई देती है कि प्रभु उसकी चट्टान और गढ़ है। यह अनुभव केवल सिद्धांत से नहीं, बल्कि जीवन की लड़ाइयों से आता है। जब वह जंगलों में छिपता था, जब अपने ही लोग उसके विरोध में खड़े थे, तब उसने सीखा कि मनुष्य बदल सकता है, पर यहोवा नहीं।

आज के जीवन में जब कोई व्यक्ति बीमारी, हानि या अकेलेपन से गुजरता है, तब यह सत्य बहुत गहरा सहारा बनता है। अस्पताल के बिस्तर पर, अदालत के बाहर, या टूटे हुए संबंधों के बीच, जब सब सहारे कमजोर पड़ जाते हैं, तब यही चट्टान मन को थामे रहती है। कई बार विश्वासियों ने गवाही दी है कि परिस्थिति नहीं बदली, पर भीतर शांति आ गई। यह शांति इसी भरोसे से आती है कि जिस पर भरोसा रखा गया है, वह हिलने वाला नहीं।

यह वचन हमें यह भी सिखाता है कि विश्वास केवल संकट के समय का साधन नहीं, बल्कि पूरे जीवन की नींव है। जैसे कोई घर यदि चट्टान पर बना हो तो आँधी और वर्षा उसे गिरा नहीं पाती, वैसे ही जीवन यदि यहोवा पर आधारित हो, तो बाहरी हलचल भीतर की स्थिरता को नष्ट नहीं कर पाती। येशु ने भी इसी सत्य को दृष्टांत में बताया कि बुद्धिमान वही है जो अपने घर यानी जीवन को चट्टान पर बनाता है। यह चट्टान कोई विचारधारा नहीं, बल्कि स्वयं परमेश्वर है।

इस सत्य को जीवन में उतारने का अर्थ यह भी है कि हम अपने निर्णयों में उसके स्वभाव को महत्व दें। जब हम यह मानते हैं कि वह पवित्र है, तब हम अपने जीवन में भी पवित्रता की ओर बढ़ने लगते हैं। यह पूर्णता का दावा नहीं, बल्कि दिशा का चुनाव है। जब हम यह जानते हैं कि उसके सिवा कोई नहीं, तब हम अपनी अपेक्षाओं को मनुष्यों से हटाकर परमेश्वर पर रखते हैं। और जब हम यह मानते हैं कि उसके समान कोई चट्टान नहीं, तब हम जीवन की आँधियों में भी धैर्य और आशा बनाए रखते हैं। अंत में, यह वचन हमें केवल परमेश्वर के बारे में सही सोच नहीं देता, बल्कि हमें सही मनुष्य भी बनाता है। यह हमें नम्र बनाता है, निर्भर बनाता है और स्थिर बनाता है। यह हमारे विश्वास को शब्दों से निकालकर जीवन में उतारता है। जब मनुष्य इस सत्य को केवल मानता नहीं, बल्कि जीता है, तब उसका जीवन स्वयं एक गवाही बन जाता है कि सचमुच “यहोवा के समान कोई पवित्र नहीं है… और हमारे परमेश्वर के समान कोई चट्टान नहीं है।” आमीन 

1 शमूएल 2:2 - प्रार्थना 

हे पिता, इस नई सुबह के लिए मैं तेरा धन्यवाद। दिन की इस पहली किरण के साथ मैं तेरी महिमा और पवित्रता को महसूस कर सकता हूँऔर तेरी अटलता और शक्ति का अनुभव करते हुए मेरे हृदय में शांति और भरोसा भर जाता है। तेरी चट्टान की तरह स्थिरता के कारण, मुझे मेरे जीवन के अनिश्चित मार्ग भी अब सुरक्षित और आश्वस्त लगते हैं। इस नई सुबह और शुरुआत में मैं अपने मनको, शरीर और आत्मा को तेरे हाथों में सौंपता हूँ।

हे पिता, मुझे मेरी सीमाओं और असंगतियों का बोध है। मैं यह भी जानता हूं कि मेरी पवित्रता अधूरी है, मेरी समझ सीमित है, पर मैं तेरे सामने अपने हृदय को आज खोलता हूँ। मेरे भीतर के घमंड और अहंकार को मिटा दे और मुझे नम्रता और विश्वास की वह शक्ति दे जिससे मैं तेरे मार्ग पर स्थिर रह सकूँ। जब दुनिया की परिस्थितियाँ डगमगाएँ, तो ऐसा होने पाए कि मेरी आँखें केवल तेरी ओर ही रहें। मेरे निर्णयों में तेरी पवित्रता और न्याय झलके, और मेरे शब्द और कर्म तेरी महिमा का प्रतिबिंब बनें। मुझे यह अनुभव करवा कि तेरे सिवा कोई मेरा सहारा नहीं और हा यह सच भी है, और मैं यह भी जानता हूं कि केवल तू ही मेरी चट्टान और मेरा उद्धार है।

हे पिता परमेश्वर, मेरे परिवार और प्रियजनों के लिए मैं प्रार्थना करता हूँ। मैं जानता हूं कि उनके स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए तू ही शरण और सुरक्षा का एकमात्र विश्वासयोग्य स्रोत है। उनकी राहों में संकट आए, तो तू चट्टान बन उन्हें थामे रहे। उनके मन और हृदय में शांति और भरोसा बना रहे। उनके जीवन में तेरी पवित्रता और शक्ति दिखाई दे, और जब वे कठिनाइयों का सामना करें, तब वे भी समझ सकें कि तू उनके साथ है और उनके लिए कोई तेरे समान चट्टान नहीं है। उनके मनोबल और विश्वास को दृढ़ बना, और उन्हें तेरे संरक्षण में सुरक्षित रख।

हे पिता, मैं तुझसे यह भी प्रार्थना करता हूँ कि मेरा जीवन तेरे स्थिर और पवित्र स्वरूप का प्रतिबिंब बने। मुझे वह समझ और दृष्टि दे जिससे मैं तुझ पर निर्भर रहकर सभी परिस्थितियों में शांति और धैर्य पा सकूँ। मुझे यह सिखा कि किसी भी परिस्थिति में घमंड या आत्मनिर्भरता नहीं, केवल तेरे भरोसे और मार्गदर्शन में जीवन चलाना ही सुरक्षा और शांति का मार्ग है। अंत में धन्यवाद, हे पिता, इस दिन और तेरे अटल प्रेम और संरक्षण के लिए। तेरी चट्टान में स्थिर रहकर मैं जीवन की चुनौतियों का सामना कर सकता हूँ। तेरी पवित्रता, शक्ति और सुरक्षा की यही मेरे जीवन की गवाही होगी। येशु के नाम में,

आमीन।


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