Today's Bible Reading in Hindi - फिलिप्पियों 4:13

अभिवादन और प्रस्तुति 

मसीह में मेरे प्रिय भाइयों और बहनों,

प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह और शांति में आप सभी को प्रेम भरा अभिवादन। वह जो हमारी सामर्थ्य और उद्धार का मूल है उसी की महिमा होती रहे। प्रियों आज जब हम परमेश्वर के वचन के सामने आते हैं, तो अपने हृदयों को शांत करें और अपनी दृष्टि उस स्रोत की ओर उठाएँ जहाँ से सच्ची सामर्थ आती है।

Today's Bible Reading in Hindi आज का हमारा बाइबल पाठ हमने जो लिया है वो फिलिप्पियों 4:13 से है जो हमें यह स्मरण दिलाता है कि जीवन की हर परिस्थिति में हमारी क्षमता का आधार हम स्वयं नहीं हैं। जब हम कमजोरी, अभाव, संघर्ष या अनिश्चितता का सामना करते हैं, तब यह वचन हमें यह सिखाता है कि हमारी सामर्थ परिस्थितियों से नहीं, बल्कि उस प्रभु से आती है जो हमें भीतर से सक्षम बनाता है। यह पाठ हमें आत्म-निर्भरता से निकालकर विश्वास की उस स्थिति में ले जाता है जहाँ मनुष्य नम्रता के साथ परमेश्वर पर भरोसा करना सीखता है।

वहीं इस वचन के द्वारा हमें यह समझने का अवसर मिलता है कि चाहे हमें सहना पड़े या आगे बढ़ना हो, चाहे मार्ग सरल हो या कठिन, परमेश्वर की दी हुई सामर्थ हमें थामे रख सकती है। आज के इस पाठ को पढ़ते समय, आइए हम अपने हृदयों को खोलें, अपनी चिंताओं और बोझों को अलग रखें, और इस सत्य को ग्रहण करें कि प्रभु की सामर्थ हमारे जीवन में कार्य करने के लिए तैयार है। आइए अब हम आदर और विश्वास के साथ आज का बाइबल पाठ पढ़ें।

Today's Bible Reading in Hindi - फिलिप्पियों 4:13

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शीर्षक : सामर्थ का स्रोत: मसीह में स्थिर जीवन

पुस्तक : फिलिप्पियों 4:13

लेखक : पौलूस 

अध्याय : 4

वचन : 13

जो मुझे सामर्थ देता है उस में मैं सब कुछ कर सकता हूं। फिलिप्पियों 4:13

फिलिप्पियों 4:13 - संदर्भ 

यह पत्र प्रेरित पौलुस द्वारा फिलिप्पी की कलीसिया को लिखा गया था। उस समय वह जेल में था और अपने जीवन की कठिन परिस्थितियों, शारीरिक कष्ट और अनिश्चित भविष्य का सामना कर रहा था। वह किसी आराम, सम्मान या भौतिक सुविधा में नहीं था। इसके बावजूद पत्र का मुख्य स्वर “आनंद” है। यह दिखाता है कि वास्तविक खुशी और स्थिरता किसी बाहरी परिस्थिति में नहीं, बल्कि भीतर के विश्वास और परमेश्वर की दी हुई सामर्थ में निहित है।

अक्सर लोग “सब कुछ” को अपनी इच्छाओं, सांसारिक सफलता या भौतिक उपलब्धियों तक सीमित कर देते हैं। लेकिन पौलुस यहाँ इसका प्रयोग उन सभी परिस्थितियों के लिए करता है जिन्हें परमेश्वर ने उसके जीवन में रखा है। यह “सब कुछ” बाहरी उपलब्धियों या स्वयं की शक्ति से नहीं, बल्कि जीवन के हर कष्ट, चुनौती और जिम्मेदारी का सामना करने की क्षमता के रूप में है। इसका अर्थ यह है कि वह हर परिस्थिति में शांत, धैर्यवान और संतुष्ट रह सकता था, चाहे वह भूखा हो या तृप्त, स्वतंत्र हो या कैद में, अभाव में हो या प्रचुरता में।

पौलुस संतोष के रहस्य को वचन 11 और 12 में स्पष्ट करता है। उसने यह सीख लिया कि जीवन की हर अवस्था में संतोष संभव है। उसने कठिन परिस्थितियों में भी विश्वास बनाए रखा और उन परिस्थितियों के बीच आंतरिक स्थिरता पाई। यह संतोष किसी जन्मजात गुण का परिणाम नहीं था, बल्कि आस्था, अभ्यास और मसीह में पूर्ण भरोसे का फल था। यही उसे हर चुनौती का सामना करने में सक्षम बनाता है।

इस वचन का केंद्र बिंदु है, “जो मुझे सामर्थ्य देता है”। पौलुस यह स्वीकार करता है कि उसकी शक्ति स्वयं में नहीं है। वह यह नहीं कहता कि वह अपनी इच्छानुसार कुछ भी कर सकता है। बल्कि वह यह बताता है कि उसकी सामर्थ परमेश्वर से आती है। यूनानी शब्द dynamis जो यहाँ प्रयोग हुआ है, वह सक्रिय ईश्वरीय सामर्थ और कार्यशील शक्ति को दर्शाता है। यह शक्ति परिस्थितियों को बदलने के लिए नहीं दी जाती, बल्कि परिस्थितियों के बीच अडिग रहने, धैर्य रखने और विश्वास के साथ आगे बढ़ने की क्षमता प्रदान करती है।

फिलिप्पियों 4:13 - टिप्पणी 

जो मुझे सामर्थ देता है - यहीं इस पद का केंद्र और आधार है। सबसे प्राचीन और प्रमाणिक पाठों में “मसीह” शब्द सीधे नहीं लिखा है, बल्कि केवल “उसमें” या “उसके द्वारा” है। फिर भी अर्थ पूरी तरह स्पष्ट है कि यह सामर्थ मसीह से ही आती है। बाद में जोड़ा गया शब्द अर्थ को बदलता नहीं, बल्कि उसे स्पष्ट करता है। यह सामर्थ बाहर से थोपी हुई शक्ति नहीं है, बल्कि भीतर से दी गई शक्ति है। यह उस जीवित संबंध का परिणाम है जो विश्वास के द्वारा मसीह के साथ स्थापित होता है। पौलुस मसीह में रहता है, और मसीह उसके भीतर; यही वह गहरा और वास्तविक जुड़ाव है जिसके कारण वह हर परिस्थिति में सक्षम ठहरता है। यह सामर्थ केवल कर्तव्य निभाने की नहीं, बल्कि दुःख सहने की भी है। यह मन और आत्मा के भीतर संतुलन लाती है, अशुद्ध विचारों को हटाती है, और भय व निराशा को दूर करती है। इसी के कारण वह ठंड, भूख, थकावट, सताव और अपमान को सह सका।

यह मार्ग केवल प्रेरितों या महान आत्मिक व्यक्तियों के लिए नहीं है। यह हर सच्चे मसीही के लिए खुला है। जो भी नम्रता और विश्वास के साथ मसीह से जुड़ा रहता है, वही इस सामर्थ का अनुभव कर सकता है। बिना उसके मनुष्य कुछ भी नहीं कर सकता, पर उसके साथ वह हर वह काम कर सकता है जो परमेश्वर उससे चाहता है। इसी चेतना में जीवन की परीक्षाएँ सहने का साहस मिलता है, भविष्य से डरने की आवश्यकता नहीं रहती, और कर्तव्य बोझ नहीं बल्कि बुलाहट बन जाता है। यही कारण है कि पौलुस के लिए यह कथन केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि उसके पूरे जीवन का सार था क्योंकि उसके लिए जीना ही मसीह था।

उसमें मैं सब कुछ कर सकता हूँ - जब प्रेरित पौलुस यह वाक्य कहता है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वह हर संभव काम बिना किसी सीमा के कर सकता है, या कि वह सर्वशक्तिमान हो गया है। यह कथन पूर्ण और असीम अर्थ में नहीं, बल्कि स्पष्ट रूप से सीमित और व्यवहारिक अर्थ में समझा जाना चाहिए। यूनानी भाषा में इसका सही भाव यह है कि "उसे हर स्थिति के लिए सामर्थ प्राप्त है" चाहे वह कुछ करने की बात हो या सहने की। यह कथन उन परिस्थितियों से जुड़ा हुआ है जिनका उल्लेख वह पहले कर चुका है, अर्थात् अभाव और भरपूरी, दुःख और सुख, तंगी और पर्याप्तता। पौलुस अपने जीवन के अनुभवों के आधार पर यह निष्कर्ष निकालता है। उसने सीखा था कि कैसे कमी में रहना है और कैसे बहुतायत में; कैसे दुःख सहना है और कैसे सुविधा में संयम रखना है। इसलिए “सब कुछ” का अर्थ संभावनाओं की अनंत दुनिया नहीं है, बल्कि वह सीधा मार्ग है जिस पर परमेश्वर की इच्छा उसे चलाती है। कर्तव्य और दुःख का वह वास्तविक रास्ता, जिसे उसने स्वयं नहीं चुना, बल्कि जो उसे सौंपा गया।

यह कथन न तो घमंड से भरा हुआ आत्म-विश्वास है और न ही केवल पुराने अनुभवों पर आधारित साहसिक दावा। पौलुस इसे बहुत नम्रता के साथ, फिर भी पूरी दृढ़ता से कहता है। वह यह नहीं कह रहा कि वह कुछ चुनिंदा बातों को सह सकता है, बल्कि यह कि जो कुछ भी प्रभु उसकी ज़िम्मेदारी में देता है, वह उसे शांति और सामर्थ के साथ स्वीकार कर सकता है। वहीं जब वो सब कुछ कहता है तो यह आवश्यक है कि इस वाक्य को गलत दिशा में न ले जाया जाए। इसका अर्थ यह नहीं है कि पतन के बाद कोई भी मनुष्य इस जीवन में परमेश्वर की आज्ञाओं का पूरी तरह और सिद्ध रूप से पालन कर सकता है। यह भी नहीं कि कोई व्यक्ति अपने आप में नैतिक या आत्मिक रूप से पूर्ण हो सकता है। विद्वानों ने स्पष्ट किया है कि यह कथन उन सब कामों तक सीमित है जिनके लिए परमेश्वर ने पौलुस को बुलाया था और जिनमें उसे लगाया था।

इनमें हर प्रकार की परीक्षाएँ सहना, हर सौंपे गए कर्तव्य को निभाना, अपने स्वभाव की बुरी प्रवृत्तियों को दबाना, सुसमाचार के प्रचार में कठिन परिश्रम करना, कलीसियाओं की चिंता उठाना, और निन्दा, दुःख व सताव को सहना शामिल है। यहाँ तक कि मसीह के लिए सबसे पीड़ादायक मृत्यु को भी वह प्रसन्नता और धैर्य के साथ सहने के लिए तैयार था। इस प्रकार “सब कुछ” का अर्थ व्यापक अवश्य है, पर असीम नहीं; गहरा है, पर अनुशासनहीन नहीं; आत्मिक है, पर वास्तविक जीवन से कटा हुआ नहीं।

वहीं पौलुस इस कथन को इस तरह प्रस्तुत करता है कि सारा श्रेय स्वयं से हटकर बाहर चला जाता है। वह जानता था कि यदि वह अपनी सीखी हुई बातों और सामर्थ की चर्चा करता है, तो कोई उसे घमंडी समझ सकता है। इसलिए वह साफ़ कर देता है कि यह सामर्थ उसकी अपनी नहीं है। वह अपनी कमजोरी को भली-भाँति जानता था और मानव स्वभाव की असहायता से वह पूरी तरह परिचित था। इसी कारण वह बार-बार दूसरों को भी यही सिखाता रहा कि वे अपने आप में नहीं, बल्कि प्रभु में मजबूत बनें। उसकी दृष्टि में सच्ची आत्मिक सामर्थ तभी शुरू होती है जब मनुष्य अपने आत्म-निर्भर स्वभाव को छोड़ देता है, अपनी दुर्बलता और पाप को पहचानता है, और परमेश्वर की अनुग्रहपूर्ण सहायता को स्वीकार करता है।

फिलिप्पियों 4:13 - भक्ति संदेश 

यह वचन मनुष्य को उसकी वास्तविक स्थिति से रूबरू कराता है। यह उसे ऊँचा दिखाने के लिए नहीं, बल्कि सही स्थान पर खड़ा करने के लिए दिया गया है। जीवन में अक्सर हम या तो अपनी सामर्थ को बहुत बड़ा मान लेते हैं, या अपनी दुर्बलता को इतना भारी समझ लेते हैं कि आगे बढ़ने का साहस ही खो देते हैं। यह वचन इन दोनों अतियों को तोड़ता है और एक ऐसा संतुलन सिखाता है जिसमें मनुष्य न तो स्वयं पर घमंड करता है और न ही निराशा में डूबता है। यह हमें यह समझने में सहायता देता है कि जीवन की हर अवस्था में सामर्थ बाहर से नहीं बल्कि भीतर के संबंध से आती है।

जब मनुष्य यह स्वीकार करता है कि उसकी सीमाएँ हैं, तभी उसके लिए ऊपर से सहायता का मार्ग खुलता है। राजा दाऊद का जीवन इसका गहरा उदाहरण है। वह न तो आकार में सबसे बड़ा था, न हथियारों में सबसे सशक्तथा, फिर भी वह उस मैदान में उतरा जहाँ अनुभवी योद्धा डर रहे थे। उसकी दृढ़ता उसके शरीर में नहीं, बल्कि उसके भरोसे में थी। उसी भरोसे ने उसके हाथ को स्थिर किया और उसके कदमों को आगे बढ़ाया। यह हमें सिखाता है कि सामर्थ का स्रोत बाहरी तैयारी से अधिक आंतरिक भरोसे में छिपा होता है।

यूसुफ़ का जीवन भी इसी सच्चाई की गवाही देता है। उसे धोखे से गड्ढे में डाला गया, गुलामी में बेचा गया, झूठे आरोपों के कारण कैद में रखा गया, फिर भी उसके भीतर एक ऐसी स्थिरता बनी रही जो परिस्थितियों से नहीं हिली। उसका चरित्र, उसका संयम और उसका धैर्य किसी आरामदेह जीवन का परिणाम नहीं था, बल्कि उस निरंतर विश्वास का फल था जो उसे हर अंधेरे में थामे रहा। यह दिखाता है कि जीवन की कठिन घड़ियाँ मनुष्य को तोड़ने के लिए नहीं, बल्कि उसे गहराई देने के लिए आती हैं।

यह वचन हमें यह भी सिखाता है कि संतोष कोई स्वाभाविक गुण नहीं, बल्कि सीखा हुआ अभ्यास है। संसार हमें लगातार यह सिखाता है कि अधिक होना ही सुरक्षा है, अधिक होना ही शांति है। पर अनुभव बताता है कि अधिक होने पर भी मन अशांत रह सकता है और कम होने पर भी हृदय में विश्राम हो सकता है। यह विश्राम किसी वस्तु से नहीं, बल्कि उस भरोसे से आता है कि जीवन किसी अंधे संयोग के हाथों में नहीं, बल्कि एक उद्देश्यपूर्ण मार्गदर्शन में है जिसका आधार मसीह है।

प्रकृति भी इसी सत्य को प्रकट करती है। नदी पहाड़ों से उतरते समय अपने मार्ग में आने वाली चट्टानों से लड़ती नहीं, बल्कि उनके चारों ओर से रास्ता बना लेती है। उसका लक्ष्य समुद्र है, और वह जानती है कि रुकना उसका स्वभाव नहीं। जीवन में भी बाधाएँ हमें रोकने के लिए नहीं, बल्कि हमारी दिशा को परखने के लिए आती हैं। जो व्यक्ति भीतर से स्थिर है, वह बाहरी अवरोधों से टूटता नहीं, बल्कि उनके बीच से आगे बढ़ना सीखता है।

यह वचन हमें यह भी सिखाता है कि आत्मिक जीवन का अर्थ समस्याओं से मुक्त होना नहीं, बल्कि समस्याओं के बीच स्थिर रहना है। दानिय्येल शेरों की माँद में इसलिए सुरक्षित नहीं रहा क्योंकि वहाँ खतरा नहीं था, बल्कि इसलिए कि उसका भरोसा परिस्थितियों से बड़ा था। बाहर की स्थिति नहीं बदली थी, पर भीतर की स्थिति अडिग थी। यही वह गुप्त सामर्थ है जो मनुष्य को सबसे अंधेरे समय में भी संभाले रखती है।

आज के जीवन में यह सच्चाई उतनी ही प्रासंगिक है। जब कोई व्यक्ति बीमारी से जूझता है, जब कोई आर्थिक दबाव में होता है, जब कोई रिश्तों की टूटन से गुजर रहा होता है, तब यह वचन उसे यह नहीं कहता कि सब कुछ सरल हो जाएगा, बल्कि यह आश्वासन देता है कि वह अकेला नहीं है। भीतर एक ऐसा सहारा है जो उसे गिरने नहीं देगा, चाहे वह आगे बढ़ सके या केवल खड़ा रह सके।

इतिहास में अनेक लोग ऐसे हुए हैं जिन्होंने सीमित साधनों में असाधारण धैर्य दिखाया। जेल में रहते हुए भी कुछ लोगों ने दूसरों को आशा दी, कठिन परिस्थितियों में भी कुछ ने अपनी ईमानदारी नहीं छोड़ी, और असफलताओं के बीच भी कुछ ने अपने विश्वास को जीवित रखा। यह सब किसी असाधारण मानव शक्ति का प्रमाण नहीं, बल्कि उस भीतरी आधार का परिणाम है जो व्यक्ति को परिस्थितियों से ऊपर उठने की क्षमता देता है। यह वचन हमें यह भी सिखाता है कि सच्ची सामर्थ कभी शोर नहीं मचाती। वह शांत होती है, स्थिर होती है, और समय आने पर कार्य में प्रकट होती है। जैसे बीज मिट्टी के नीचे चुपचाप रहता है, पर उचित समय पर अंकुर बनकर बाहर आता है, वैसे ही यह सामर्थ भी भीतर काम करती रहती है, भले ही तुरंत दिखाई न दे।

जीवन में जब कर्तव्य बोझ लगने लगे, जब सही मार्ग कठिन प्रतीत हो, जब समझौते आसान और सत्य कठिन लगे, तब यह वचन स्मरण कराता है कि सही कार्य के लिए आवश्यक सामर्थ पहले से ही उपलब्ध है। यह सामर्थ मनुष्य को न केवल सही चुनने में सहायता देती है, बल्कि सही पर टिके रहने की शक्ति भी देती है।

यह संदेश अंततः मनुष्य को भय से स्वतंत्र करता है। भविष्य का भय, असफलता का भय, अकेले पड़ जाने का भय, ये सब तब कमजोर पड़ने लगते हैं जब भीतर यह विश्वास जड़ पकड़ लेता है कि जीवन किसी अनजान दिशा में नहीं बह रहा। जैसे आकाश में ग्रह अपने निश्चित मार्ग पर चलते हैं और एक दूसरे से टकराते नहीं, वैसे ही जीवन भी एक व्यवस्था में आगे बढ़ रहा है, भले ही हमें हर मोड़ समझ में न आए। इस प्रकार यह वचन जीवन को सरल नहीं, बल्कि सार्थक बनाता है। यह मनुष्य को यह सिखाता है कि हर परिस्थिति बदलना आवश्यक नहीं, पर हर परिस्थिति में स्थिर रहना संभव है। यही वह संदेश है जो आत्मा को मजबूत करता है, हृदय को शांत करता है, और जीवन को उद्देश्य देता है।

फिलिप्पियों 4:13 - प्रार्थना 

हे सर्वशक्तिमान और करुणामय पिता,

इस नई सुबह के लिए मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ। यह प्रकाश, यह साँस, और यह एक और दिन यह सब तेरी कृपा ही मेरे जीवन में प्रमाण हैं। इस रात के बाद भी जो तूने मुझे आज फ़िर यह नई शुरुआत दी है, उसके लिए मेरा हृदय तेरा कृतज्ञी है। इसलिए आज का दिन मैं अपने बल पर नहीं, बल्कि तेरी दया पर भरोसा रखकर आरंभ करना चाहता हूँ।

पिता, आज मैं अपने आप को पूरी सच्चाई और दीनता के साथ तेरे सामने रखता हूँ। मेरे भीतर की कमजोरियाँ, मेरी थकान, मेरे डर और मेरे अनकहे संघर्ष, सब तुझसे छिपे नहीं हैं। कई बार जीवन की परिस्थितियाँ मुझे इतनी भारी लगती हैं कि मैं स्वयं को असमर्थ और खाली महसूस करता हूँ। लेकिन ऐसे ही क्षणों में तेरा वचन मेरे मन को थाम लेता है और मुझे स्मरण दिलाता है कि जो मुझे सामर्थ देता है, उसी में मैं आगे बढ़ सकता हूँ। मेरी शक्ति का स्रोत मैं नहीं, तू है पिता और यही मेरा भरोसा है।

हे पिता, जब मेरे सामने ऐसे काम आते हैं जिन्हें करना कठिन लगता है, तब मुझे भीतर से स्थिर कर। जब मुझे सहना पड़े, तब धैर्य दे। जब निर्णय लेने हों, तब बुद्धि दे। जब मन में भय उठे, तब मुझे यह अनुभूति करा कि मैं अकेला नहीं हूँ। मैं स्वीकार करता हूँ कि अपनी समझ और बल से मैं कुछ भी नहीं हूं, पर जब तेरी सामर्थ मुझमें काम करती है, तब मैं वह भी कर पाता हूँ जिसे मैं असंभव समझता था।

पिता, मेरे जीवन के हर संघर्ष में चाहे वह मन का बोझ हो, शरीर की थकावट हो, या हृदय की कोई गहरी पीड़ा हो मैं इसी वचन को अपना सहारा बनाना चाहता हूँ। और चाहता हूं और विनती करता हूं कि जब मैं गिरने लगू, तब तेरा हाथ मुझे संभाले। जब मैं हार मानने के करीब होऊं, तब तेरी सामर्थ मुझे फिर से खड़ा करे। मेरा जीवन केवल मेरे प्रयासों की कहानी न बने, बल्कि तेरी ही सामर्थ की गवाही बने।

अब हे पिता, मैं अपने परिवार और अपने प्रियजनों को तेरे हाथों में सौंपता हूँ। तू उन्हें स्वास्थ्य, सुरक्षा और शांति प्रदान कर। जहाँ कमजोरी है वहाँ तू उन्हें बल दे, जहाँ चिंता है वहाँ विश्राम दे, और जहाँ भय है वहाँ उनमें भरोसा भर। उन्हें हर प्रकार की हानि से बचा, और उनके जीवन में भी वही सामर्थ प्रकट कर जो तू मुझे देता है। अंत में हे पिता, मैं धन्यवाद देता हूँ क्योंकि तूने मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ा। तू मेरा बल, मेरा सहारा और मेरी चट्टान है। इसी विश्वास के साथ मैं इस दिन और आने वाले समय को तेरे हाथों में सौंपता हूँ, यह जानते हुए कि तेरी सामर्थ में मैं हर परिस्थिति का सामना कर सकता हूँ। तेरे प्यारे आज्ञाकारी पुत्र येशु के नाम में मैं यह प्रार्थना करता हूं। आमीन।

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